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अनुक्रमणिका
जीवन मेँ नक्षत्रों का क्या महत्त्व ?
अश्विनी
भरणी
कृत्तिका
रोहिणी
मृगशिर
आर्द्रा
मघा
पूर्वाफाल्गुनी
उत्तरा फाल्गुनी
हस्त
चित्रा
स्वाति
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
मूल
पूर्वाषाढा
उत्तराषाढा
अभिजित
श्रवण
धनिष्ठा
शतभिषा
पूर्वामाद्रपद
उत्तरामाद्रेपद
रेवती
12-48
49-63
64-71
72-79
80-87
88-94
95-100
101--106
107-114
115-122
123-129
130--136
137-143
144- 150
451- 155
157- {62
163--468
169--178
176-187
{88-195
196-202
203-207
206-209
210-215
216-219
220-224
225-229
230-234
235--239
ज्योतिष-कौमुदी ‹ (दवड- नक्षन-किकिर = 11
ॐ
जीवन में नक्षत्रों का महत्व 2
भारतीय ज्योतिष मेँ नक्षत्र का अत्यंत महत्त्व है । किसी भी व्यक्ति के
जन्म क्षे लेकर मृत्यु तक फले षोडश अर्थात् सोलह संस्कारो मे नक्षत्र
महत्त्वपूर्ण भूमिका निमाते है।
हम जिसे मुहूर्त कहते है, उसके मूल मे.नक्षत्र ही है।
किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, वही
उसका जन्म्-नक्षत्र मान लिया जाता हे तथा वह नक्षत्र पूर्णरूपसेया
आंशिक रूप से जिस राशि के अंतर्गत आता है, वही राशि उस व्यक्ति की
जन्म-राशि मान ली जाती हे।
नक्षत्र का भी एक स्वामी ग्र मान लिया गया है, इसलिए जन्म कं
समय चंद्रमा जिस नक्षत्रे मेँ होता है. उस नक्षत्र के स्वामी ग्रह की दशा
या महादशा मे उस्च व्यक्ति का जन्म हुआ, यह कहा जाता है। फिर
ग्रहौ के क्रमानुसार उस व्यक्ति के जीवन मेँ उन ग्रहों की महादशाएं आती
रहती हैँ । (तैत्तिरीय ब्राह्मण कृष्ण आयुर्वेद, रामायण वाल्मीकीकृत)
भारतीय ज्योतिष मेँ नक्षत्रों का विशद् अध्ययन किया गया है। यह भी
माना गया है कि नक्षत्र जातक की कंडली मेँ अपनी स्थिति के अनुसार
शुम-अशुभ फल के साथ-साथ नाना प्रकार की व्याधियों के भी कारक
बनते हें!
नक्षत्रों पर विस्तृत अध्ययन करने के पूर्वं यह समञ्ा जाए कि आखिर
नक्षत्र हैँ क्या ? मक्षत्रौँ ओर तारों काक्या संबंध है ? इसी प्रकार राशियाँ
ओर ग्रहों के साथ उनके रिश्ते कैसे है?
नक्षत्र का शाब्दिक अर्थ क्याहै ? ।
"नक्षत्र संस्कृत भाषा का शब्द है तथा उसकी व्याख्या करते हुए कहा
ज्योतिष-कौयुदी : (छड-2) नसप्न-विवार ® 19
गया हैन करि न सरति इति ऋक क-जो न हिते, न चले, वह नक्षत्र है ।
कुछ विद्वानों ने नक्षत्र का यह भ्रौ अर्थ लमाया है-
नक्ष-पर्हुचना, -स्प्रोच', त-चौकसी।
अंग्रेजी भाषा मे नक्षत्र कौ "कास्टतेशन' ((गाडनागाम)) कलते है|
चीनी ज्योतिष मेँ नक्षत्र को सिओ (ऽच्ण्ण) कहा जातः है, जबकि अरती
नखूमी नक्रं को मनाजिल, जो 'मंजिल' शब्द का बहुवचन है, कहते है ।
नक्षत्र ; तासे के समूह
पाश्चात्य विश्वकोशो मे कहा गया है कि चीनी, अरब, बेवीलोनिया-निवासी
ओर मिस्मी वे पहले लोग थे, जिन्होनि आकाश मँ नजर आने वाले तारो के
समू मे किसी विशिष्ट आकृति को आरोपित कर उन्दँ नाम दिया है।
(संभवतः उन्होने भारतीय प्राचीन वेदौ उपनिषदौ आदि का ज्ञान नहीं पाया
इसलिए एसा लिखा है)
यहीं पर नक्ष एवं तारो का अंतर स्पष्ट हौ जाता है । वास्तविकता ते
यह है कि नक्षत्र सूर्य, चंद्र, मंगलं की तरह कोई अकेली इकाई नहीं होते।
दरअसल नक्षत्र कुछ तारों के समूह का ही विशिष्ट नाम हैँ
नक्षत्र बनाम तारे
आकाश मेँ नक्षत्रों की रचना तारे करते है। यै तारे क्या हैँ 2 सबसे
पहले हमें तारो के बारे मे परिचय प्राप्तं करे फिर नक्षत्रौ, राशियों या ग्रहों
ओर उनमें क्या अंतर है, यह अपने आप स्पष्ट हो जाएगा {
तरेक्याै 2
रात्रि के समय स्वच्छ आकाश नें असंख्य तारे नजर आते है। लेकिन
अंतरिक्ष मे इनके अतिरिक्त ओर भी तारे है, जो हमें नजर नहीं आते, दूसरे
शब्दों मे जिनका प्रकाश या जिनकी रोशनी हमं धरतीवासियों को नजर नहीं
आती } पर वे भौजूदं हे, ओर जैसे-जैसे अंतरिक्ष विज्ञान उन्नति कर रहा है,
जैसे-जैसे खगोलशास्त्री निरंतर शोधोँ मे लगे हुए है, हमारे सामने नयै-नये
तारो की, नये-नये ग्रहौ की ओर नये-नये सौर मंडलों की उपस्थिति स्पष्ट
होती जा रही है।
तारे किन तर्त्वो के बने होते हैँ 2 उनकी स्वना की प्रक्रियाक्याटै ?
कुछ खगोलशस्त्रियों ओर वै्ञानिकों का विश्वास हे कि तारे वस्तुत
अंतरिक्ष मे धूल के विशाल बादल ओर उदजन यैस अर्थात् हाइद्धोजन गैस
सेवनेहै।
न्योतिष-कौुदी - (खर-() रकत-पिवार अ 13
इस भैस के अणुओं की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उन्हे परस्पर पास लाती
है ओर विशाल बादल, जिसे प्रोटोस्टार' कहा जातः है, लघुकाय होने
लगता है।
जैसे-जैसे यह प्रोटोस्टार सिकडने लगता है, उसके कद्र का तापमान
बढ़ने लगता है । जब यह तापमान 1.806.000 डिग्री सेंटीग्रेड तक परह
जाता है, तो तारा अपनी मध्यावस्था की ओर अपेक्षाकूत धीमी ओर रिथिर
गति से अग्रसर होने लगता है।
क्यातारों मे ऊर्जा होतीदै ?
हो, तारो मेँ ऊर्जा होती है। तारे की मध्यावस्था मेँ उदजन या
हाइद्धोजन गैस के अणु निरंतर परस्पर निकट आकर एक नयी गैस-हीलियम
मैस-की रचना करने लगते ह] हर बार जव उदजन गैस के अणुं से
हीलियम भैस का कोई अणु बनता है तो प्रकाश एवं ताप के रूप मे उससे
ऊर्जा का प्रवाह होता दै।
किसी भी तारे द्वाय निसृत की जाने वाली अपार ऊर्जा के लिए करो
टन उदजन गैस हीलियम गैस मेँ परिवर्तित होती है।
तारो की यह ऊर्ना कहाँ नाती दै ?
अधिकांश तारों की ऊर्जा अंतरिक्ष मे समाहित हौ जाती है, लेकिन जो
थोड़ी ऊर्जा शेष रहती है, उससे तारा निरंतर गर्म होने लगता है । जब तारे
के मध्य का तापमान 100 मिलियन डिग्री सेंटीग्रेड तक पर्हुव जाता है तो
तारा फलन लगता है ओर हीवियम के अणु, ओर भाशै हीलियम अणुओं की
संरचना क लिए परस्पर मिलने लगते हे!
क्या तार्य में विस्फोट भी होताहै ?
यदि यह सम्मिलन क्रिया तीव्र गति से होती है तो ता मे विस्फोट हो
जाता है ओर अंतरिक्ष मे उसके तत्व विलीन हीने लगते है।
क्या तार्य का अवसानभी दोतादै ?
हो, तारे भी जन्म-मरण की प्रक्रिया कं शिकार होते हें! जब तारों में
विस्फोट होता है तो तारे के जीवन का यह चरण “सुपरनोवा' चरण
कहलाता है | हालाकि एेसा यदा-कदा ही होत्रा है।
अक्सर तारे धीरे-धीरे विस्तारित होकर एक विशाल लाल रंग के तारे
ग्योति-करमुदी : (लड नकषत्र-विचार 9 14
का रूप धर लेते है । इन्हे "रेड जाइंट' कहा जाता है अर्थात् 'लाल रा्स'।
अंत मै जब तारे के तमाम उदजन ईधन" का इस्तेमाल हो चुका होता
है तो वह सिकड कर "व्हाइट द्वार्फ' अर्थात् श्वेत वागन" का रूप धर लेता
है ओर धीरे-धीरे ठंडा होकर धूमिल पडने लगता है । यह उसके 'अवसान'
का संकेत माना गयादे।
तारों कं जन्म ओर मरण की इस क्रिया मेँ करोड्धो-करोडो वर्ष
लगते हें
इसीलिए मनुष्य की पिछली अनेक पीढियों न उन्हैँ सदा एक- सा देखा
है] उन्दँं वे स्थिर प्रतीत होते है, 'न क्षरति, न सरति
पर वास्तविकता इसके विपरीत है। करो वर्षो की अवधि के काद
तारौ काभी एक न एक दिन अवसान होता ही है]
सन् 1054 ईस्वी मेँ एक दिन अचानक आकाश मेँ एक दैदीप्यमान तारा
नजर आया । दौ वर्षो तक वह आकाश मे चमकता रहा, इतना कि उसे दिन
में भी देखा जा सकता था। लेकिन धीरे-धीरे वह तिरोहित होता चला गया |
अब उसके स्थान पर गैस का केवल एक समूह नजर आतम है । मध्यम
चमक वाले इस गैस समूह को नाम दिया गया है- करव नेबुला'।
तारों के आकार के बारे मे बताइए ?
टिम-दिम करते या क्चिलमिलाते इन तारौ मे कछ तारे तो इतने विशाल
है कि यदि हमरे सूर्य कौ उनकं मध्य रखा जाए तो हमारी पृथ्वी भी उनमें
समा जाएगी।
कुछ तरे सूर्यसेभीषणोटेषहै।
तार्य का वर्मीकरण
धरती से दिखायी देने वाले तारों के प्रकाश के आधार पर उनका
वर्गकिरण भी किया गया है। तायं की चमक को "मेग्नीट्यूड' कहा जाता है
परर इस मेग्नीट्यूड से किसी भी तारे की असली चमक का सही अनुमान
नहीं लगाया जा सकता।
तारो के इन प्रकाश के आधार पर उन्हं तरह-तरह के नान दिये
गयेदहै।
तारों के एेसे अध्ययनं नै खगोल शास्त्रियो को अंतरिक्ष को तो समञ्जन
मै मददकीदहीहै, प उनके प्रकाश से उनके 'हल्केः या भारी होने काभी
पता लगा सकते हें ।
भ्योतिक-कोमुदी (दंड .नसव-विचार ऋ 15
क्या तारे रेडियो तरणे भी प्रवाहित करतेर्है ?
1968 मे खगोलशाच्त्रियों ने एसे तारो का पता लगाया जौ नियमित
रूप से रेडियो- तरंगे प्रवाहित कर रहे थे तथा एकक्षण मे या सेकडमे तीरा
बार चमकते थे! कू तारों की एसी ही रेडियो तरंगौ कं कारण इस अनुमान
नै भी जन्म लिया करि शायद अंतरिक्ष मे की कोई ओर सभ्यता दहै, जो इस
तरह की रेडियो तरंगे प्रवाहित कर रषी है।
तारों के संबंध मे यह संक्षिप्त विवरण ही है। पर तारों के संबंध में
जानना इसलिए जरूरी है कि वे ही नक्षत्र की रचना करते हैँ ।
नक्षत्र की परिभाषा हमने पष्ठले पढ़ी कि "न कषरति, न सरति" एसी
वात नहीं है । चकि तारों की स्थिति मे करोडो-करोडों वर्षो मै परिवर्तन
आता है, अतः वे धरती पर रहने वाले नश्वर मनुष्य को. जिसका जीवन इन
तारों कं जीवनं की तुलना मेँ किसी बुदवुदे से भी बेहद गौण होतादहै.वे
स्थिर नजर आते हे ।
तो फिर क्या तारे टी नक्ष््रो का आधार हुए ?
हौ, तारे ही नक्षत्रों का आधार हैँ । मनुष्य हजारो वर्षो से इन ताँ को
देखता आया है । सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने आकाश में
रातत चगकने वाले इन तारो के रामूहों मे कुछ आकृत्तियां आरोपित कर दीँ ।
कालांतर मे वे नक्षत्र या -कांस्टलेशने' कहकाने लये। प्राचीन काल मेँ इन
नक्षत्रों की सहायता से नाविक ओरं यात्री दिला निर्धारित करते थे।
इसीलिए अरब मँ इन्द 'भनाजिल' कहा जाने लगा ।
नक्षत्रों का नामकरण कब हुआ ओरं उसका आधार क्या दहै 2
माना जाताहै कि प्राचीन यूनानियों को लगभग 49 कांस्टलेशन या
नक्षत्रं का ज्ञान था ओर उनके नामकरण उन्हौने अपने वीर नायकं
ओर देवताओं के नाम पर किया था। बाद मै रोमन खगोलशार्त्रियौ ने
उन्हें जो नाम दिये, वे आज त्क प्रलित्ते है। इनम से एकं प्रसिद्ध
कांस्टलेशन "उरसा मेजर' या ग्रेट बीयर' है, (भारतीय लोग इसे सप्तऋषि
तारामंडल कहते थे) जिसके सात मुख्य तरे एक हल कं फल की रचनी
करते हैं । इसे 'प्ला' भी कहा जाता है। इस 'प्ला' के दो तारे प्वाडुंटरं
कहलाते है. क्योकि वे हमेशा ध्रुव तारे की ओर होते है । इसे पोलारिस' भी
कहा जाता है तथा यह हमेशा उत्तरी ध्रुव के पास नजर आता हे।
आज के खगोलशास्त्रियों ने 88 कास्टलेशन या नक्षत्र की पहयान की
ज्वोतिफ-कौयुदी ˆ (्वड-1) नशत्रविवार ऋ 16
है। इनमे से 23 तो दक्षिणी गोलाद्धं कं धुर दक्षिण ने है। +6वीं शती के
खगोलशास्त्रियो ने पहली बार इनका नामकरण किया |
पृध्वी ओर नक्षत्रों का क्यासंबंधदै ?
यद्यपि हमारी पृथ्वी अपने क्रांतिवृत्त पर सूर्य की परिक्रमा करती रहती
है तथापि धरती से एसा प्रतीत होता है कि सूर्य ही पृथ्वी की परिक्रमा कर
रहम है । ओर एक समय यह विश्वास इतना बद्धमूल था कि अनेक खग्रेल--
शास्तरियौं को इस तथ्य को प्रतिपादित करने के लिर धार्मिक मठाधीशौ के
हार्थो कठोर दंड सहने षडे।
क्रांतिवृत्तक्यादै ?
पृथ्वी जिस मार्गं पर सूर्यं की परिक्रमा करती है, उसे क्रांति वृत्त (तारों
के बीच पश्चिम से पूर्व की ओर खिसकता हुआ सूर्य जिस आभासित मार्ग
पर भ्रमण करता हुआ दिखाई देता है उसको 1८५ कहते है) कहते हैँ । यह
मार्ग अंडाकार है1 इसे भचक्र भी कहते है । इस क्रांतिवृत्त की पृष्ठभूमि मे
असंख्य तारे नजर अते हँ । आज यह कल्पना भी कर पाना मुश्किल है,
कव, कर्हो, किन लोगों ने इन असंख्य तारों के वीच कुछ चिर-परिचित
छवियां खोजीं । निस्संदेह यह किसी एक पीढ़ी का काम नहीं होगा फिर
भी संसार मे अलग-अलग लोगो नै अलग-अलग जगह एक-एक समूह
बनाया। कालांतर मै इन तासे को 27 आकृत्तियों भै बांटा सया है! यही
आकृततियां नक्षत्र कहलाती है । यों एक नक्षत्र अभिजित कौ भी माना गया
है। इसे मिला दँ तो नक्षत्र 28 हौ जाते ह । इसे (४८2 धथ) के नाम से
जाना जाता है।
नक्षत्रौ एवं राशिर्यो का क्या संवेध दै ?
नक्षत्र 27 हैँ ओर राशियां 121 अतः जद इन 27 नक्षत्रों का बारह सै
विभाजन किया णया तो प्रत्येक राशि मेँ सवा दो नक्षत्रों की स्थिति की
कल्पना की गसी।
क्रांतिवृत्त के 350 अंशो को बारह राशियों मै विभाजित करने पर प्रत्येक
राशि म तीस अंश आये
ओर जब 27 नक्षत्रौ कौ बारह से विभाजित किया गया तो प्रत्येक नक्षत्र
कौ 13.20 अंश प्राप्त हुए। सवा दो नक्षत्र प्रत्येक राशि मे आये।
सुविधा के लिए प्रत्येक नक्षत्रे को चार चरणों मे बांटा गया ओर उसके
ज्योतिव-कोमुदी : (्-८) नस्ने-विकार न 17
13.20 अंशे को चार से विभाजित- करने पर प्रत्यक चरण मे 3 अंश 20 कला
की स्थिति मानी गयी]
हम आगमे देखेंगे कि किस तरह किसी नक्षत्र का एक अंश या चरण
किसी एक रशि मै आतादहै, तो दूसरा किसी अन्य पिछली या अगली
सशिर्म।
राशियों मेँ नक्षत्रों की स्थिति का उदेश्यक्याठै ?
ज्योतिष शास्त्रं नै यह सब "मेला, अनुमानित "मेला, क्यो खडा
किया?
यह 'माथा-पच्ची' अकारण नहीं थी।
दरअसल ज्योतिष शास्त्री क्रांतिपथ कं 360 अंशो को बारह से विमाजित
कर. (बारह ही क्यों ? (शायद 12 विशेष अकूतिर्यो के कारण) क्योकि
राशियां बारह मानी गयी) तथा बाद मेँ सत्ताइस नक्षत्रों को बारह राशियों में
विभाजित कर. तथा बाद मेँ नक्षत्रं को भी चरणो मं विभाजित कर एक दूरी
सुनिश्चित कर लेना चाहते धे ताकि पता लगा सके कि कोई भौ ग्रह विशेष
किस समय, किस राशि मेँ ओर उस राशि मे भी किस नक्षत्र मे तथा उसके
भी किस चरणमेँहै]
कारण यह है कि प्रत्येक नक्षत्र तायं के समूह से दनता है, ओर प्रत्येक
नक्षत्र में आने वाले तारो की भी संख्या एक जैसी नहीं है । यदि आद्रा नक्षत्र
मँ मात्र एक तारा है तो शतभिषा मे. जैसा कि नाम से स्पष्टहै, सौ तारे है!
नक्षत्रों के नाम बताइए ? क्था रश्यो की तरह उनके भी स्वामी होते है ?
यहो हम प्रारंभ मे ज्योतिष शास्त्र मे वणि एवं उपयोगी सत्ताइस नक्षत्रं
के नाम उनके देवता एवं उनके स्वामी ग्रहों का परिचय दे रहे है
म नतर दक्ग स्यागी
1. अश्विनी अश्विनी कगार केतु
2. भरणी यम (काल) शुक्र
3 कृत्तिका अग्नि सूर्य
4. रोहिणी ब्रह्मी (भ्रजापत्ति) चंद्रमा
5. मृगशिरा चंद्रमा मंगल
6, आर्द्र । शिव (रुद्र) राहु
7. पुनर्वसु अदिति (आदित्य) गुरु
8 पुष्य वृहस्पति शनि
ग्योतिष-कोगृदी : (च -1 सषज-क्वार न 18
27,
उपरोक्त तालिका से पत्ता चलता
आश्लेषा .
मघा
पूर्वा फाल्गुनी
उत्तरा फाल्गुनी
हरत
चित्रा
स्वाति
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
मूल
पूर्वाषाढा
उत्तराषाढा
श्रवण
धनिष्ठा
शतभिषा
पूर्वामाद्रपद
उत्तयाभाद्रपद
रेवती
सर्पं बुध
पितर करतु
भग् शुक्र
अर्यमा सूर्य
सूर्यं (सविता) चंद्रमा
त्वष्टा (विश्वकर्मा) मंगल
पवन {मरूत्) राहु
इद्राग्नि गुरु
मित्र शनि
इद्र बुध
राक्षस (निऋति) केतु
जल शुक्र
विश्वदेव सूर्य
विष्णु (गोविन्द) चरमा
वसु मंगल
वरुण राहु
अजपाद (अजैकपाद) गुरु
अहिर्बुध्न्य शनि
पूषा बुध
है कि ज्योतिष शास्त्रम नौ ग्रहोंको
तीन-तीन नक्षत्रों का आधिपत्य दिया गया दै, जेसे-
1. सूर्य के आधिपत्य के न्त्र है, कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी तथा
उत्तराषाढा ।
2. चंद्रे के नक्षत्र हैँ: रोहिणी, हस्त एवं श्रवण।
3. मंगल के नक्षत्र हैँ : मृगशिरा, चित्रा तथा धनिष्ठा।
4. चुघ के नक्षत्र है-आश्लेषा, ज्येष्ठा एवं रेवती ।
5. गुरु के नक्षत्र ै-पुनर्वसु. विशाखा एवं पूर्वामाद्रपद |
6. शुक्र के न्त्र है भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा ।
7. शनि कं नक्षत्र है -पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद ।
8. राहु के शक्षत्र है-अद्रा, स्वाति तथा शतभिषा ।
9. केतु के नक्षत्र है -अश्विनी, मघा, एषं मूल ।
जैसा कि पहले बताया गया है विंशोत्तरी दशा फे निर्धार" मेँ नक्षत्रों का
ज्योतिष-कोमुदी : (र >-7) नसत-विचार ४ 1
ही आधार होता है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र मै होता है, जात्तक
का उसी ग्रह की दशा मेँ जन्म मान लिया जाता है।
जातक अपने जन्म नक्षत्र के कारण किस ग्रह की पूर्ण दशा कां कितना
अंश भोग चुकाहेया उसे उस ग्रह की पूरी दशा का भोग करना है, यह
सब नक्षत्र कं चरण-विभाजन के फलस्वरूप ज्ञात हो जाता है!
कपया राशिर्यो के बारे मँ भी संक्षिप्ते बताएं ?
हमने देखा कि तारो को मिलाकर राशियों की कल्पना की गयी है ओर
प्रत्येक राशि में स्वादो नक्षत्रों की स्थिति मानी गयी है।
राशि ती अंशो की होती है ओर नक्षत्र 13 अंश 20 कलांश के तथा
उनका प्रत्येक चरण 3 अंश 20 कला का होता है।
सूर्यकी पृथ्वी हारा परिक्रमा का परथ अंडाकार है। इस परिक्रमा पथ
की पृष्ठभूमि में जो तारे सतत् नजर आते हैँ उनका ही सुविधा कं लिए
किसी आकृति विशेष मेँ समायोजन कर विभाजन किया गया है|
पृथ्वी का यह राशिपथ अंग्रेजी मेँ "जोडियक' कहलाता है। हिंदी
भे "जोडियकः को ही राशिपथ कहते ह । क्रांतिवृत के विषय मेँ हमने पहले
भी बताया है। सुविधा के लिए एक बार पुनः। इस अंडाकार परिक्रमा
पथ या वृत्त को 360 अर्शो में बांटा गया हे। फिर इन ॐ&0 अंशो को
बारह से विभाजित किय है{ 360 मे ब्रह से भाग देने पर एक संख्या
मे तीस अंश आते हैँ ! इन तीस अंशं मे आने वाले तारों कं समूह को एक
राशि मान लिया ख्या है। सुविधा के लिए इन राशियों को भी एक नाम
दे दिया गयादहै] इन नामों मेहम सब परिचित है। हमारे यर्हौ बारह
राशियां है-
मेष, वृष्, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम
ओर मीन।
अंग्रेजी मे या पाश्चात्य खगोलशास्त्र ओर ज्योत्तिष शास्त्र म इनके ही
नाम है-क्रमशः एरियस निष), टौरस (वृष). जेमिनी (मिथुन), कैसर (कक),
लियो (सिंह). वर्गो (कन्या), लित्रा (तुलः), स्कोरपियो (वृश्चिक), ससीटेरियस
धनु), केग्रीर्कर्नं (मकर), एक्वारियस (कुम), पाडसीज (मीन) ।
ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक. राशि को सात ग्रहो मेसेकिसीनकिसीके
आधीन माना गया है! इसका परिचय आगे प्रसंगानुसार !
यर्हौ हम यहं जनिगे कि प्रत्येक राशि ने कौन-कौन से नक्षत्र या उनके
चरण आते है । सविधः के लिए हम राजि के स्वामी ग्रह तथा इन राशियों
ग्योतिष-कौगुदी : (लछड-1/ नस्षत्र-विदार 9 20
मे आने वाले नक्षत्रौ के स्वामी प्रहोंकाभी षरिचय दे रहे है। उदेश्य ग्रही
है कि पाठक यह समञ्जने की कोशिश करें कि किसी व्यक्ति कं जीवन में,
ज्योतिष शास्त्र कं सिद्धांतानुसार भी न तौ अकेला नक्षत्र, † अकेली राशि
ओर न अकेला कोई ग्रह प्रभाव डालता है। किसी भी व्यकिति पर इन सबका
सम्मिलित्त प्रभाव ही पडता है।
कृपया राशिर्यो एवं उनके नक्षत्रौ का परिय दीजिए ?
प्रथम् राशि, मेष राशि का स्वामित्व मंगल को दिया गया है | मेष राशि
म अश्विनी (स्वामी : केतु). भरणी (स्वामी : शुक्र) के सभी चार-चार चरण
तथा कृत्तिका (स्वामी : सूर्य) का एक चरण अक्ता है]
एक राशि मँ तीस अश्च माने गये है| यर्हा अश्विनी कं 13.20, भरणी
के 13.20 तथा कृत्तिका के प्रथम् चरण् 3.20 मिलकर ॐ अंश पूरे
होते है।
अब यदि मेष राशि मे जन्मे दो व्यक्तियों के नक्षत्र मे अंतर दहै तो फलों
म भी अंतर पड़ेगा, यद्यपि वह व्यक्ति मेष राशि मेँ जन्मा माना जाएमा
तथापि मेष राशि के अश्विनी, भरणी अथवा कृत्तिका नक्षत्र मे जनमलेने से
कुछ न कुछ फर्क अवश्य पड़ेगा ]
यही बात शेष राशियों एवं उनके नक्षत्रों पर भी लामू होती हे।
मेष कं बाद वृषभ अथवा वृष दूसरी राशि है । कुंडली मे 2 के अंक से
इसे संकेतित किया जाता है । इसका स्वामित्व शुक्र को दिया गया है।
वृष राशि मेँ कृत्तिका (स्वामी : सूर्य) के शेषं तीन चरण प्रथम चरण नेष
मँ होता है), रोहिणी (स्वामी : चंदर) कं चारों चरण (13.20) ओर मृगशिरा
(स्वामी : मंगल) के दो चरण (6.40) होते हैँ ।
मिथुन राशि (स्वामी : बुध) मेँ मृगशिरा के शेष दो चरण (6.49), ओरद्रा
(स्वामी : राहू) के चारों चरण (13.29) एवं पुनर्वसु (स्वामी : गुरु) के तीन
चरण (1000) होते ठे
कर्कं राशि (स्वामी : चंद्र) मेँ पुनर्वसु का अंतिम चरण 8.20) पुष्य
स्वामी : शनि) के चार्यो चरण (13.20) तथा आश्लेषा (स्वामी : बुध) के चारो
चरण (13.20) शामिल हे ।
सिंह राशि (स्वामी : सूर्य) मे मघा के चारों चरण {13.20}. पूर्वा फाल्गुनी
(स्वामी : शुक्र) के चारो चरण 13.20} तथा उत्तरा फल्गुनी {स्वामी : स्वयं
सूर्थ का प्रथम चरण (8.20) होता है |
कन्या राशि (स्वामी : बुध) में उत्तरो फाल्गुनी के शेष तीन चरण (10.
स्योतिष-कोुदी : (ध्व) नशषत-किदार @ 21
00). हस्त (स्वामी : चंद्र) के चारो चरण {13.20} तथा चिक्रा (स्वामी : मंगल)
के दो चरण (6.40) की गणना होती है ।
तुला राशि (स्वामी : शुक्र) मे चित्रा के दौ चरण (6.40), स्वाति (स्वामी
: राहु) कं चारो चरण (13.20) तथा विशाखा (स्वामी : गुरु) के तीन चरण
(10.00) का समावेश माना गया है ।
वृश्चिक राशि (स्वामी : मंगल) मेँ विशाखा का अंत्तिम चरण (3.20),
अनुराधा (स्वामी : शनि} तथा ज्येष्ठा (स्वामी : बुध) के समस्त चरणौ की
गणना होती है। अर्थात् अनुराघा के (13.20) तथा च्येष्ठा के (13.20)!
धनु राशि मै मूल (स्यासी : केतु) के चारो चरण {13.20}, पूर्वाषाढा
(स्वामी : शुक्र) के चारो चरण (13.20) तथा उत्तराषाढा (स्वामी : सूर्य) के
प्रथम चरण (3.20) का समवेश माना गया है ¡
मकर राशि (स्वामी : शनि) में उत्तराषाढा के शेषं तीन चरण (10.00),
श्रवण (स्वामी : चंद्र) कं चारों चरण (13.20) तथा धनिष्ठा (स्वामी : मंगल)
केदो चरण (6.40) की गणना होती है!
कुम राशि (स्वामी : शनि) मे धनिष्ठा के अंतिम दौ चरण (6.40) तथा
शतभिषा (स्वामी : राहु) के चारो चरण (13.20) तथा पूर्वमाद्रपद (स्वामी :
गुरु) के तीन चरण (10.00) का समावेश है ।
मीने राशि (स्वामी : गुरु) मे पूर्वमाद्रपद का अंतिम चरण तथा उत्तरा
भाद्रपद (स्वामी : शनि) के चारो चरण (13.20) तथा रेवती (स्वामी : बुध) के
चारों चरणों (13.20) को समावेश माना गया है।
नक्षर्जो के चरणाक्षर से क्या आशय है ? उनका महत्त्व बताडए ?
भारतीय ज्योतिष की महत्त्वपूर्णं विशेषता है- गोपनीयता कं साथ-साथ
सरलता; तंत्र शास्त्र मँ भी यही विशेषता है। जो मंत्र अघने अर्थ की
गोपनीयता के कारण निरर्थक प्रतीत होते है, वे मंत्र का ज्ञान होने पर
अर्थवान् एवं प्राणवान् सिद्ध हो जाते हें।
प्रत्यक्ष देखने पर प्रत्येक नक्षत्र के पृथक-पृथक चरणो के लिए नियर
अक्षर भी अर्थहीन लगते हैँ । जैसे अश्विनी के चार चरणौ के लिए नियर
अक्षर र्है-चूचे, चो, ला।
अश्विनी को आज प्रथम नक्षत्र माना जाता है, जबकि प्राधीन काल
मे यह स्थान कृत्तिका का कहा जाता था। इस पर आगे चर्चा प्रसंग
अनुसार ।
नक्षत्रं के लिए नियत चरणाक्षर आज अपने ज्ञान की सीमा के कारण
ज्योतिष-कौमुठी : (ख) नक्षज-विचार अ २४
भले ही अर्थहीन लगते हो, पर उनका एक महत्त्व ओर उपयोग हे ।
अकेले चर्णाक्षर से ज्योतिष शास्त्र का कोई भी अनुभवी अध्येता किसी
भी व्यक्ति की चंद्र लग्न एवं नक्षत्र एवं वह नक्षत्र जिस राशि के अंतर्गत
आता हे, तथा नक्षत्र एवं राशि कं स्वामी ग्रह की जानकारी के आधार पर
उस व्यक्ति विशेष कं संबध मे पर्याप्त जानकारी पा सकता हे!
अगर भारतीय ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों पर विश्वास रखते हैँ तो हम
यह भी जानते हैँ कि किसी भी जात्तक के जन्म नक्षत्र, राशि एवं नक्षत्र एवं
राशि के स्वामी आदि का उस्र जातक क व्यवितित्व, स्वभाव आदि पर पर्याप्त
प्रभाव पडता है । ओर यदी बातें किसी भी व्यक्ति के भाग्य-निधरण ्मभी
पर्याप्त भूमिका निमाती हैँ । जन्म नक्षत्र, राशि, राशि के स्वामी ग्रहो के
शुभ-अशुभ प्रभाव का आकलन कर कोड भी व्यवित अपने दोषौ को दूर कर
गुणों मे वृद्धि कर सकता है।
अत्तः जन्म नक्षत्र का महत्त्व है तथा उसके चरणौ कं लिए नियत अक्षरों
की भी अपनी कम उपयोगिता नहीं है।
यर्हौ प्रस्तुत है, विभिन्न नक्षत्रौ के चरणाक्षरः-
न्त्र ग्रथम दवितीय वरीय चदर्थ
अश्विनी चू चे चो ला
मरणी ली लू ले लो
कृत्तिका अ ड़ | ए
रोहिणी ओ वा वी बू
मृगशिरा बे बो का की
आद्रा क् घ ङ 1
पुनर्वसु के को ह ही
पुष्य हू हे हो डा
आश्लेषा डी 3 डे डो
मघा मा मी मे मो
पूर्वा फाल्गुनी मो ट टी (4
उत्तरा फाल्गुनी टे टो पा पी
हस्त पू ष ण ठ
चित्रा पे पौ रा री
स्वाति रू रे रो ता
विशाखा ती त् ते तो
अनुराधा न नी नू ने
ज्येष्ठा नो य यी यू
ज्योतिष-कोमुदी (द्व्ड-प/ नक्षन-विचार 9 28
मूल ये यो म भी
पूर्वाषाढा भू ध फ दढ
उत्तराषाढा भे भो जू जी
अभिजित जू सै जो ख
श्रवण खि खू खे खो
धनिष्ठा ग गी गू गे
शतभिषा मो सा सी सू
पूर्वाभद्रपद से सो दा दी
उत्तरामाद्रपद दु थ ६५ त्र
रेवती दे दो चा ची
राशियों की रचना नक्षत्रौ से होती है, अतः जिस राशि जो नक्षत्र
होता है-उसके चरण अक्षरो का उस राशि मेँ समावेश हो जाता है) ओर
राशि के आधार पर चंद्र राशि तय कर दी जाती है।
पाठकों की सुविधा के लिए इसे ओर स्पष्ट कर देते हैः
चूचेचोला, लीलूलेलो, अ
मेषः ------- ------- -- --
अश्विनी ` भरणी कृत्तिका
इखउव ओञआवीवृू वेवो
वृषः ------- ` ------- -------
कृत्तिका रोहिणी : मृगशिरा
क की, कूघङषछ केकोह
मिथुन :------- ------- -------
मृगशिरा अद्र पुनर्वसु
ही हूहेहोडा डीड्डेडो
कर्कः ------- ------- ------
पुनर्वसु पुष्य आश्लेषा
मामीमेमो मोटदीदू टे
सिंहः ----- -------- ----- ---
मघा पू. फाल्गुनी उ. फाल्गुनी
ज्थोतिष-कोपरदी : (खर-१) गसेक्र-विचार 9 24
टो्पापी
कन्याः -------
उ. फाल्गुनी
रारी
तुलाः -------
चित्रा
तो
वृश्चिकः-------
विशाखा
पेपोभभी
धनुः -------
मूल
भोजजी
मकरः -------
उत्तराषाढा
गू गे
त
धनिष्ठा
दी
मीनः -------
पूर्वामाद्रपद
“गंड' से क्या तात्पर्य है ?
उपरोक्त तालिका के अध्ययन से एक ओर तथ्य स्पष्ट होता है-
ओर वह यह कि इन बारह राशियों मेँ तीन स्थल रेसे है, जरो राशि एवं
नक्षत्र, दोन की ही समाप्ति होती है। जैसे कर्क राशि. जिसकी समाप्तिके
साथ उसके अंतर्गत आने वाले आश्लेषा नक्षत्र के भी चारों चरण समाप्त
हौतेहेै।
अनुराधा
भूधफढ
पूर्वाषाढा
उत्तराभाद्रपद
देसके बाद आती है वृश्चिक राशि, जिसकी समाप्ति कं साथ-साथ
ज्येष्ठा के भी चारों चरण समाप्त होते है|
तीसरा स्थल है मीन राशि! मीन राशि के समाप्ति के साथ ही रेवती
नक्षत्र के भी चारों चरणों का उसमे समावेश हो जाता है।
दूसरे शब्दों में प्रत्येक चौथी राशि की समाप्ति पर यह स्थिति बनती है।
ज्योतिष शास्त्र की भाषा मे इन स्थानों को गंडमूल कहते है! गंड
अर्थात् वे विशिष्ट सथल जरह राशि एवं उसके अंतर्गत आने वाले अंतिम
नक्षत्र काभी अंत होता है।
गंड में जन्म को अशुम माना गया है । यह मान्यता है कि जन्म गंडक
जितना निकट होया, वह उतना ही अशुभ, विपत्तिकर अथवा अनिष्ट करने
वाला होया।
मूल नक्षत्र के संबंध में अनेक भयभीत करने वाले फलादेश मिलते हैँ ।
कहा जाता है कि मूल के प्रथम् चरण मेँ जातक का जन्ग पिताके लिए,
द्वितीय चरण में जन्म माता के लिए तथा तृतीय चरण मे जन्म जातक के
परिवार एवं धन का नाशक होता है । जबकि चतुर्थ चरण में जनमहोने से
जातक की को हानि नहीं होती!
इसी तरह आश्लेषा के प्रथम् चरण मे जन्म होने से जातक का कुछ भी
अशुभ नहीं होता, जबकि द्वितीय चरण मे जन्म होने से पारिवारिक धन का
नाश, तृतीय चरण में जन्म हौने से माता कं लिए तथा चतुर्थ चरण मेँ जन्म
होने सेषिताका अनिष्ट होताहे।
क्या राशियों की भांति नकषतर मे भी संज्ञा, वर्ण आदिकेभेदर्है?
हो, जिस प्रकार राशियों पर स्वभाव, वर्ण, आदि आरोपित किये यये है,
उसरी तरह नक्षत्रों का भी ध्रुव, चर्, उग्र, मिश्र, मृदु, तीक्षण, दारूण आदि
संज्ञाओं मे विभाजन किया गया] नक्षत्रौ मेँ भी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण भेद्
फियागयादहै)
यही नही, नक्षत्रों का, योनि, वर्ग एवं सत्व, सर्ज. तम गुणौ के आधार पर
भरी विभाजन किया मया है।
सर्वत्रथम नक्षत्रों की संज्ञाओं का परिचय प्राप्त करे।
धुव संज्ञक नक्षत्र हँ : उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढा तथा उत्तराभाद्रपद,
रोहिणी । ओर रविवार
चर संज्ञक नक्षत्र हैं : स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा ! ओर
सोमवार ४
ज्योकतिष-कौमुदी : (वड) नक्षत्र-विकार ॐ 26
खग्र संज्ञक नक्षत्र हैँ : पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वषाढा, पूर्वाभाद्रपद, भरणी, एवं
मघा। ओर मंगलवार
भिश्र संज्ञक नक्षघ्रों मे विशाखा, कृत्तिका ओर बुधवार का समावेश है ।
ज्िप्र एवं लघु संज्ञक नक्षत्रे हे : हरत, अश्विनी, पुष्य एवं अगिजित।
ओर गुरुवार
मृदु, संञ्चकं नक्ष मे मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुसधा का समावेश है ।
शुक्रवार
तीक्ष्ण एवं दारुण संज्ञक नक्षत्र है : मूल. ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा ।
शनिवार
नक्षत्रों की इन संज्ञाओं का क्या उपयोग है ?
नकष््रों की इन संज्ञाओं से उनके फल का पत्ता चलता है।
जैसे कहा गया है कि धुव संज्ञक नक्षत्रों अर्थात् उत्तरा फाल्गुनी,
उत्तराषढा, उत्तरा भाद्रपद एवं रोहिणी नक्षत्र मेँ स्थायित्व रखने की कामना
वातै कार्य शुरू करने चाहिए ¦ अर्थात् एसे कार्य जिनमें हम स्थायित्व चाहते
है, जैसे गृह-निर्माण, ग्रह शांति, उद्यान एवं बीजारोपण आदि ।
चर संज्ञक नक्षत्रौ का संब॑घ गति से है। अतः जिन कामँ मे हम गति
चाहते है, उन्हे चर संज्ञक नक्षत्रं मेँ शुरू करना चाहिए । चर संज्ञक नक्षत्रों
मे, हमं पता है, स्वाति, पुनर्वसु श्रवण, धनिष्ठा एवं शतभिषा का समावेश है।
उग्र संज्ञक. नक्षत्रों यथा पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा. भरणी एवं मघा को
मारण, शस्त्र-निर्माण, विष प्रयोग आदि के लिए उपयुक्त कहा गया हे ]
मिश्र संज्ञक नक्षत्रों जैसे विशाखा, कृत्तिका आदि को यज्ञादि एवं
मिश्रित कार्य के लिए श्रेष्ठ बताया गमया है।
क्षिप्र एवं लघु संज्ञक नक्षत्र शास्त्र अध्ययन, आभूषण निर्माण, हस्तशिल्प
के कार्य, दुकरानदारी शुरू करने के कार्य तथा रतिकर्म के लिए शुभ कहे
गये है क्िप्र एवं लघु संज्ञक नक्षत्र है-हस्त, अशिवनी, पुष्य, अभिजित ।
मृदु संज्ञक नक्षत्र ललिते कला, विशेषकर गायन आदि, खेलकूद,
उत्सव, वस्त्राभूषण आदि कार्यो के लिए शुम माने गये है । मृदु संज्ञक नक्षत्रौ
म मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा आदि की गणना होती है।
मूल, ज्येष्ठा, आद्रा, आश्लेषा आदि की गणना तीक्ष्ण एवं दारुण संज्ञक
नक्षत्रों मे होती है तधा जैसा कि इनकी संज्ञा मेँ स्पष्ट है, ये नक्षत्र मारण,
तात्रिक, प्रयोगो, आक्रमण आदि के लिए उपयुक्त पाये गये है।
मुहुर्त चिंतामणि मे नक्षत्रों को ऊर्ध्वमुख, अधोमुख तथा तिर्यडमुख भी
ज्योतिष-कोुदी : (्ड-१) नसत्र-विवार @ ९7
माना गया है] अधोमुख नक्षत्र है मूल, आश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, पूर्वा
फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वामाद्रपद, भरणी ओर मघा । अधोमुख नक्षत्रों मे कूप
खनन, खनिज कार्य, धरती के गर्भं मे किये जाने वाले कार्यो को शुरू करने
का परामर्श दिया जात्ता है। तिर्यड मुख नक्षत्रों मेँ बाध बनवाने, वाहन आदि
से संबंधित कार्य किये जाते है । देसे नक्षत्र है -मृगशिरा, रेवती, चित्र,
अनुराधा, हस्त, स्वाति, पुनर्वसु. ज्येष्ठा ओर अश्विनी 1
नक्षत्रों की नेर संज्ञा
इसी तरह नक्षते को अल्प, दृष्टि, अंघ, सुक्षि तथा एकाक्षी भी माना
गया। एकाक्ष अथति काना { यह वर्गीकरण चोरी संबंधी प्रश्नों म उपयोगी
होता है। अल्प दृष्टि नक्षत्र है-रोहिणी, पुष्य, विशाखा, रेवती, विशाखा,
पूर्वाषाढा एवं उत्तराफाल्गुनी ।
अथि नक्षत्र है-भरणी, आर्द्रा, मघा, चित्रा, ज्येष्ठा, पूर्वामाद्रपद ।
सुअक्षि नक्षत्र हे कृत्तिका, पुनर्वसु, पूर्वा फाल्गुनी, स्वाति, श्रवण, मूल,
उत्तरामाद्रपद ¦
एकी नक्षत्र है- मृगशिरा, आश्लेषा, हस्त. अनुराधा, उत्तराषढा, शतभिषा ।
नक्षत्रों के वर्णं
ग्रहो, राशियों की भांति नक्षत्रौ का भी वर्णौ मं विभाजित किया गया है
तदनुसार ब्राह्मण वर्णं के नक्षत्र है-
पर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वामाद्रपद ओर कृत्तिका । क्षत्रिय वर्ण मेँ इन
नक्षत्रां का समावेश है : उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तरामाद्रपद, पुष्य ।
वैश्य वर्णं कं नक्षत्रौ मे-रोहिषी, अनुराधा, मघा, रेवती की गणना होती है ।
शूद्र या सेवक वर्णं के नक्षत्र है-हस्त, युनर्वसु, अश्विनी, अभिजीत ।
इसी तरह मूल, आर्द्र स्थाति, शतमिषठ नक्षत्रौ की उग्र जाति का तथा आश्लेषा,
विशाखा, श्रवण एवं भरणी नक्षत्रौ को चंडाल जाति का माना गया है।
नक्षत्रों का फलादेश करते समय इन सब बातों का भी विचार किया
जाता है।
नक्ष के गुणों के बारे मेँ भी बताइए ?
योगदर्शन महर्षिं पातंजलि के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र मेँ सत्व, रज या
तम, कोई न कोई एक गुण होता है तथा वह नक्षत्र स्वयं मे स्थित ग्रह
विशेष को अपना वह गुण प्रदान कर देता है।
ज्योततिव-कोयुदी + (वड) नश्षज-पिकार च 28
"यह अपने मे स्थित" को थोडा ओर स्पष्ट कर दे।
नक्षत्र ग्रहों से भी बहुत दूर होते है ! कुछ नक्षत्रों को मिलाकर राशियों
की कल्पना की गयी है. यह हम जानते ही है।
जब हम कहते हँ कि कोर ग्रह विशेष, किसी विशिष्ट राशि मेदहैतो
तात्पर्यं यही कि हमै धरती से देखने पर वह ग्रह विशेष. उसी विशिष्ट रशि
के सामने नजर आता दहै)
यायो कहें कि राशिपथ के मंव परर वह राशि उस ग्रह की पृष्ठभूमि में
पडे परदे की भाति होती है।
मगर राशि तीस अंशो की होती है। उसमे सवा दो नक्षत्रों की कल्पना
की गयी है। सूक्ष्मता के लिए ज्योतिष मेँ यह जानने की विधि -विकसित्त की
मयी कि राशि मे भी ग्रहे उस राशि के कित नक्षत्र ओर उरक किस चरण
महै
जैसे कोई कहे कि मेँ दिल्ली मे रहता हू 1 लेकिन दिल्ली तो बहुत वड़ी
है] पृष्ने पर वह अपनी कलोनी या मोहल्ले का नाम बताता है। पर
कोलनी भी कोई छोटी नहीं होती । अतः वह अपने घर का नंबर, मली आदि `
बताता हे।
बस, कुछ एेसा ही ग्रहौ की राशि, नक्षत्रे ओर उसके चरण विशेष मेँ
उसकी स्थिति के बारे मे समञ्ञ लीजिए।
इस प्रकार जव कोई ग्रह किसी राशि कं घटक किसी नक्षत्र विशेष के
सामने होता है तो हम कहते हैँ कि वह ग्रह उस नक्षत्र मे है।
हमारे यह तीन गुणो की विशेष महिमा बतायी गयी है! मनुष्यो मे भी
इन्दी गुणों का कास बताया गया है।
ये गुण हम समी जानते है! ये है-सात्विक गुण्. राजसिक गुण ओर
तामसिक गुण।
निम्नं तालिका से ज्ञात होता है कि किस नक्षत्र पर कौन-सा गुण
आरोपित किया गयां हेै।
नक्षत्र, उनका गुण एवं स्वामी यह
सत्व गुण रजोगुण तमोगुण
पुनर्वसु भरणी अश्विनी
गरू) शुक्र) ककु
आश्लेषा कृत्तिका मृगशिरा
छ) (सूय) (शु)
ज्योतिष-कोमुदी ` (ख~ नकषत-विवार छ 29
विशाखा रोहिणी आर्द्रा
(गुरु) (चंद्र) (मंगल)
ज्येष्ठा पूर्वाफाल्गुनी पुष्य
(घ) शुक्र) (शनि)
पूर्वाभाद्रपद उत्तरा फाल्गुनी मघा
गुरू) (सू) कतु)
रेवती हस्त चित्रा
कध) द्र) संगल)
पूर्वाषाढा स्वाति
शुक म)
उत्तराषाढा अनुराधा
सूरय) (शनि)
श्रवण मूल
वद्र) कितु)
धनिष्ठा
।
शतमिषा
मगल
उत्तरा भाद्रपद
उघ)
ववर-वधू की दुंडली-मिलान में क्या नक्षत्रौ पर भी ध्यान दिया जाता है 2
जी हो, वर-व्धू की कुडली- मिलान म नक्षत्रौ की बहुत अहम् भूमिका
होती है। मिलान के लिए जो नियम बनाये गये हँ, उनकी तालिका मेलापक
सारिणी कहलाती है । इसी मेलापक सारिणी के आधार पर विवाह के समय
वर-वेधू की कंडली मिलान का आम प्रचलन है। कुडली-मिलान का
एकमात्र उदेश्य यही जानना ध! कि दौ लोगो के मध्य आजीवन संबंध शुम,
सुखद ओर फलप्रद होगा या नहीं!
पहले जब आज जैसे विवाह योग्य कन्याओं ओरं युबकीं के
परिचय- सम्मेलन के आयोजनों का न प्रचलन था ओर न लडकी या लड़के
को एक-दूसरे को मिलाने-दिखाने का रिवाज, तब दोनों की कुंडली के
अध्ययन से ही यह ज्ञात किया जाता था कि प्रस्तावित संबंध करने योग्य
है या नहीं। इस कार्य मे सुविधा के लिए जिस मेलापक सारिणी की रचना
ज्योत्तिक-कमुदी : (व-1) नक्नन-विवार ब्र 30
की गयी, उसमे नक्षत्रौ कौ एक अतिशय महत्त्वपूर्ण भूमिका स्पष्ट नजर
आतीहै।
मेलापक सारिणी का मुख्य आधार नक्षत्र ही है { उत्तर भारत मे वर-वघू
के मध्य छत्तीस गुणो के मिलान कौ देखने की प्रथा है।
वर्ण, वश्य, तारा, योनि, गण मत्री, भकूट ओर नाड़ी इन्हे अष्टकूट या
आठ कूटो की संज्ञा दी गयी है। इनमें से प्रत्येक के लिए निश्चित गुण या
गुणों का नि्धरिण कर दिया गया है।
जैसे वर्ण, वेश्य के 2, तारा कं 3, योनि के 4, रह भग्र कं 5, गुण मैत्री
के €, भकट के 7 ओर नाडी के 8 (कल योग : 36) गुण तय किये गये हे ।
इनमे तारा, योनि, गण, नाडी का मूलाधार नक्षत्र ही है ! अर्थात् ॐ में
से 21 गुणौ का निर्धारण नक्षत्रौ के आधार पर ही होता है, जैसे तारा के 3,
योनि के 4 गण मैत्री के 6 ओर नाडी कं 8। कुल योग 3+4+6+8 = 211
तारा कूट मे वर--वधू के जन्भ नक्षत्रों की परस्पर दूरी देखी जाती हे ।
कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक की गिनती की जाती हे। प्राप्त
संख्या भे 9 का भाग् दिया जाता है} विषम संख्या जैसे 3.5.7 शेष बचे तो
इभे अशुभ समज्ञा जाता है ।
योनि कूट का आधार भी नक्षत्र ही दै
विभिन नक्षत्रौ को अश्व, भैस, सिंह, बकरी, मेष, वानर, नेवेला, सर्पं
आदि 14 योनियौ मे विभाजित किया गया है तथा उनमें परस्पर भेत्री अथवा
शब्रुता आरोपित की गयी है। यदि वर-कन्या की योनियौं मेमेत्रीहैतो
इसके चार गुण प्राप्त माने जाते हैँ।
इसी तरह गण निधरिण का आधार भी नक्षत्र है ।
विभिन्न नक्षत्रों को देव, मनुष्य एवं राक्षस गणो मे विमाजित किया गया
है। जातक का जो जन्म नक्षत्र होता है, वह जिस वर्मं के अंतर्गति आता
है, उसे ही वर या कन्या का गण मानां जाता है।
देव, राक्षस एवं मनुष्य गण मेँ भेत्री, समता ओर शत्रुता के भाव आरोपित
कर मणं की अनुकूलता-प्रतिकूलता देखी जाती है ।
जब वर-कन्या का गण एक ही होता है तो 6 गुण प्राप्त भाने
जाते हे । यह विश्वास किया जाता है कि गण एकं होने पर परस्पर भैत्री
होगी
यदि वर-वधू मेँ से एक का गण देव तथा दूसरे का मनुष्य हो तो मध्यम
प्रीति का फलादेश किया जाता है। इसकं गुण मिलते हे ।
ज्योतिष-कौपृदी : (धड-१) नस्षत्र-विचार ७ 31
इसी प्रकार वर-कन्या मेँ से यदि किसी का गण मनुष्य हो ओर दूसरे
का राक्षस ततो इसे घोर अशुभ माना जाती है! किसीएक कीमृत्युकाभी
फलादेश कहा गया है } एक का देव तथा दूसरे का राक्षस होने प्रर दोनों
मेँ परस्पर वैर भाव बना रहता है।
मेलापक मेँ नाड़ी कूट को सर्वाधिक गुण दिये गये है । विभिन्न नक्षत्रौ
का आदि, मध्य्, अंत नाड़ी मेँ विभाजन किया गया है) यह आयुर्वेद की
प्रकृति नाड़ी वात, पित्त, कफ से मिलती है।
एक ओर जहो वर--कन्या के गणो का एक होना शुभ माना गया है,
वहीं दोनों की नाडियों कं एक हीने पर विवाह की वर्जना की गयी है।
यौ प्रस्तुत है, नक्षत्रौ का आदि, मध्य, अत नाडी में विभाजनः-
आदि नाडी ` अश्वनी, आद्रा, पुनर्वसु, उ.फा., हस्त, ज्येष्टा, मूल,
शतभिषा, पूर्वामाद्रपद
मध्य नाड़ी : भरणी, मृगशिरा. पुष्य, पूफा. चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढा,
धनिष्ठा, उत्तराभाद्रपद
अंत नाड़ी : कृत्तिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढा,
श्रवण्, रेवती
सर्वतोभद्र चक्र क्यादै ?
"फल दीपिका" के अनुसार, यह चक्र तीनो लोकों को प्रकाशमान करने
वाला है! सर्वतोभद्रं चक्र का उपयोग गौचर फल कहने के लिए किया जाता
है। इस सर्वतोभद्र चक्र का निर्माण इस प्रकार किया जाता है
सर्वप्रथम दस खडी एवं दर रेखाएं बना कर &1 वर्गो वाला एक चक्र
तैयार किया जाता हे } ईस शीर्षस्थ अर्थात् ऊपर वाली दिशा को उत्तर,
उसके बाद दायीं दिशा को पूर्व, बायीं दिशा को पश्चिम तथा ठीक सामने
वाली दिशा को दक्षिण दिशा माना जाता है।
इसके उपरांत उत्तर पूर्व कोण मे "अ" दक्षिण पूर्व मे आ दक्षिण पश्चिम
मँ इ एवं पशचिमोत्तर कोण मेँ 'ई' अक्षर लिखे जाते हैँ
ग्रहो की महादशा एवं नक्षत्र
भारतीय ज्योतिष मेँ अनेक प्रकार की दशाओं के उल्लेख मिलते हैँ !
किसी भी जातक के जीवन मै कब कौन-सा ग्रह प्रमुख प्रभाव लते हुए
शुभ या अशुभ फल देगा, यह उस व्यक्ति के जीवन मे आने वाली ग्रहौ की
महादशा सरे जानने का प्रयत्न किया जाता है।
ज्योतिष-कौयुदी : (छह-२) नभैत्रविवार ४ २
इन सभी दशाओं मे नक्षत्र मह्पपूर्ण भूमिका निभाते हे}
यौ प्ररतुत है. विभिन्न दशाओं का परिचय
किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र ने होता है, उसी नक्षत्र
के स्वामी ग्रह की दशा का उसके जीवन मे प्रारम मान लिया जति। है।
जैसा कि पहले कहा गया है, नक्षत्र 27 होते है । इन सत्ताइस ग्रहों का
स्वामित्व तो ग्रहों को दिया गया है। यथा-यर्हो केवल विशशोतरी में दहै ये
स्वामी।
सूर्य के स्वामित्व कं नक्षत्र हैँ : कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी एवं पूर्वाषाढा ।
चंद्रमा का जिन नक्षत्रौ पर आधिपत्य माना गया है, वे रहैँ-रोहिणी, हस्त
एष श्रवम।
मंगल के नक्षत्र है-मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा।
बुध के नक्षत्र है-अगश्लेषा, ज्येष्ठा एवं रेवती ।
गुरु के नक्षत्र है-पुनर्वसु, विशाखा तथा पूर्वाभाद्रपद 1
शुक्र के नक्षत्र है-मरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा ।
शनि को जिन नक्षत्रों का स्वामित्व प्रदान किया गया है, वे है-पुष्य,
अनुराधा एवं उत्तरा भाद्रपद |
राहु के नक्षत्र हैँ- आर्द्रा, स्वाति तथा शतभिषा ।
केतु के नक्षत्रौ मे अश्विनी. मघा एवं मूल की गणना होती है!
विशोत्तरी दशा पद्धति मेँ जातक की आयु कौ 120 वर्ष की मान कर
विभिन्न ग्रहौ का दशाओं मे इन वर्षो का काल-विमाजनं किया यया है।
जेसै- ,
सूर्यकी महादशा 6 वर्ष
चंद्र की महादशा 10 वर्ष
मंगल की महादशा 7 वर्ष
राहु की महादशा 18 वर्षं
गुरु की महादशा 18 वर्ष
, शनि की महादशा 19 वर्ष
बुध की महादशा 17 वर्ष
केतु की महादशा 7 वर्ष
शुक्र की महादशा 20 वर्ष
इस तरह यदि किसी जातक का जन्म कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी या
पूर्वाषाढा मेँ होगा तो जन्म के रसमय उत्ते सूर्यं की 6 वर्ष की दशा का प्रारंभ
माना जाएगा।
ज्योतिष-कौमुदी (छर) नक-दिवार छ ४१
इसी तरह यदि रोहिणी, हस्ते या श्रवण नक्ष भ जन्म होगातो चद्रकी
20 वर्ष की महादशा लगेगी ।
इसी प्रकार मृगशिरा, चित्रा या धनिष्ठा नक्षत्र मे जन्म होने पर मंगल
की6 वर्ष की।
आश्लेषा, ज्येष्ठा या रेवती नक्षत्र मेँ जन्म होने पर बुध की 47 वर्ष की।
पुनर्वसु, विशाखा या पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र मे जन्म होने पर गुरु की 16
वर्ष की)
भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा नक्षत्र मे जन्म होने पर शुक्र की 20
वर्ष की।
पुष्य, अनुराधा या उत्तराभाद्र नक्षत्र मे जन्म होने पर शनि की 19
वर्ष की।
आर्द्रा, स्वाति या शतभिषा नक्षत्र मै जन्म होने पर राहु की 18 वर्ष की,
तथा
अश्विनी, मघा या मूल नक्षत्र मे जन्म होने पर केतु की 7 वर्ष की दशा.
का प्रारंभ माना जाएगा।
विशेत्तरी महादशा मे ग्रहो की महादशा का क्रम इस प्रकार रखा
सया है-कारण? इसका आधार नक्षत्र है।
सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु. शनि, बुध, केतु एवं शुक्र।
दूसरे शब्दों मेँ यदि सूर्यं की दशा मे जातक का जन्म हुआ तौ आनै
वाले जीवन मेँ ग्रहों की महादशाएं उपरोक्त क्रम मे आएगी ।
अब यदि किसी जातक का जन्म गुरु की महादशामेंहोतारहैतौ
उपरोक्त क्रम के अनुसार गुरु के बाद शनि की, फिर बुघ केतु, शुक्र, सूर्य,
चंद्र, मंगल, राहु की दशा आएंगी । यही सिद्धांत अन्य ग्रहों की जन्म समय
की महादशा के बाद लागू होगा।
इस तरह हम देखते है किं महादशा के निर्धारण मेँ नक्षत्रों की एक
विशिष्ट भूमिका होती है|
हम नक्षत्र का चरण ज्ञान कैसे जान सकते हैँ 2
नक्षत्र के चरण ज्ञान की विधि इस प्रकार है:
किसी भी नक्षत्र के कुल समय अर्थात् भमोग मान को चार से विभाजित
करने पर उस एक चरण का समय पर भोग जाना जा सकता है। चार से
भाग इसलिए कि प्रत्येक नक्षत्र मे चार चरण माने गये है. या उसके अंशो
को चार हिस्सोमें बांटा गया है)
ज्योतिव-कौमुदी ` (वलड-1) नसत्-विचार ब 84
उदाहरण कं लिए किसी का जन्म कालिक भभोग या पूर्णं समय &0
घडी 40 पल है तो उसके नक्षत्र का यरण मान् इस प्रकार निकाला जा
सकता है
60.40
---- = 15.10
4
इस तरह प्रथम चरण = 15.10 तक
दूसरा चरण = 30.20 तक
तीसरा चरण = 45.3ॐ0 तक
तथा चौथा चरण = 89.40 तक होगा ।
नक्षत्र के चरण ज्ञान क्म क्या महत्व है ?
इसके लिए हमें महादशा के सिद्धांत को समञ्जना पड़ेगा] इसकी चर्चा
विस्तृत रूप सेहीकीजा सकती है। फिर भी सुविधा के लिए हम्
आवश्यक जानकारी सार रूप मेंहीदे रहे हँ।
ज्योतिष शास्त्र मे चंद्र राशि, जिसे आम तौर पर जन्म राशि भी कहते
है, का अर्थ है, किसी भी जातक के जन्म के समय चंद्रमा किस नक्षत्र में
स्थित था! (यह नक्षत्र जिस राशि के अंतर्गत अतादहै, उस राशिकोही
उस व्यविति की चंद्र राशि या जन्म राशि मान लिया जातादहै।)
हमने यह देखा कि प्रत्येक नक्षत्र का एक ग्रह-विशेष स्वामी होता है!
जैसा अश्विनी नक्षत्र का केतु, भरणी का शुक्र ।
दशाएं भी करई प्रकार की है । उत्तर भारत मेँ विंशोत्तरी दशा का
प्रचलन है!
विंशोत्तरी दशा मेँ जातक की आयु 120 वर्षं मान कर उसका विभिन्न
ग्रहौ की मह्यदथओं मेँ विमाजन् किया जाता है ] ग्रहो की इन दशाओं की
अवधि समान नहीं है।
निम्नलिखित तालिका से पाठक यह भी जान जाएंगे कि किस नक्षत्र
भम जन्म लेने पर किस ग्रह विशेष की दशा में जन्म माना जाएगा!
न्तर 4 स्का ग्रल -दशकाल
कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा सूर्य 6 वर्ष
सेहिणी, हस्त, श्रवण चंद्र 10 वर्ष
मृगशिरा, चिन्ना, धनिष्ठा मंगल 7 वर्ष
आर््रा, स्वाति, शतभिषा राहु 18 वर्ष
पुनर्वसु. विशाखा, पूर्वामाद्रपद गुरु 16 वर्ष
ज्योतिष-कौुदी : (खड-१ नक्षज-विचार त्र 5
पुष्य. अनुराधा, उत्तराभाद्रपद शनि 19 वर्ष
आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती बुध 17 वर्ष्
मघा, मूल, अश्विनी केतु 7 वर्ष
पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, भरणी शुक्र 20 वर्ष
प्रश्न किया जा सकता है कि क्या किसी नक्षत्र विशेष मै जन्म लेने पर
जातक को उसके स्वामी ग्रह की पूरी अवधि की दशा लगती है या उसका
कुछ भाग।
क्योकि कडलियों मँ अक्सर 'भुक्त' एवं भोग्य काल का उल्लेख होता
है । तो -भुक्त' एवं 'भोग्य' से क्या तात्पर्ये है?
यह कोई पेचीदा विषय नहीं है । 'मुक्त' का सामान्य अर्थ है, मोगा
हुआ! ओर भोग्य का अर्थ है-जिसे भोगा जाना है।
नक्षत्रों का कारकत्व
भारतीय ज्योतिष मे जिस तरह ग्रहों को कछ बातो. कुछ वस्तुओं का
कारक माका गया है, उसी प्रकार नक्षत्रौ का भी कारकत्व निधरित किया
सया है। कारक का सामान्य अर्थ है
यर्हो हम विभिन्न नक्षत्रों के कारकत्वे का परिचय प्रस्तुत कर
रहे है
अश्विनी (केतु) : वैद्य, सेवक, वैश्य, स्वरूपवान पुरुष, अश्व,
अश्वारोही ।
भरणी शुक्र) : आसक्ति . युक्त. गुण हीन व्यक्ति, मांस भक्षी, ऋर
कर्मी!
कृत्तिका (सूर्य) : द्विज. पुरोहित, ज्योतिषी, कुंभकार (कुम्हार) नाई,
श्वेत पुष्प |
रोहिणी (चंदर) : राजा, धन- संपन्न व्यविति, योगी, कृषक, दुकानदार,
सुव्रती ।
मृगशिरा (मंगल) : कामी, वस्त्र, पदम, फल-फूल वनचर मृग, नभचर
क्षी)
अद्रा (राहु) : भरणी --उच्चाटण प्रिय, मिथ्यामाषी, परनारी आसक्त!
पुनर्वसु (गुरु) : राज्य सेवक, बुद्धिमान, यशस्वी, धनी, सत्यवादी, उदार
पुष्य (शनि) : मंत्रज्ञ, मष्ुआरे, यज्ञ के प्रति आसक्तं, साधु. अन्न, (जौँ
गेरहू, चावल) ईख। †
ज्योतिष-कौरुरी < (व्ड-१/ नक्तत्र-विवार त 36
आश्लेषा (बुध) : वैद्य, परधनहर्तर, कद- मूल, कीट-सर्प, विष-तुष
धान्य।
मधा (केतु) : स्त्री देषी, पितृभक्त, वैश्य, पर्थतवासी, धन--धान्य संपन्न,
अन्न- मंडार ।
पूर्वा फाल्गुनी शुक्र) : गायक, नटनी, शिल्पी, नमक, कपास।
उत्तरा फाल्गुनी (सूर्य) : पवित्र, विनयी, दानी, शास्त्रज्ञ, स्वघर्मानुरागी ।
हस्त (चंद्र) : वेदज्ञ, ज्योतिषी, वणिक, मंत्री, शिल्पी, चोर।
चित्रा (मंगल) : गणितज्ञ, मणि, अंगराग।
स्वाति (राहु) ; निपुण व्यापारी, अस्थिर स्वमाव वाले, मृग, अश्व, पृथ्वी!
विशाखः (गुरु) : अग्निमूलक, अन्न- मूग, उडद, चने, तिल, लाल वर्णी
फूल।
अनुराधा (शनि) : साधु--संतौ के प्रति प्रेम वाले, शूरवीर, महानायक ¦
ज्येष्ठा बुघ) : कुलीन, यशस्वी, धनी, किजिय कामी नरेशं, सेनानायक,
परधन-हर्ता।
मूल (केतु) : धनी, वैद्य. फूल, फल, बीज ओर कंदमूल से आजीविका
चलाने वाले (मातली) ।
पूर्वाषाढा (शुक्र) : सत्यवादी, धनी, मृदु, सेतु-निर्माता।
उत्तराषाढा (सूर्य) : तेजस्वी, वीर, देवमक्त, मंत्री, मल्ल. अश्व ।
श्रवण (चंद्र) : भगवद् मक्त, सत्यवादी, कर्मठ, परिश्रमी, मायावी ।
धनिष्ठा (मंगल) : शांतिप्रिय. दानी, स्त्री देषी, भानं रहित |
शतभिषा (राहु) : कलाकार, मछलीमार्, शकुन जानने वाले
पूर्वामाद्रपद (गुरु) : हिंसक, नीच, पशुपालक, शठ ।
उत्तराभाद्रपद (शनि) : दानी, वैमवशाली, तपस्वी, पाखंडी ।
रेवती बुध) : वैश्य, केवट, जल मेँ उत्पन्न वस्तु पर आश्रित)
क्या राशिर्यो की तरह नक्षर््नो की भी शरीर मेँ स्थिति मानी मयी दै ?
हौ. सशियों की भाति शरीर कं विभिन्न अंगों मे नक्षत्र की स्थिति मानी
गयी है। एसा माना जाता है कि किसी अशुभ ग्रह का नक्षत्र पर प्रमाव,
शरीर के उस अंग को भी प्रमावित करता है, जहौ उस मक्षत्र विशेष की
स्थिति मानी गयी है।
नक्षत्रों दारा प्रभावित होने वाले शरीर के अंग इस प्रकार हें :-
1. अश्विनी : चैरोंका ऊपरी भाग
2 भरणी : पैरों का निचला भाग
ज्योतिष-कोयृदी ˆ (व्व) मसत्र-विवार अ 37
3. कृत्तिका
4. रोहिणी
5. मृगशिरा
6. आर्द्रा
7, पुनर्वसु
8. पुष्य
9. आश्लेषा
10. मघा
11. पूर्वा फाल्गुनी
12. उत्तर फाल्गुनी
13. हस्त
44. चित्र
15. स्वाति
18. विशाखा
17. अनुराधा
18. ज्येष्ठा
49. मूल
20. पूर्वाषाढा
21. उत्तराषाढा
22. अभिजित
23. श्रवण
24. धनिष्ठा
25. शतभिषा
26. पूर्वाभद्रपद
27. उत्तरामाद्रपद
28. रेवती
: भोहि
: सिर
माथा (ललाट)
नेत्र
: नाक
: चेहरा
: कान
: ओंठ एवं वुद्डी
: दायां हाथ
: बायां हाथ
: हाथों की अंगुलियां
: गर्दन (गला)
: फेफडे
: वक्षस्थल
: उदरं
दायां भाग
: बायां हाथ
: पृष्ठ भाग (पीठ)
: कमर भाग (कमर)
मस्तिष्क
: गुप्तांग
गुदा
: दायीं जांघ
: बायीं जांघ
पिंडली का अगला हिस्सा
; एडी (टना भी)
आपने पहले 27 नक्षत्रौ की चर्चा की है 1 लेकिन यहाँ एक अतिरिक्त
नक्षत्र अभिजित का भी समावेशदै ? ठेसा क्यो ?
ज्योतिष शास्त्रे मेँ आम तौर पर 27? नक्षत्रों काही प्रचलन है पर
ज्योतिर्विद उत्तराषाढा नक्षत्र की 5 ओर श्रवण नक्षत्र की शुरू की चार
घडियो को मिलाकर 19 घडी के अभिजित नक्षत्र की भी नक्षत्र मंडल में
गणना करते है!
न्योतिष-कौमुदी ` (छंड-2) नकतर-विचार न 38
19 घटिर्यो वाला अभिजित नक्षत्र सभी कार्यौ के लिए शुम माना
गया है। मध्य रात्रि व दोपहर मेँ लगभग अभिजीत मुहुर्त होता हे ] भगवान
श्री राम ओर भगवान कृष्ण इसी मुहूर्तं मे पैदा हए थे। सिक्ख धर्म के
सरदार लोग दोपहर मे इसी मुहुर्त मे शादी करते हे।
क्या कोई ग्रह किसी नक्षत्र मेँ होने से एक ही फल देता है या उस नक्षत्र
में भी उसके फरल भें अंतर आ जाताटै ? णेसाह्धेतादैतो क्यो ?
किसी भी नक्षत्र मे कोई रह एक जैसा फल नहीं देता। ग्रह विशेष
नक्षत्र के किस चरण में स्थित है ओर उस चरण विशेष का स्वामी ग्रह कौन
है, उस चरण-स्वामी ग्रह से नक्षत्र स्थित ग्रह के कंसे संबध है, दोनों शुम
है, दोनो अशुमहै, या दोनौ मै मैत्री हैया शत्रुता है, आदि का अध्ययन कर
फल का निर्णय किया जाता है।
नक्ष्जो के चरणो के स्वामी-ग्रहोँ के बारे में बताएं ।
प्रत्येक नक्षत्र की चर्चा करते हुए हमने अगे के पूष्ठोँ मेँ उनके चरणों
क स्वामी- ग्रहो की भी जानकारी दी है। "जातक सारदीप' का अध्ययन हरे
ङस विष्य को समञ्लने मे सहायक हो सकतः है ! उसमे बताया गया है कि
किस नक्षत्र-विशेष के चरण विशेष में स्थित ग्रह उस चरण कं स्वामी ग्रह
के कारण कैसा प्रमाव डालता है।
निस्संदेह यह एक सूक्ष्म अध्ययन है ! ओर हमें ज्योतिष ग्रंथ क्तओं के
अध्ययन, शोध पर आधारित फल निर्णयौँं के पीठे छिपी वैज्ञानिकता ओर
तार्किकता का कायल होना ही पड़ता है]
य्ह सारांश में नक्षत्र के चरणों कं स्वामीः- ग्रह का परिचयः पाठक
जब आगे विभिन्न नक्षत्रौ के चरणों मँ स्थित ग्रहौ कं फलों को पठे, तौ
उसके साथ उस चरण-विशेष कं स्वामी-ग्रह के गुण-धर्मों के संदर्भ में
वर्णित फल को कसौटी पर कसने का प्रयत्ने करे ।
नक्षत्र स्वामी स्ह चैर्ण एवं स्वामी ग्रह
अश्विनी केतुः प्रथमः मंगल, द्वितीयः शुक्र, तृतीयः बुघ, चतुर्थः चंद्र
भरणी शुक्र. प्रथमः सूर्य, दवितीयः बुध, तृतीयः शुक्र. चतुर्थः मंगल
कृत्तिका सूर्य, प्रथमः गुरु, द्वितीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः गुरु
रोहिणी चंद्र. प्रथमः मंगल. द्वितीयः शुक्र, तृतीयः बुघ, चतुर्थः चंद्र
मृगशिरा मंगल, प्रथमः सूर्य, द्वितीयः बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल
ग्योतिव-कौमुदी : (डय) नकषश्र-विचार न 89
आर्द्रा राहु, प्रथमःगुरु, द्वि तीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः गुरु
पुनर्वसु गुर, प्रथमः मंगल, दितीयः शुक्र, तृतीखः वृध, चतुर्थः चंद्र
पुष्य शनि, प्रथमः सूर्य, दितीयः' बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल
आश्लेषा बुध, प्रथमः गुरु. द्वितीयः शनि, वृततीयः श्नि, चतुर्थः गुरु
मघा केतु. प्रथमः मंगल, द्वितीयः शुक्र, तृतीयः बुध. चतुर्थः चंद्र
पूर्वा फाल्गुनी शुक्र, प्रथमः सूर्य, दवितीयः बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल,
उत्तरा फाल्गुनी धूर, प्रयमः गुर, द्वितीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थ मुरु
हस्त चंद्र, प्रथमः मंगल, द्वितीयः शुक्र. तृतीयः बुध. चतुर्थः चंद्र
चित्रा मंगल, प्रथमः सूर्य, द्वितीयः बुघ, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल
रवाति राहु, प्रथमः गुरु. द्वितीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः गुरु
विशाखा गुर, प्रथमः मंगल, द्वितीयः शुक्र, तृतीयः बुध, चतुर्थः चंद्र
अनुराधा शनि, प्रथमः सूर्य, दितीयः बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल
ज्येष्ठा बरघ, प्रथमः गुरु, दि तीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः मुरु
मूल केतु. प्रथमः मंगल, दितीयः शुक्र, तृतीयः बुध, चतुर्थः चंद्र
पूर्वाषाढा शुक्र, प्रथमः सूर्य, द्वितीयः बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल
उत्तराषाढा सूर्य, प्रथमः गुरु, द्वितीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः गुरु
श्रक्ण चंदर, प्रथमः म॑गल, द्वितीयः शुक्र, तृतीयः बुध, चतुर्थः चंद्र
घनिष्ठा मंगल, प्रथमः सूर्य, द्वितीयः बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थः मंगल
शतभिषा राहु, प्रथमः गुरु, द्वितीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः गुरु
पूर्वा माद्रापद रुरु, प्रथमः मंगल. दितीयः शुक्र, तृतीयः बुध, चतुर्थः चंद्र
उत्तरा भाद्रापद शनि, प्रयग: सूर्य, दवितीयः बुध, तृतीयः शुक्र, चतुर्थ मंगल
रेवती बुघ, प्रथमः गुरु, दितीयः शनि, तृतीयः शनि, चतुर्थः गुरु
ग्रहों को चरणों का स्वामित्व किस आधार परं दिया गया, यह एक
विचारणीय प्रश्न है ? ज्योतिष शास्त्र को पढ़ते समय मन में एसी प्रत्येक
जिज्ञासाएं कथी-कभी सनातन प्रश्न का रूप ले लेती है । उनका समाधान
कोई अनुभदी, अध्ययन एवं शोधप्रिय ज्योतिष ही दे सक्ता है ।
हमारा प्रयत्न यही है कि हम पाठकों के लिर् अध्ययन योग्य सभी
सामग्री एक जगह रखे ताकि प्रबुद्ध पाठक इस संबंध ने अधिकं अध्ययन एवं
शोध कं लिए प्रवृत्त हों।
नक्षर्जो के नौ भेद
नक्षत्रों कौ तारा का अर्थः (कौन सी तारा जन्म की मुहुर्त की)
तारा नौ प्रकार की मानी गयी है: ।
ज्योतिष-कोगु्ी (श्वर र्फक-किवार छ 40
1. जन्म, 2. सम्पत, 3. विपत, 4. क्षेम, 5. प्रत्यरि, 6. साधक, 7. वध
8: भित्र, 9. अतिमि> ] (केवल मुहुर्तं शास्त्रों मे)
नाम दही इन ताराओं का अर्थं एवं महव स्पष्ट केर देते है । जन्मे नक्षत्र
1 सै इष्ट दिवस तक नक्षत्र संख्या गिनकर उसमे नौ का भाग देने पर शेष
तुल्य तास प्राप्त होती है। 3, 5, 7 संज्ञा वाली ताराओं को छोडकर शेष
ताराएं अर्थात् 1, 2, 4, 8, 8, 0 तासं शुभ होती ह!
3, 5, 7 ताराओं मँ यात्रा, विवाह, आदि प्रतिबंधित माने गये है।
लेक्षों का नेष्ट काल
किसी भी व्यवित्त के जन्म नक्षत्र के संदर्भ मै कुष अन्य नक्षत्रों के चरण
विशेष उस व्यविति के लिए अशुमं माने गये हैँ । जैसे-जन्म नक्षत्र से ग्यारह,
ारहवे एवं इक्कीसपे नक्षत्र के प्रथम चरण को घातक या अशुम माना गया है ।
उदाहरण के लिए यदि किसी का जन्म अश्विनी नक्षत्र मे हुआ दहै तो
उसके लिए अश्विनी से ग्यारह नक्षत्र मेँ पूर्वा फाल्गुनी एवं डारहवे नक्षत्र
मं उत्तरा फाल्गुनी तथा इक्कीस नक्षत्र मेँ उत्तराषाढा का पहला चरण
अशुभ होगा।
इसी तरह किसी भी जन्म नक्षत्र से चौथे एवं चौदष्वे नक्षत्रौ का दूरा
चरण तथा सातवे, सौलहवे एवं चौबीसवै नक्षत्र का तीसरा चरण तथा
सत्रहवे नक्षत्र का चौथा चरण अशुम होगा।
4, 11, 17, 24 सुविधा के लिए सूत्र रूप मे-
जन्म नक्षत्र से 44, 12, श्वे नक्षत्र का प्रथम चरण
जन्म नक्षत्र से 4, 14 नक्षत्र का दूसरा चरण
जन्म नक्षत्र से 7, 16, 24वे नक्षत्र का तीसरा चरण
जन्म नक्षत्र से रत्वे चरण का चौथा चरण्
पाठक चाहं तौ किसी भी वांछित वर्षं मे इम नक्षत्रौ के चरणों का काल
लिख ले ओरं इन चरणों के अशुभ समय में साक्धान रहें । पंचांग मे प्रत्येक
नक्षत्र का कौल समय दिवा जाताहै।
भारतीय ज्योतिष के अनुसार किसी भी व्यक्ति का जन्म किसी न किसी
नक्षत्र के काल भ होता है। व्यक्ति का जन्म जिस नक्षत्र ने होता है, उसे
आद्य नक्षत्र {आधान नक्षत्र) या आदि नक्षत्र कहते है!
आद्य नक्षत्र से दस्वँ नक्षत्र को कर्म नक्षत्र कहा गया है । (आद्य नक्षत्र
भी कर्म नक्षत्र कहलाता है) । इसी तरह इसं जन्म नक्षत्र से सोलवां नक्षत्र
साधातिक नक्षत्र, अटारहवां समुदाय नक्षत्र, तेदसवां वैनाशिक नक्षत्र, पच्चीसवां
स्योतिष-कीमुदी : (खड-1) नक्षत-किचार छ 41
मानस नक्षत्र कहलाता है । 19वां नक्षत्र आधाने नक्षत्र कहलाता है।
उपरोक्त छह नक्षत्र अशुभ माने गये ह तथा उनम शुम कार्यं नहीं करना
चाहिए । यदि ये नक्षत्र 'पीडित' हैँ तो विशेष अशुभ फल मिलते है । जैसे
आद्य नक्षत्र पीडित हो तो रोगादि के अतिरिक्त घनक्षय होता है । कर्म नक्षत्र
आदि अशुभ स्थितिमेहैतो संकल्प पूरे नहीं होते, सार रूपमे कर्मो काक्षय
या हानि होती हे। सोलह नक्षत्र-साघातिक नक्षत्र के पीडित नेसे
संबंधियों कं व्यवहार से हानि उठानी पडती है ] अठारह नक्षत्र समुदाय
नक्षत्र के पीडित होने से सुख मेँ न्यूनता आती है। तेडसवे नक्षत्र वैनाशिक
नक्षत्रे के पीडित होने पर व्थाधि, मृत्यु आदि के योग बनते है तथा पच्चीसवे
नक्षत्र मानस नक्षत्र के पीडित होनै फर व्यक्ति मानसिक क्लेश, चिंताओं से
मुक्त रहता है।
उदाहरण कं लिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म अशिवनी नक्षत्र मे हुआ
है तो यह नक्षत्र अर्थात् अश्विनी नक्षत्र उसके लिए आद्य नक्षत्र होगा।
अश्विनी से दसवां नक्षत्र मघा कर्म नक्षत्र. सोलहवां विशाखा नक्षत्र
साघातिक नक्षत्र, अठारहवां ज्येष्ठा समुदाय नक्षत्र, तेहसवां धनिष्ठा वैनाशिक
नक्षत्र ओर पच्चीसवां पूर्वाभद्रपद मानस नक्षत्र माना गया है]
अन्य नक्षत्रों मे जन्म होने पर इसी क्रम से उपरोक्त नक्ष्रों का पता
लयाया जा सकता है।
नक्षत्र पंचक
ज्योतिष शास्त्र मँ पांच नक्षत्रौ को पंचक नक्षत्र की संज्ञा दी गयी है।
इन नक्षत्रों मै कुछ कार्यो को करने का निषेध है ¡ जैसे-आवास निमणि के
लिए लकड़ी आदि का क्रय या संग्रह, दक्षिणदिशा की यात्रा, मृतक का
दाह, घर छवाना या छत डालना, खाट बुनवाना, चूल्हा बनाना, छ्ञाङ्
खरीदना आदि]
ये पांच नक्षत्र है
1. धनिष्ठा, 2. शतभिषा, 3. पूर्वामाद्रपद, 4. उत्तराभाद्रपद, 5. रेवती ।
इनमे हानि या लाभ र्पौच गुना होताहै।
नक्षेत्र एवं रोग
नक्षत्र के कारण व्यक्ति रोगादि से भी पीडित होता है तथा उसके
निवारण के लिर् जङ़ी-विशेष करो शरीर पर धारण करने एवं नक्षत्र कं
देवता का मंत्र जाप करने सेरोग दूर हो जाते हे, ठेस विश्वारा है।
पाठकों के लाभार्थं यँ सारांश में प्रस्तुत हे, विभिन नक्षत्रौ के पीडित
होने के कारण हौ सकने वाले रोग आदि एवं निवारण के उपायः--
ज्योतिक-कीगृदी : (ठ्ड-2) नक्षने-विचार अ 42
अश्िनीः
वायु प्रकोप. अनिद्रा. मतिभ्रम, बुखार 1
उपचारः चिरचिटे की जड़ को चौहरा कर मुजदंड मेँ बाधने से लाम।
मंत्रः फे अश्विना तेजसा वकु प्राणेन तरस्वी वीर्यम् कान्द क्लेनै्राय
दश्ुचिन्धिवम्/ छँ अशिविनीकुमाराभ्यो नमः
जप संख्याः 5.000 बार |
भरणीः
आलस्य, तीव्र ज्वर. शरीर-प्रकंपन !
उपचारः आक के पेड की जड़ को तिहरा कर पहनने से लाभ।
मंत्रः यमाय त्वा मरखाय त्वा सूर्वप्य त्का तयते देवस्त्वा सविता मध्वा
नन्तु/
फथिव्या स्युस्याहि अर्वति शोचसि तणेलि/ र यमाय नकः /
जपं संख्याः 10.000 बार ।
कृत्तिकाः
नेत्र पीडा, अनिद्रा, शरीर मे जलन, घुटने मेँ दर्द।
उपचारः कपाल की जड तिहरा कर भुजदंड मे बाधे ।
मतरः कँ अगिनूर्धा दिवः ककुत्पतिः पथिव्या अयम् / अग रतानि िन्वति/
कं अन्तये न्मः ८
जप संख्याः 10.000 बार !
रोहिणीः
ज्वर, सिरदर्द, घबराहट }
उपचारः चिरचिटे की जड़ को तिहरा बनाकर बांह मे पहने ।
मंत्रः ऊं बह्यण्ानं प्रथम पुरस्ता द्िरीग्ठः छुख्यो केन अक /
छदृधन्या उपमाः अस्यविष्ठा' सतश्च फोतिसतश्वं विदः
छँ ब्रह्मणे नमः
जप संख्याः 5,000 बार ।
मूगशथिराः
नजला, जुकाम, खांसी, ताप, मलेरिया, जलमय ।
उपचारः जयंती घास की जड को चौहरा कर पहनें ।
मंत्रः ठँ इमं देका असपत्नः दुवघ्वं महते क्षय महते ज्येष्छगाव महते
जानराज्यायेन्ास्येदियाथ/
ङ्म मनुष्य पु्रमपरवयै पुत्र मस्य विष एक कोऽरी राणा सोमोऽस्माकं
बराह्मणस रजा/ फे चरसे नमः
जप संख्याः 10.000 बार]
ज्योतिष-कुदी : (ख) नकक-विवार ४ 43
अर्द्राः
ज्वर, नजला, अनिद्रा, आध्ाशीशी का दर्द,
उपचारः चंदन का लेप, पीपल की जड बुहरी कर दाये हाथ मे बाधे।
मत्र: ऊ नमस्ते रुद्रमन्यव उक्तोत इक्तै =^
बहुम्याुत ते नक ८ क सुव्रौय नमः /
जम संख्याः 10.000 बार
पुनर्वसुः
बुखार, सिर-कमर मे दर्द,
उपचारः आक क पौधे को रविवार को पुष्य नक्षत्रे मेँ उखाडकर चौहरा
कर भुजदंड म बाधे!
मंत्रः ऊ अदिरिधोरदितिरन्तद्धिमदिति्मति सणि सपत्र
दिण्वेदेका अदितिः फक्जमा अदिति कतमदेरजननित्वम्
अदित्या नमः
जपसंख्याः 10.000 बार
पुष्यः
तीव्र ज्वर, शूल, दर्द-कष्ट
उपचारः कुश की जड़ को चौहरा कर भुजाओं मे बधि।
मंत्रः ऊँ बृहस्पते अतियदर्योअहरदिद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु ।
पदीदयच्छव स ऋतुप्रजातदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम ।
ऊ गुरवे नमः
जप संख्याः 10.000 बार ।
आश्लेषाः
रोगों का आधिक्य ! सर्वाग पीडा। सर्पं मय, विष भय।
उपचारः पटोलमूल को पंचहेरी कर भुजाओं मे बधि ।
मेत्रः छ नोस सफष्यो ये क च पएथकीमनु ये अतच ये दिवि तेम्यः
सपेभ्यो नमः/ छँ सर्पेभ्यो नरः ८
जप संख्याः 10.000 बार ।
मघाः
आधाशीशी का दर्द।
उपचारः भृंगराज की जड को चौहरा कर दोनो भुजा मे बधिं |
ग्यौतिष-कोयुदी : (खड) नकषत्र-विवार @ 44
मत्र: कु च्यः स्वधयिम्यः स्वधा नमः प्रितागहेम्वः स्वपातिम्यः स्टाधा
नमः/ ।
श्रपितम्य स्काधाविभ्यः स्वपा तम; अषटन्त पितयोगीयदत शिते
व्रपतपतिर' पितरः शरन्ध्वम्/ ऊँ पितरेम्य नज
जप संख्याः 10.000 बार !
पूर्वा फाल्गुनीः
बुखार, खासी, नजला. पसली चलना।
उपचारः नीले टूल की कटैली की जड को तिहरा कर भुजाओं मे बाधे ।
मंत्रः भगद्रेतर्मयसत्य राधो भग मां धियगरदकाददन्नः भगणोजनगो
गोभिर्व्मिग्रनभिनरवतेस्याम्/ ऊँ भगाय तमः
जप संख्याः 10.000 कार ।
उत्तरा फल्युनीः
बुखार. सिरदर्द, वायु प्रकोप । पितृ पीडा।
उपचारः श्वेत आक की जड भुजाओं मै बधि।
मंत्रः देव्याकल्वदू आगतः स्थेन चुर्यत्व्ा/ मध्वा यज्ञ समज्य तग्रत्त्या
या वैनावितरम देवानाम ा/ कँ अयन्ये नमः ८
जप संख्याः 40.000 बार । (कछ विद्वान इसकी संख्या 5000 भी
मानते)
हस्तः र
उदर दर्द, पैसे मे दर्द, पसीने का आधिक्य।
उपचारः जावित्री की जड भुजाओं में बाधे ।
मंत्रः ऊ विश्राड्रहस्यतिक्टु न्य गल्वादुर्दधज्ञयत्ाठविर्हतम कातदरत्ये
यो अभि रक्षकित्मना ग्रजाः -पुफोफ पुरुषा किरजकि/
ककं सिक नमः ८
जपं संख्याः 5.000 बार |
चित्राः
अनेक रोगों की आशंका ।
उपचारः असगध की जड़ भुजाओं मे धारण कर ।
मंत्रः छ त्वष्टानुरोो अद्यत इन्रार्ती गृष्टिवर्धना हिण्दाच्छन्दऽ्डन्यमक्षा
गौनदिगोव्धु/ रँ दिश्क्कर्मणौ नसः ८
जप संख्याः 10.000 बार। (कुछ विदहटजन 5000 भी मानते है)
ज्योतिव-कौयुदी : (वव) नक्षत्रविचार न 45
स्वातिः
वायु प्रकोप, पेट मेँ अफारा, टांगौँ भे दर्द।
उपचारः जावित्री की जड मुजदंड मे बधि ।
मंत्रः फ़ करयो के ठे सहस्रिणो च्थासस्तेभिरागहि भित्युत्कान सोम
फरीतये/ ऊ कारवे नमः/
जप संख्याः 10.000 बर | (कुछ विद्टजन 5000 भी मानते है)
विशाखाः
पूरे शरीर मे दर्द। फोड़े-षएंसी आदि।
उपचारः चौटली की जड़ को भुजदंड मेँ बाधे।
मंत्रः छँ ङदास्ती आगतं दुत गी्िनिमि करेण्यम् अस्यतः धियेभिता/
छँ इन्रानिम्याः नमः
जप संख्याः 10.000 बार ।
अनुराधाः
तेज बुखार, सिरदर्द ।
उपचारः गुलाब की जड भुजदंडों मे बाधे ।
मंत्रः छ ने शिकस्य करुणस्य चक्षसे ग्रहलादेकाय वटतः छर्गयतः द्र
देक्करताय केतके दिवस्पुत्राय स्रुयायि सत,
छँ करिजाय नमः/
जप संख्याः 10.000 बार।
ज्येष्ठाः
पित्त प्रकोप, चित्त मेँ व्याकुलता]
उपचारः चिरचिटे की जड चौहरी कर बाधे ।
मंत्रः ऊँ ऋतारशिनमितारमिद्र हवे हने दकं शुरभिन्दम्/
हवयामि शक्र दुरुहूतविन् स्वस्ति रो मधा शात्विन्ः/
ऊ शक्राय नमः
जप संख्याः 10.000 बार ¦ (कुछ विद्वान 5000 भी मानते है)
भूलः
सन्निपात ज्वर, उदर दर्द. मंद रक्तचाप |
उपचारः मंदार कौ जड हाथ मे बाधे।
ज्योतिष-करौृठी : (च्ड-2) नकत्न-विचार @ 46
मंत्रः कं तेव युक पर््ी युरप्यमशन्नि स्वै योनाक्मास्ख्याः ता विश्वदेव
कुभिः सकदानप्रजापनतिर्विश्व कर्न किमल्क्तुः/
निक्छतये नः
जप संख्याः 7.00 कार {
पूर्वाषादढ़ीः
सिर म दर्द, शरीर मे पीडा, केपन।
उपचारः कपास की जड़ भुजदंड मे धारण करे]
मंत्रः ऊ अबाधमयकिल्विकमपकूत्यामफोर्यः अदामागत्विमस्मदकदुःपवप्य ुव/
र अद्न्को नमः/
जप संख्याः 5,000 बार ।
उत्तराषाढाः
कटि पीडा, गठिया. प्रलाप की मनःस्थिति,
उपचारः कपास की जड चौहरी कर हाथ मेँ बधिं।
मंत्रः ऊ विश्केदेका श्रयुतेम हक ये मे अतच्छिय उग्याकिष्ठा ये अग्निजा
उत्का य ज्र आसद्यास्मिन यज्ञे वर्हिकि कादयध्वम्/
कँ विश्वेभ्यो दैवेम्यो न्मः
जप संख्याः 10.000 बार 1
श्रवणः
अतिसार, ज्वर, अनेक पीड्ाए।
उपचारः चिरचिट की जड चौरी कर भुजदंड मे बाधे!
मंत्रः ऊँ विष्णो रराटमलि विष्णोः श्नपकतेस्ीकिप्ण)ः स्युरि विष्णोष्ुगेऽणि
वेष्णकम रसि विष्णवे त्का छँ विष्णवे नमः
जप संख्याः 10.000 बार ¦
धनिष्ठाः
रक्तातिसार, ज्वरादि।
मंत्रः ऊ कसः पवित्रमसि शतधार वसोः पवित्रमसि सहस्त्र धारम्/
देकसत्वा छविता एुनादु कसौः एविकेण सत्धारेण चचुप्का कामधु /
ऊ क्टम्यो ल्मः
जप संख्याः 10.000 कार ।
ज्योततिष-कोौमुदी : (वड-१) नफत्र-विचार ब 47
शतभिषाः
सन्निपात ज्वर, वातप्रकोप, च्वर आदि ।
मंत्रः करुणस्योतम्मनमसि वरुणस्य स्कम्मसर्जकीर्यो करुणस्य
ऋतऽसदन्यासि करुणस्य ऋतमदनमसि करुष््रस्य ऋतस्तदनमासीद/
ऊ करुणाय तमः
जप संख्याः 10.000 बार ।
पूर्वाभाद्रपदः
वमन, चित्त की व्याकुलता।
उपचारः भृंगराज की जड हाथो मे बाधे।
मंत्रः ठ उत तोऽहिदुध्म्य श्रणोत्वज एकणरत्थिकी समद्र /
विश्वेदेवा ऋताव्छीन वहुकातः स्तृता क्वा कर्विशस्ता अवन्तु /
फ अजैकादे नसः/
जप संख्याः 10.000 बार । (कुछ विद्धजन 5000 भी मानते है)
उक्तयभाद्रपदः
अतिसार, षीलिया आदि
उपचारः पीपल की जड हाथ मे बधि।
मंत्रः ऊः शिवो नामासि स्वधिते षिता तमच्ते अच्त् ककहिसीः
निवर्तवाम्यायुषेऽन्नाद्छय श्रजननाय खयस्फोकथ द््रजासत्वाय
युकीयाथ/ ऊँ अहिदृध्न्ययः तसः
जपसंख्याः 10.000 बार ।
रेवतीः
चैरो मै पीडा, कयु प्रकोप, मतिभ्रम।
उपचारः पीपन की जड को तिहरा कर हाथ मे बधि।
मंत्रः फ एूषनतवत्रते क्य न िप्यिम कदाचन /
स्तोतारस्त इहस्मसि/ `
छ दृष्णे न्मः।
जपसंख्याः 5.000 बार | (कछ विहजन 10.000 भी मानते है)
॥ ग्योतिष-कोुदी : (खट) नष्ठत्-विचार ® 48
अश्विनी
राशियौ मेँ अश्विनी नक्षत्र की स्थिति 0.00 अंशो से 13.20 अंशो तक
मानी गयी है। ह
` अश्विनी के भारतीय ज्योतिष शास्त्र मेँ पर्यायवाची नाम है, तुरंग, दस्
एवं हय।
यूनानी अथवा ग्रीक उसे 'कैस्टर-पोलवंस' कहते है, जबकि अरवी मेँ
-अश शरातन"। चीनी इस नक्षत्रे को 'लियू कहते हे ।
अश्विनी नक्षत्रे मेँ तारों की संख्या मेँ मतभेद है । यूनानी, अरबी उसमे
दो तारों की स्थिति मानते है, जबकि भारतीय ज्योतिष कं अनुसार तीन तारों
को मिलाकर इस नक्षत्र की स्वेना की गयी है।
अश्विनी की आकृति अश्व अथवा घोड़े के समान कल्पित की गयी,
इसीलिए इस नक्षत्र को यह नाम् दिया गया। यो बाद में इनका संबेध
देवगण के वैद्य हय अश्विनी कुमारो से भी जोड़ दिया गया | अश्विनी नक्षत्र
से एक पौराणिक कथा भी जुडी हुई है. उसकी आगे चर्चा!
सर्वप्रथम अश्विनी नक्षत्र के ज्योतिषीय परिचयः
अशिविनी नक्षत्र के देवता है-अश्विनी कमार, जबकि स्वामी केतुकता
गया है । (केवल विंशोतरी दशा मै) ५
गण्: देव, योनिः अश्व एवं नाडीः आदि है4
नक्षत्र के चरणक्षर है-चू. चे, चौ. ला।
यह नक्षत्र प्रथम राशि मेष का प्रथम न्त्र हैः
मेष राशि मे अन्छ् नक्षत्र है--मरणी के य्य १
एक चरण) यह गंडमूल नक्षप्र कहलाता है +
न्योष (१ देवार क 4४
अश्विनी नक्षत्र रो जुडी हुईं कछ कथाएं भी दै । एक कथा कं अनुसार
सृष्टि क प्रारंम मे ब्रह्मा ने स्वयं को बहुत एकाकी पाया! अपने इसी
एकाकीपन को दूर करने के लिए उन्होने देवो की रचना की! ब्रह्मा
द्वारा जिस सर्वप्रथम देव की रचना की गयी, वही अश्वनी है, जिसके दो
हाथ
एक अन्य कथा सूर्य को अश्विनी का पिता मानती है। सूर्यं की पत्नी
का नाम संज्ञाथा। सूर्यकी किरणों का ताप न सह सकने के कारण वह
भाग कर आर्कटिक प्रदेश मेँ जाकर एक मादा-अश्व के रूप मेँ विचरने
लभी। सूर्य ने भी एक अश्व का रूप धर कर संज्ञा का पीछा किया। संज्ञा
उसे आर्कटिक प्रदेश मै मिली । यहीं दोनों के संयोग से अश्विनी कुमारो का
जन्म हुआ! यही अश्विनी कमार बाद में देवताओं कं वैद्य बने!
यह कथा इस एक ज्योतिषीय धारणा को भी पुष्ट करती है कि सृष्टि
के प्रारम मै अपने अक्षं पर घूमती पृथ्वी पर सूर्य किरणे धुवो तक पर्हुवा
करती । उस समय वसंत संपात अश्विनी नक्षत्र मे धा। उसी समय पृथ्वी पर
वन का भी प्रार॑म हुआ।
अश्विनी लक्षत मे जन्मे जातकं/जातिका
अश्विनी नक्षत्र को समूची मेष राशि का प्रतिनिधित्व करने वाला नक्षत्र
माना गया है} मेष राशि का स्वामित्व मंगलं की दिया गया है।
"जातक पारिजात मे का गया है-
अश्विन्यामति बुद्धिषित विनय प्रज्ञा यशस्वी सुखी
अर्थात् अश्विनी नक्षत्र मे जन्म लेने का फल है : अति बुद्धिमान, धनी,
विनयान्वित, अति प्रज्ञा वाला यशस्वी ओर सुखी ।
इसकी व्याख्या करते हुए स्व. पं. गोपेश कुमार ओजा लिखते हे-अति
प्रारभ मे आया है, इस कारण "अत्ति" सब विशेषणो के पहले अतिधनी भी
जुड सकता है! मूल मेँ प्रज्ञा यशस्वी शब्द आया है, जिसके दो अर्थं हो
सकते 1. प्रज्ञावान तथा यशस्वी, 2. अपनी प्रज्ञा के कारण यशस्वी (भौर
अर्थान्तर भ सुखी भी) 1 बुदधि ओर प्रज्ञा साधारणतः एक ही अर्थ मे प्रयुक्त
होते हँ परंतु यहो ग्रंथकार ने बुद्धि ओर प्रज्ञा दोनो शब्दों का प्रयोग किया
है। बुद्धि की परिभाषा है, संकल्प-विकल्पात्मकं मन विश्लयात्मकं बुद्धिः।
प्रज्ञा का अर्थ होगा प्रकृष्ट-ज्ञा नीतिज्ञ में प्रज्ञा विशेष मात्रा में होती हे।
अश्विनी नक्षत्र मँ जन्म लेने वाले जादर्कों का व्यक्तित्व सुंदर, माथा
चौडा, नासिका कछ बड़ी तथा नेत्र बड़े एवं चमकीलं होते हे!
ज्फोतिष-करेगुदी : (सर-1) नस्त्र-किवार अ 50
यद्यपि एेसे जातक प्रत्यक्ष में बेहद शांत ओर संयत दिखायी देते हँ
तथापि अपने निर्णय से कभी वे टस से मस नहीं होते! इसका कारण यह
हैकि वे कोई भी निर्णय जल्दबाजी मेँ नहीं करते। वे उसके हर अच्छे बुरे
पहलू पर विचार करने के बाद ही निर्णय करते हैँ! इसीलिए एक चार
निर्णय करने पर वै उससे पीछे नहीं हटते।
अपने निर्णयौ मे वै किसी से प्रभावित भी नहीं होते। फलतः उन्हें हदी
भी मान लिया जाता है! एसे जातकों के बरे में कहा गया है कि यमराज
भी उन्हें अपने निर्णय से नहीं डिगा सकते।
लेकिन वे व्यवहार-कुशल भी होते है तथा अपना इच्छित कार्य इस
खूबी से करते है किन तौ किसी को पता चलता है, न महसूस होता है ।
अश्विनी नक्षत्र मे जन्मे जातक "यारों के वार अर्थात् श्रेष्ठ मित्र सिद्ध
होते है ! उनकी मानसिकता समञ्जन मेँ समर्थ लोगौ के लिए वे सर्वोत्तम मित्र
ही सिद्ध होते ह! इस नक्षत्र म जन्मे जातक जिन्हें चाहते है, उनके लिए
वे सर्वस्व होम देने के लिए भी तत्पर रहते है । यही नहीं, वे किसी को
पीडित देखकर उसे सात्यना वधाने मे भी अगे होते है।
एसे जातकों के चरित्र की एक विशेषता यह होती है कि यद्यपि वे घोर
से घौर संकट के समय भी अपार धैर्य का परिचय देते हँ तथापि यदि किसी
कारणवश उन्हें क्रोध आ जाए तो फिर उन्हें संमालना मुश्किल होता है ।
इसी तरह एक ओर वे अतिशय बुद्धिमान होते हैँ तो दूसरी ओर
कभी-कभी "तिल' का भी 'ताड' बना देते हँ, अर्थात् छोटी-छोटी बातौ को
तूल देने लगते है! फलतः उनका मन भी अशांत हौ उठता है!
वे ईश्वर पर आस्था रखते है लेकिन धार्मिक पफाखंड को स्चमात्र भी
नहीं पसंद करते। परंपरप्रिय होते हुए भी उन्दँ आघुनिकता से कोई वेर नहीं
होता ।
वे स्वच्छताप्रिय भी होते हैँ तेथा अपने आसपास हर वस्तु को करीन से
रखना उनकी आदत होती है ।
शिक्षा एवं आयः अश्विनी नक्षत्र मे जन्मे जातक को 'हरफन मौला
कल्म जा सकता है अर्थात् सभी बातो मँ उनकी कुछ न कछ पैठ होती है;
शिक्षा के क्षेत्र मे उन्हें पर्याप्तं सफलता भिलती है। वे चिकित्सा, सुरक्ना एवं
इंजीनियरिंग कषँ मँ जा सकते है । साहित्य एवं संगीत के प्रति उन्हे खासा
गाव होता है । उन्की आय के साधन भी पर्याप्त होते है पर प्रदर्शन - प्रियता
पर व्यय के कारणं वे अमाव भी अनुमव करते हैँ |
कहा गया है कि अश्विनी नक्षत्र मेँ जातकों को तीस वर्ष की अवस्था
न्योतिक-कोुदी : (ल~) नतत्र-विचार ब ६1
तक पर्याप्त सष करना पडता है । कभी-कभी उनके छोटे-छोटे कराम भी
रुक् जाते है।
एसे जात्तक अपने परिवार को बेहद प्यार करते है। लेकिन केहा गया
है कि एसे जातकों को पिता से न पर्याप्त प्यार मिलता है, न कोड
सहायता! हौ, मातृपक्ष के लोग उसकी सहायता के लिए तत्पर होते हैँ!
उन परिवार से बाहर के लोगो से भी पर्याप्त सहायता मिलती है।
रसे जातको का वैकहिक जीवन प्रायः सुखी हता है । आम तौर पर
सताइस से तीस वर्ष के मध्य उनके विवाह का योग बनता है! इसी तरह
पुत्रिय की अपेक्षा पुत्र अधिक होने काभी योग बताया गया हे।
अश्विनी नक्षत्र कं विभिन्न चरणों के स्वा इस प्रकार है-प्रथम् :
मंगल, दितीय : शुक्र, तृतीय : बुध ओर चतुर्थं : चद्रभा।
अश्विनी नक्ष मे जन्मी जातिकाएं
अश्विनी नक्षत्र मे जन्मी जातिकाओं मे प्रायः उपरोक्त चारित्रिक विशेषताएं
हती है । अश्विनी नक्षत्र मे जन्मी जातिकाओं के व्यक्तित्व मेँ एक चुम्बकीय
आकर्षण होता है ! जातकों की तुलना मेँ उनकं नेत्र मीन की मांति छोटे एवं
चमकीले होते है।
अश्वनी नक्षत्र मेँ जातिकाएं धैर्यवान, शुद्ध हृदय ओर मीठी वाणी की
धनी होती हेँ। वे परपराप्रिय, बड का आदर करने वाली तथा विनम्र भी
होती है। रेसी जातिकाओं मेँ काम भावना कुछ प्रबल पायी जाती है।
एेरी जातिकाएं यदि अच्छी शिक्षा पा जाएं तो वे एक कुशल प्रशासक
भी बने सकती है| लेकिन वे परिवार के लिए अपनी नौकरी त्यागने मेभी
जही हिचकतीं ! परिवार का कल्याण, उसका सुख ही उनकी प्राथमिकता
होती है।
विवाहः कहा गया है कि एसी अतिकाओ का विवाह तेडस वर्ष के बाद
ही करना चाहिए अन्यथा दीर्घ, अवधि के लिर पति से विष्टो, या तलाक
अथवा पत्ति के चिरवियोम के भी फले बताये गये हे।
संतानः एसी जात्तिकाओं को पुत्रों की अपेक्षा पुत्रियां अधिक होती है!
वे अपनी संतान का पर्यप्ति श्रेष्ठ रीति से पालन-पोषण करती हे ।
एक फल यह कलहा सया है कि यदि अश्विनी के चतुर्थ चरण मेँ स्थित
शुक्र पर चंद्रमा. की दृष्टि पड़े अति चद्रमा तुलः रशि मेहो तो संतानेतो
अधिक होती है, पर बेच कम पतीरहै।
स्वास्थ्य: एसी जातिकाओं का स्वास्थ्य एय ठीक ही रृहताहै!जोभी
प्योतिक-कोदी : (-1/ नकक-विवर ऋ ८
व्फाधरियां होती है-वे अनावश्यक चिता एवं मानसिक अशात्ति के कारण
एसी स्थिति निर्शतर बनी रमै पर मरितष्क विकार कौ भी आशंका प्रबल
रहती हे!
एेसी जात्तिकाओं को रसोईघर मेँ भोजन बनाते वक्त आग से कषठ
ज्यादा सावधान रहने कौ चेतावनी भी दी जाती हे। वे शीघ्रदी दुर्घटनाग्रस्त
भीहो सकती है।
अश्विनी नदौत्र मे विभिन्न मरो की स्थिति के फल
अश्विनी नक्षत्र मेँ स्थित होकर ग्रह कैसा फल देते है, जातक. जात्तिका
के जीवन पर केसा प्रभाव लते है, यर्होँ प्रस्तुत है. इसका विकरण]
सर्वप्रथम अश्विनी नक्षत्र के विभिन्न चरणों कं स्वामीः
प्रथम चरणः मंगल, द्वितीय चरण : शुक्र, तृतीयं चरणः बुध एवं चतुर्थ
चरणः चंद्र।
अन्य नक्षत्रों के चरणों का स्वामित्व भी इस प्रकार विभिन्न ग्रहों को
दिया गयाहै।
इसका बड़ा महत्त्व है, क्योकि हम देखते हैँ किं कभी-कभी कोई
ग्रह किसी नक्षत्र विशेष के भिन्न-भिन्तने चस्णो में भिन्न-भिनने फल,
वहो तक कि विरेधामासी फल देता है) इसका कारण चरण-विशेष
के स्वामी ग्रह से उस ग्रह विशेष की मित्रता, शत्रुता या सम संब्धहो
सकते.हेँ।
आगे मी जब पाठक अन्य नक्षत्रौ के चरणों मे स्थित विभिन ग्रहों के
फलो को पढे तो उस चरण के स्वामी ग्रह को भी समञ्जने की चेष्टा करं!
इससे फलों का आघार बहुत कुछ समञ्ञा जा सकता है!
अश्विनी नक्षत्रम सूर्य
अश्विनी नक्षत्र मेष राशि का प्रथम नक्षत्र है ¦ मेष का स्वामी मंगल माना
सया है तथो मेष को सूर्य की उच्च राधि कांभी दर्जा दिया ग्या है।
अश्विनी के चारो चरणों मे सूर्यं कैसे फल देता है, इसे देखें ।
प्रथम चरणः अश्विनी के प्रथम चरण में जन्मे जातक हष्ट-पुष्ट,
आत्म-विश्वास से भरपूर तथा तर्क--शक्ति में प्रवीण होते है । पारिवारिक
जीवन गें संतान सै रुख भरपूर मिलता है । वे दीर्घायु. धनी-मानी भी होत्त
ह| मंगल एक तप्त ग्रह है । सूर्य भी तप्त है ! अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से य्ह
सूर्यं की स्थिति पित्त एवं रक्त--विकार की संमावना प्रबल बनाती हे । ग्रह
ग्कोतिष-कौमृदी : (खड-२१ नक्षज-किवार च 53
संकेत करते हँ ओर यदि हम इन संकेतो को समञ्जकर साक्घान रहं तो
कोड कारण नहीं कि हम उनके दुष्प्रभाव को कम न कर सवो ।
द्वितीय चरणः इस चरण मे स्थित सूर्य उतने अच्छे फल नहीं देता,
जितना कि प्रथम अथवा चतुर्थं चरण में। अश्विनी के दवितीय चरण मेँ सूर्य
की स्थिति आयु की दृष्टि से अशुभ मानी गयी हे। यदि सूर्य के साथ चंद्र
की युतिहो जाए तो अशुभ फलों मे वृद्धि होती है! हौ. सूर्यं पर मंगल की
दृष्टि या उससे युति शुभ प्ररिणाम देती है।
तृतीय चरणः यदह सूर्यं की स्थिति जातक को वैभव प्रदान करती है।
लेकिन अकेला धन या वैमव ही पर्याप्त सुख प्रदानं नहीं करता । इस चरण
मेँ सूर्य की स्थिति के दो फल बतलाये गये ह! एक तो जातक की बुद्धि
कुटिल हो सकती है ¡ दूरतरे, उसका स्वमाद ग्र ओर कभी-कभी हिंसक भी
हो सकता है { इन सब बातो का उसकं स्वास्थ्य पर भी घातक असर पडता
है} पित्त विकार, रक्त विकार उससे ग्रस्त कर सकते हैँ |
चतुर्थ चरणः इस चरण नें सूर्यं यदि 10 अंश से 11 अंश के बीच होता
है तो फल बहुत अच्छे बताये गये है । जैसे, जातक कुशाग्र बुद्धि, प्रसिद्ध
तथा नेतृत्व के गुणो से युक्त होता है । यदि वह सेना या सुरक्षा सेवाओं मे
हौ तो उच्च पद प्राप्त करता है ओर यदि सामाजिकक्ेत्र महै तो वर्ह
नेतृत्व की जिम्मेदारी बखूबी निभाता हे । अपनी समस्त जिम्मेदारियां वह
अत्यंत निष्ठा से पूरी करता है। इसका एक कारण यह भी है कि सूर्य की
एेसी स्थिति वाले जात्तक निर्मल. हृदय, धार्मिकं पत्ति के होते है । जैसे-
जैसे उनकी जीवन यात्रा आगे बढ़ती है, उन पर सौमास्य की वर्षा ष्ठाने
लगती है।
इस तरह हम देखते हैँ कि अश्विनी के प्रथम चरण अर्थात् 0000 अंश
से 3.20 अंश एवं चतुर्थं चरण 10.00 अंश से 13.20 अंश, इस्मँ भी 10.00
एवं 11.00 अंशो मेँ सूर्य की स्थिति शुम फल देती है।
अश्विनी स्थित सूर्यं पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि के फल
ग्रहों की शुभ-अशुम दृष्टि मी ग्रह-विशेष के फलो को प्रभावित करती
है प्रस्तुत है, अश्विनी स्थित सूर्यं पर विभिन्न ग्रहं की दृष्टि के फलः-
चंद्र के फल की पहले चर्या की गयी है! आयु के लिए यह अशुभ हो
सकती है।
मंगल की दृष्टि के कारण जातक क्रूर हदय हो सकतता है । कारण सूर्य भी
तप्त ग्रह है ओर मंगल भी! जत्तिक के नेत्र भी लालिमा लिखे हो सकते है।
ज्योतिष-कोपदी : (वड) नसत्-विवार ® 54
बुघ की दृष्टि शुम फल देती है । जातक का व्यकितित्व आकर्षक होता
है। जीवन भी सुख-सुविधा से पूर्ण होता है तथापि चालीस वर्ष की अयु
के कद अर्थाभाव की स्थिति बन सकती है)!
गुरु शुभ ग्रह है! सूर्यं पर उसकी दृष्टि मी शुभ प्रभाव डालती है।
जतक उदार हृदय, सत्ता से जुड़ा होता है।
शुक्र की दृष्टि जातक मे कामं भावना को कछ च्यादा ही बढातीहै।
वह काम वासना की पूर्तिं के लिए जोड-तोड मे लगा रहता है।
शनि की दृष्टि का फल अशुम बताया गया हे। सूर्य एवं शनि
पिता-पुत्र होते हुए भी एक दूसरे कं घोर शत्रु माने गये हैँ । शनि की दृष्टि
जातक को दरिद्रता की ओर ठकेती है।
अश्विनी के विभिन्न चरर्णो में चंद्र
अश्वनी स्थित चंद्र के शुम फलं प्राप्त होते है] अशिवनी में चंद्र कार्थ
है, इसी नक्षत्र मे उसका जन्म । अश्विनी नक्षत्र मै जन्मे जातक ^ जातिकाओं
की चारित्रिक विशेषताओं के संब॑घ मेँ हम प्रारंभ में ही पठ् चुके है । य्ह
अश्विनी के विभिन्न चरणों मे चंद्र की स्थिति के फलः
प्रथम चरणः यदि चंद्रमा अश्विनी के प्रथम चरण मेहो तो जातक का
व्यक्तित्व शानदार होता है । वह पिद्वानों. विशेषन्ञों की संगति पैदा करता
है। उनसे ही विचारो के आदान-प्रदान मे उसे आनंद आता है! एेसा
जातक चाहे निजी संस्थान में हो अथवा सरकारी सेवा में, उच्च पद पर
आसीन होने की क्षमता रखता हे । तथापि उसकी कार्यशैली से अधीनस्थ
कर्मचारियों मे थोडा-बहुत असंतोष व्याप्त रहता हे {
कहा गया है कि लग्नस्थ अश्विनी मँ चंद्र की गुरु के साथयुतिहोतो
जातकं 83 वर्ष तक तो जीवित रहता ही है।
द्वितीय चरणः यर्हो स्थित चंद्रमा जातक को विलासिता की ओर ले
जाता है। खान-पान का आनंद ही उसे प्रिय लगता है) देस जातक
व्यवहार-चतुर भी होता है।
तृतीय चरणः य्ह चंद्र की स्थिति हो तो जातक अत्यंत बुद्धिमानी,
सोत्साही ओर सक्रिय होता है। विज्ञान के अतिरिक्त धार्मिक ग्रथ के
अध्ययन मे भी उसकी पर्याप्त रुचि हौती है ¦ एसा जातक अपने मित्रों के
अड़े वक्त मे भी काम आताहै।.
चतुर्थ चरणः अश्विनी के अंतिम चरण मे चंद्र स्थित हौ तौ जातक
अपने ही प्रयत्नो से उच्च शिक्षण के अलावा विज्ञान की विभिन्न शाखाओं
ज्योतिष-कीमुदी ‡ (ख~) नक्षत्र-विवार 9 55
मे निष्णात होता है| 12.00 से 13.20 अंशो के मध्य जन्मे जातक चिकित्सा
के क्षेत्र मै कीर्तिमान स्थापित कर सकते हँ} यदि वे प्रशासनिक सेवामें
जाना चेतो वे व्ह भी सफल होते है।
अश्िवनी स्थित चंद्र पर विभिन्न अरहो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि जातक को उदार एवं परोपकारी बनाती दै । उसे सत्ता
पक्ष से भी अधिकार एवं अन्य बातो का लाम मिलता है!
मंमल की दृष्टि जातक के जीवन को परावलम्बी बना सकती है । उसे
दंत एवं कर्ण पीडा भी हौ सकेती है!
बुध की दृष्टि हो तो जातक का जीवन सुखी, धन-घान्य एवं यश से
परिपूर्ण रहता है। ६
गुरु की दृष्टि हो तो जातक अत्यंत विद्वान ही नही. श्रेष्ठ गुरु भी सिद्ध
होता है। समाज में उसकी काफी ऊँची प्रतिष्ठा होती है तथा उसके
अधीनस्थ कई लोग काम करते हैँ! =
शुक्र की. दृष्टि हो तो जातक धनी एवं अनेकं स्तर्यो की संगति भी
पापु है,
शनि की दुंष्टि जातक के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डलती है। वह
अनुदार भी होताः दै, साथ ही अच्छी संतान के सुख से वंचित भी।
अश्विनी के विभिन्न चरणो मेँ मंगल
अश्विनी मेँ मंगल की स्थिति को दूसरा अर्थ है, मंगल का स्वराशिस्थ
भी होना। कारण अश्विनी मेष राशि कर प्रथम नक्षत्र है ओर मेष राशि का
स्ठामी मंगल माना गया है! अतः अश्विनी मे रथितं मंगलं सामान्यतः शुम
फल ही देता है तथापि अश्विनी क द्वितीङ चरण मे मंगल की स्थिति के
अशुम फल दशयि ग्येहे।
प्रथम चरणः यदि मंगल अश्विनी के प्रथम चरण मे हो तो जातक ८ जातिका
गणित, इंजीनियरिंग एवं सैन्य सेवाओं मेँ सफलता प्राप्त कर सकते हे।
उत्तम स्वास्थ्य से युक्त एेसे लोग समाज मे भी उच्च प्रतिष्ठा पाते हैँ । अपने
कार्यक्षेत्रमेँ तो वे प्रतिष्ठितहोतेहीहै।
दवितीय चरणः यहो मंगल की स्थिति के अशुभ फल वर्णित है, यथा
दरिद्रतापूर्ण जीवन, निःसंतान होने की पीडा आदि। एसे लोमँ मे प्रतिहिंसा
की भी भावना होती हे।
तृतीय चरणः वैवाहिक एवं पारिवारिक जीवन के सुख की दृष्टि से इस
ज्योतिष-कौमुदी : (द्ड-१) नक्षतर-विवार छ 56
चरण में मंगल की स्थिति शुभ मानी ययी है! जातक को यायावरी वाली
नौकरी था व्यवसाय फ्रलप्रद हौता है! एसे व्यक्तियों मे कामभावना का भी
अतिरेक बताया गया है।
चतुर्थं चरणः खदि जातक ^ जात्तिका का जन्म 12 से 13 अंशो के मध्य
हो तो वे निस्संदेह एक सफल-कुशल इंजीनियर बन सकते हैँ ¡ उन्हे अच्छी
संतान का सुख प्राप्ते होता हे ।
अश्विनी स्थित मंगल पर विभिन्न ग्र्दो की दृष्टि
सूर्यकी दृष्टि तो जातक विद्वान, बुद्धिमान, मातृ-पिक् मक्त तथा
धन-संपदा, पारिवारिक सुख से युक्त होता हे।
चंद्र की दृष्टि वासना में वृद्धि करने वाली मानी गयी है । जातक परायी
स्त्रियो मे कुछ ज्यादा ही रुचि लेनै लगता है।
बुध की दृष्टि भी कामं भावना का अतिरेक करने वाली होती है]! यदि
अन्य ग्रहों की शुम दृष्टिनहो तो जातक प्रदर्शन प्रिय होने के साथ-साथ
वेश्यागामी भी हो सकता है ।
गुरुकीदृष्टिके शुम फल होते है। जातके का समाज मै. परिवार मेँ
मान-सम्मान होता हे, वह धन के साथ-साथ सत्ता शक्ति का भी उपभोग
करने वाला हो सक्ता हे।
शुक्र की दृष्टि उसकी विलासप्रियता बढाती है । परस्त्रियो मेँ आसक्ति
उसके लिए संकट उत्पन्न करती है ! तथापि वह जातक को समाजसेवी भी
बनाती है,
शनि की दृष्टिन हो तौ जातक पारिवारिक सुख, यहो त्क कि
मातृ- स्नेह से भी वंचित रहता हे।
उशविनी के विभिन्न चरणो में बुध
अश्विनी के दो चर्ण मेँ बुघ के शुम फल मिलते है त्थादोनें
अशुभ। द्वितीय एवं तृतीय चरण में बुध की ` स्थिति लाभदायक होती
है, जबकि प्रथम एवं चतुर्थ चरण में बुघ हो तो जातक का जीवन दुखी ही
बीतता है।
प्रथम चरणः यँ बुघ जातक कौ नास्तिक बनात्ता है { ईश्वर परस
अनास्था उसकी चुद्र वृत्तयो को भी मुक्त कर देती है । वह सुराः-सुंदरै को
शौकीने तथा अपने स्वार्थ कं लिए दूसरों से विश्वासघात भी कर सकता है!
आम तौर पर समाज मेँ वह निम्न नजरों रो देखा जाता है!
ज्योतिष-कौयुदी : (द्व) नसत-विकार छ 6?
द्वितीय चरणः द्दितीय चरण मे बुध.हो तो जातक विभिन्न विषयौ का
ज्ञान प्राप्त करता हे! उसे अच्छा संतान सुख भी मिल जाता है।
लेकिन एक फल यह भी बताया गया है कि एेसा जातक पतीस वर्ष की
अवस्था के बाद संसार को त्याग संन्यासी भी बन सकता है
तृत्तीय चरणः तृतीय चरण मेँ स्थित बुघ जातक को ईश्वरीय कृपा से
लाभान्वित करता है। वह कर््तव्यनिष्ठ तथा सभी जिम्मेदारियां बखूबी
निभाना जानता है । एसे जातकों को पुत्रों की संख्या.-अधिक बतायी गयी हे।
तृतीय चरण में बुध केवल स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता।
चतुर्थ चरणः यहो बुघ की स्थिति के अशुभ फल कहे गये है, यथा
व्यवसाय मे असफलता, अभावपूर्ण जीवन, चारित्रिक दोषों का आधिक्य ।
अशिवनी स्थित बुध पर विभिन्न ग्रो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि कं शुभ फल मिलते हैँ ¦! जातक सत्यनिष्ठ, परिवार एवं
संबंधियो मे प्रिय तथा शासन पक्षं से लामान्वित होता हे]
चंद्र की दृष्टि जातक को ललित कलाओं कंष्षेत्रमें ले जाती है;
संगीत के प्रति उसकी रुचि होती है ! अपनी कला से वह धनोपार्जन भी कर
सकता है ¡ वह हर तरह से सुखी होता है !
मंगल की दृष्टि भी शुम फल देती है, यद्यपि बुध मंगल को शत्रुता की
दृष्टि से देखता है तथापि मंगल की दृष्टि के कारण वह सक्तासीन लोगो
का कृपाभाजन बनकर लाभ उठा सकता है।
गुरू की दृष्टि कं भी शुभ फल मिलते है। जातक को धन-सुख के
अलावा परिवार क़ भी पूर्णं सुख मिलता है|
शुक्र की दृष्टि के फलस्वरूप उसे मान-सम्मान, यश, अर्थ सभी कुष
प्राप्त हो सकता है ¡ अपने आचरण से वह सभी का प्रिय बनक्त है।
शनि की दृष्टि के दो फल मिलते है । यदपि जातक समाजोपयोगी
कार्य करता है, तथापि परिवार के सदस्यों से पिवाद, कलह बना रहता हे ।
अश्विनी स्थित गुरु के फल
अश्विनी नक्षत्र में रिथित गुरु जातक के लिए अत्यंत शुभ होता है । वह
नक्षत्र के किसी भी चरण में स्थित हो, शुम फल ही देगा { गुरु एकं सात्विक,
शुभ अ्रह है। परंपरा से गुरु को देवता कः गुरु माना गया है, विवेक प्रदान
करने वाला] अश्विनी नक्षत्र में गुरु अपने कारकत्व के अनुसार शुभ फल
देने वाला कहा गया है।
ज्योतिष-कौयुदी : (खर-1/ नंकत-विवार अ 58
प्रथम चरणः इस चरण मे गुरु की स्थिति हौ तौ जातक कं व्यक्तित्व
मे एक चंबकीय आकर्षण होता हे । विवेकपूर्ग वाणी का घनी एेसा जात्तक
अपने आसपास के लोगौ को सहज ही प्रभावित करता है । अगर वह भाषण
करे तो उक विचारो को सुनने के लिए भीड़ एकत्र हो जाती हे! जात्तक
की अध्ययन मे गहरी सुचि होती है । दार्शनिक, आध्यात्मिक क्षेत्र मेँ उसकी
गश चैठ होती है! एक विद्वान कं रूप मेँ समाज मँ प्रतिष्ठित एेसा जातक
भौतिक उन्नति भी करता है । इसमे मित्रौ एवं अन्य लोगों की उसे पर्याप्त
सहायता मिलती है। पैतीसं वर्ष की अवस्था के बाद उसका यश षढने
लता है।
द्वितीय चरणः यहो भी गुरु की स्थिति अच्छी मानी गयी है} जातक
लेखन के क्षेत्र में प्रसिद्धि पा सकता है । उसका व्यक्तित्व आकर्षक, स्वभाव
उदार एवं परोपकारी होता दै । वह पूर्णं निष्ठा से हर कार्य करता है ! फलतः
समी के स्नेह एवं आदर का पात्र भी बने जाताहै। हौ. धन के मामले रे
उसे शायद अभावग्रस्त रहना पड़ सकेता है ।
तृतीय चरणः यहो भी गुरु जातक कौ बौद्धिक एवं भौतिक क्षेत्र
पर्याप्त उन्नति दिलात्ता है । जातक विद्वान एवं अधिकार संपन्न होता है ।
चतुर्थं चरणः यहो गुरु जातक को सर्वोत्तम फल देता है ! अर्थात् एर
ओर जहो उसे अपार कीर्ति मिल सकती है तो दूसरी ओर उसे धन का १
अभाव नहीं रहता । उसे परिवार का भी पूर्ण सुख मिलता है । उसकी संतां
भी योग्य एवं आज्ञाकारी होती हे ।
अश्वनी स्थित गुरु पर विभिन्न ग्र्दो की दृष्टि `
सूर्यं की दृष्टि जातक को सदैव वैघ कार्य करने के लिए प्रेरित की
है। जातक अवैघ कार्यो से डरता ह ! ईश्वर पर अगाध आस्था वाला सा
जातक समज मे परोपकारी कार्य भी करना याहता है।
चंद्र की दृष्टि के फलस्वरूप जातक धन, मान-सम्मान एवं य से
युक्त होता है;
मंगल की दृष्टि जातक को सत्ता पक्ष से लाम पर्हुचाती है रसा
जातक स्वमाव से कुछ उग्र, ओर कभी-कभी ऋूर भी हो सकता है
बुध की दृष्टि उरते सदव्यवहार करनै वाला बनाती है लेकिनऽसमें
ओं के निरर्थक विवादों मेँ जान-बूञ्जकर फंराने की भी प्रवृत्ति हो है।
शक्र की दृष्टि हो तो जातक स्त्रियो का प्रिय होता है। स्विंके
उययोग की सामग्री के व्यायार से बह लामान्वित भी हो सकता है
न्योतिष-कौमृदी : (घ्छ-प) नकषत्र-विः = 59
शनि की दृष्टि उसका स्वभाव कछ ऋूर बना देती हे। जातक को
परिवार का भी सुख नहीं मिलता ।
अश्िविनी नक्षत्र स्थित शुक्र के फल
अश्विनी नक्षत्र मँ स्थित शुक्र के फलस्वरूप जातक हष्ट पुष्ट, भाग्यवान.
होता है तथा उस्म कला, अभिनय के क्षेत्र म आशातीत सफलता प्राप्त
करने के साथ उच्च कौटि के चिकित्सक यः मैकेनिकल इंजीनियर बनने की
भी क्षमत्त होती है।
प्रथम चरणः इस चरण मँ शुक्र हो तो जातक सदैव प्रसन्न रहनै वाला
तथा हष्ट-पुष्ट होता है ! उसमें एक अच्छा मैकेनिकल इंजीनियर बनने की
मी क्षमता होती है। कुछ कारणों से प्रथम चरण में स्थित शुक्र को अल्पायु
का द्योतक भी कषा गया है तथापि अन्य शुम ग्रहों के कारण उसके दीर्घायु
के योग भी बताये गयेहे।
द्वितीय चरणः जातक हस्ट--पुष्ट, मिलनसार एवं परिवार के दाचि
ञे निमाने वाला होता है! उसमे लेखन-प्रतिमा होती है । भाग्य भी उसका
7थ देता है!
तृतीय चरणः इस चरण मे शुक्र हो तो जातक मेँ एक भ्रष्ठ चिकित्सक
इने की क्षमतां होती है ¡ वह बैद्धिकं प्रवृत्ति का, मिलनसार तथा सर्वप्रिय
त्ताहै।
चतुर्थ चरणः इस चरण मँ शुक्र जातक कौ कला केक्षेत्रर्मे ले जाता
है वह एक अच्छा अभिनेता या संगीतज्ञ भी बन सकता है ।
अधनी स्थित शुक्र पर विभिन्न गर्हो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि के कारणं जातक शासन पक्ष से लामान्वित होता है।
उसा पारिवारिक जीवन, पत्नी से अनवन के कारण रखी नहीं रहता।
विश्कर यदि शुक्र अश्विनी के चतुर्थ चरण अर्थात् 10.00 से 13.20 अंश
केश्परहो तो यह स्थिति ओर बनती है)
द्रकी दृष्टि हो तो जातक उच्च पद पर होता है तथापि स्त्रियौ की
गलत्पतंगति के कारण उसे अपयश का भागी बनना पड़ सकता है}
मल की दृष्टि अशुन फल देती है यथा वैवाहिक जीवन मै अनबन,
परिव्से भी सहायता नहीं तथा धन का भी अभाव।
बु की दृष्टि उसमें दूसरों की वस्तु हडपने की प्रवृत्ति पैदा करती है}
गुःकी दृष्टि शुम होती है] जात्तक को परिवार का, संतान का पूर्ण
ज्योतिष-कृदी (सड-प) नतक-किवार ऋ 50
सुख मिलता है । जीवन मे उसे सारी सुख--सुविधाएं भी प्राप्त होती हँ !
शनि की दृष्टि के विभिन्न फल होते है । एक ओर वह तस्करी जैने
कार्यो मे जुट सकता है तो दूसरी ओर उसमे अपने नही, दूसरों के धन को
बांटने की प्रवृत्ति होती है । एेसा जातक अपना धन छिपाकर रखता है ।
अश्विनी स्थित शनि के फल
अश्विनी स्थित शनि के मिश्रित फल मिलते है । कुछ अच्छे, कुछ दुरे;
जैसे प्रथम चरणं मे जातक का बचपन अभाव ग्रस्त रहता है । लेकिन बाद
मे जीवन सुखी हो जाता। `
प्रथम चरणः यद्यपि जातक दीर्घायु होता है तथापि जीवन प्रारभ मेँ
दुखी रहता है ! मध्य आयु के काद जीवन में सुख ओर स्थिरता आती है।
एसे जातकं की इतिहास मे गहरी रुचि होती ठे ¡ उनम लेखन प्रतिमा
मिलती है।
द्वितीय चरणः जातकं वर्नो से संब॑धित व्यावसायिक मामर्लौ मँ दक्षहोता
है लेकिन तुनुकमिजाजी ओरं सभय देखकर बातत न करने की आदत उतसते
आर्थिक संकट मँ डाल सकती है ] जातक का वर्णं श्यामल, शरीर कृशकाय
हौतादहै)
तृतीय चरणः जातके यात्रा-ग्रिय होता है। व्यवसाय मँ वह चतुर ही
नहीं हता वस्न् अपने अधीनस्थ लोर्गौ की सुख-सुविधाओं ओर हितो का भी
परयप्ति ध्याने रखता है।
चतुर्थ चरणः जातक मेँ धार्मिकं वृत्ति होती है, पारिवारिक जीवन भी
प्रायः सुखी ही रहता है तथापि जुआरी वृत्ति के फलस्वरूप व्यवधान आ
सकते हैः
अश्विनी स्थित शनि पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि उसे पशु-पालन के व्यव्सायमेले जां सकती है।
जातक सद्कार्यो मेँ प्रवृत्ते रहता हे ।
यह कहा यया है कि यदि किसी जातिका की कुंडली मे अश्विनी के
चतुर्थ चरण स्थित शनि पर सूर्य की दृष्टि है तो वह पिकाह प्रतिबधक योग
बनाती है । यदि विवाह हौ भी गया तो दु्माग्यपूर्ण ही सिद्ध होता है।
लेकिन यह फल पढ़कर एकाएक किसी निर्णय पर पर्हुचना बुद्धिमानी
नहीं होगी ! यदि जातिकां की कुडली में अन्य ग्रहो के योग अच्छे हैँ तो यह
फल धूमिल भी सिद्ध हो सकता है।
ज्यीतिष-कोगरदी : (सञ-1/ नकक-विचार @ 51
चेद्रमाकी दृष्टि कं फल शुम नहीं कहे गये हँ ¡ जातक अभाव- ग्रस्त,
क्रूर-मना, कुसंगति मे रहने वाला कहा गया है ।
मंगल की दृष्टि जातक को घोर स्वार्थी बनाती है] साथी दूसरोसे
अपनी विरूदावलि स्वयं गाने की प्रवृत्ति भी हो सकती है]
बुध की दृष्टि पारिवारिक सुख में न्यूनता लाती है । जातक अवैध मार्गो
से संपत्ति अर्जित करने की ओर प्रवृत्त हौ सकता हे।
गुरुकीदृष्टिके फल शुम होते है। जातक शासन मेँ उच्च पद पाने
की योग्यता रखता है । उसे धन-संपत्ति, अच्छी पत्नी, अच्छे वच्चो कामी
सुख मिलता है;
शुक्र की वृष्टि जातक मे कामभावना तीव्र करती है । उसे यात्राएं करने
मेँ मी अतीव आनंद आता है।
अश्विनी स्थित राहु के फल
अश्विनी के तृतीय चरण अर्थात् 5.4 से 40.00 अंशो के मघ्य न होने
प॒र अन्य शेष चरणों मँ राहु प्रायः अच्छे फल ही प्रदान करता है!
प्रथम चरण में राहु स्थित हो तो जातक हष्ट-पुष्ट, बुद्धिमान तथा
पितृभक्त होता है ¦ अमरने वरिष्ठो से उसे समय--समय पर सहायता भी
मिलती रहती है ।
द्वितीय चरण मेँ राहु हौ तौ जातक विदेशों मेँ भ्रमण का इच्छुक होता
है। यों वह धार्मिक परंपराओं का पालन करने वाला भी होता है लेकिन
अपनी अस्थिर मनोवृत्ति के कारण भटकाव की स्थिति मेँ रहता हे]
तृतीय चरण म स्थित राहु घौर दरिद्रता का सूचक माना मया दै।
वैवाहिक जीवन भी कलहमय होता है । लेकिन अपनी दार्शनिक प्रवृत्ति के
कारण वह इन सबसे असंपृक्त रहता है ।
चतुर्थ चरण में रिथित राहु कं फलस्वरूप जातक दुबली-पतली काया
वाला होते हुए भी साहसी, निर्भीक होता हे। य्ह राहु हो तौ जातक को
अपच ओर वायु प्रकोप की शिकायत हो सकती है।
अश्विनी के पिभिन्न चरर्णो में केतु
अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु ही माना मया है । यँ स्वह्त्री होते हुए
भी केतु मिले-जुले फल देता है
प्रथम् चरणः; अन्य चरणों की अपेक्षा इस चरण मेँ कंतु से शुभ फल
मिलते है। जैसे जातक अच्छी शिक्षा पाता है। वह लोकप्रिय एवं समृद्ध भी
न्योतिक-कौमुदी : (खड-ए नक्षत्र-विचार छ 62
होता है। य्ह केतु हो तो जातक भैकेनिकल या इंजीनियरिंग के क्षत्र मे
सफल हो सकता है।
दितीय चरणः य्ह केतु हो तो जातक अनिक स्त्रियौ से संबधो की
चेष्टा करता है । वह जन संपर्क मै माहिर होता है)
तृतीय चरणः यर्हौ केतु हो तो जातक को अभावग्रस्त जीवन बिताना
पड सकता है. तथापि वह कृतघ्न नहीं होता † अपनी सहायता करने वालों
को सदैव याद रखता है तथा जरूरत षडने पर उनकी मदद कीभी
यथाशक्ति चेष्टा करता है ।
चतुर्थ चरणः य्ह भी केतु की स्थिति अशुम फल देने वाली मानी गयी
है । जातक का जीवन अभावमय ोता हे फलतः वह जन्मस्थल से करीं दूर
निकल जाने की फिराक मे रहता है] `
ज्योतिष-कोमुवीः : (खड-() रफत-विचार @ 68
भरणी
भरणी दितीय नक्षत्र हे ओर उसका अधिकारं क्षेत्र 13.30 अंश से 26.
40 अंश तक है । भरणी मै तीन तारे हैँ ओर वे एक त्रिकोण की रचना करते
है। भरणी का देव्ता यम को माना गया है। यम विवस्वत के पुत्र कं रूप
मे भी वर्णिति है ¡ भरणी का स्वामी शुक्र है । भरणी रजस वृत्ति का नक्षत्र है
ओर शरीर के भाग पर उसका अधिकार माना गया ै।
मणः रभ॑नुष्य, योनिः गज एवं नाडीः मध्य है ।
चरणक्षरर्हैःली,लू्. ले, लो।
भरणी नक्षत्र मेँ जन्मे जातक मध्यम कंद के होते है। उनकी अंखिं
चमकीली, दांत सुंदर ओर माथा चौडा होता ह स्व्माव से एसे व्यक्ति
उदार, शुद्ध हृदय, किसी का अग्रिय, अहित न् करने वाले होते है।
तिकड्मबाजी से दूर सदैव स्पष्ट तौर-तरीकों को अपनाने मे विश्वास रखते
हँ { वे अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध कोई कार्यं नहीं करते ओर फलतः उनकी
साफमोई कभी-कभी ओरों को बुरी भी लग जाती है । पर उन्हे इसकी चिता
नहीं होती । भले उनके संबध खरा हो जाएं ओर एसी स्थिति मे वे संबंधो
की चिंता नहीं करते! एेसे जातक किसी के सामने ुकना पसंद नहीं
करते! अपने रभाव कं कारण् ओर से उनके स्थायी संबंध बहुत कम बन
पातै है। अयर एेसे जातक व्यर्थं के वाद-विवाद, तर्कं से बये तो अच्छादै
क्योकि उनकी मूल प्रवृत्ति येन-केन अपना वर्चस्व बनाये रखने की होती हे ।
कभी-कमी वे अपनी कार्य सिद्धि के लिए अफवाहं भौ फलाने से बाज नहीं
आते ¦ विक्षेषकर यदि जन्म के समय भरणी की स्थिति अशुभ है तो व्यक्ति
दूस को धोखा देने से भी परहेज नहीं करता । भरणी की एसी स्थिति उसे
निम्न कार्य करने वाला बना देती है! भरणी का स्वामी शुक्र है। शुक्र एकं
ज्योिय-कोटृदी ˆ (ववड-1) नधत्र-विचार छ 64
शुम ग्रह है। अतः इस नक्षत्र मे जन्मा व्यक्ति सौदर्य-प्रिय, भौतिकवादी
होता है\ कला, मायन्. खेल कूद भै उसकी रुचि होती है । वह चतुर, शत्रु
पर अग्रत्याशित आक्रमण करने मे कलल तथा महत्त्वाकाक्षी होता है ¦ इन
नक्षत्र म जन्मे व्यविति चित्रकार बन सकते है ।
स्त्रियो के लिए भरणी नक्षत्र शुभ माना गया हे। वह उनमे (शुक्र के
प्रभाव के कारण) स्त्रियोचित गुण बढाता है । भरणी नक्षत्र मँ जन्मी लडकियों
का व्यक्तित्व आकर्षक होता है! वे निर्भीक, आशावादी, अपनी इच्छानुसार
कार्य करने कली होती हैँ तथापि वे माता-पिता ओर बड़ों का आदर करने
वाली भी होती है] वै अपनी आजीविका स्वयं कमाने मे भी समर्थ होती हे।
वे अवसरों की प्रतीक्षा नहीं करतीं. वरन् स्वयं अवसरों की तलाश मे निकल
पडती है । उनका पारिवारिक जीवन सुखी होता है] वे पति की ने केवलं
प्रिय होती है, वरन् अपने गुणौ के कारण उस पर शासन भी करती हे ।
फलत्तः परिवार के अन्य व्यक्तियों से उनकी अनद्न हो ही जाती है ।
भरणी के चरणों के स्वामी हैँ-ग्रथम चरणः सूरय, दितीय चरणः बुध,
तृत्तीय चरणः शुक्र, चतुर्थं चरणः मंगल
भरणी के विभिन्न चरणो मे सूर्य
भरणी के प्रथम दौ चरणों मे सूर्य की स्थिति शुम मानी गयी है, जबकि
शेष अंतिम दौ मेँ मिन्नित फल प्रप्त होते है।
प्रथम् चरणः इस चरण ने सूर्य जातक को विद्वान, उदार, व्यवहार कुशल
ओर भाग्यशाली बनात्ता है। ज्योतिष मे उसकी रुचि होती है ¦ वह चिकित्सा,
पशु चिकित्सा अथवा विधि (कानून) के क्षेत्र मेँ यशस्वी होता है}
द्वितीय चरणः इसं चरण मेँ स्थित सूर्य जातक को सुख-सम्पन्ने बनाता
है} उसे लाटरी, विरासत या अन्य किसी कारण से अनायास ही धन प्राप्त
हयो सकता है। एेसे जातक का पारिवारिक जीवन बहुत सफल, समृद्ध ओर
सुखी होत्ता है। उसे संतान से भी संतुष्टि मिलती है।
तृतीय चरणः यौ सूर्य की स्थिति अच्छी नहीं मानी गयी है । यद्यपि
जातकं पर्याप्त संपत्ति अर्जित करता है तथापि उसे गवां भी देता है।
चतुर्थं चरणः इस चरण मे स्थित सूर्यं जातक का बाल्यकाल दुखी ॐर्
अभावग्रस्त बना देता है। यदि ेसे सूर्य पर शुम ग्रहौ की दृष्टि हुई तो
जातकं दरिद्र नहीं होता अन्यथा एेसा सूर्यं भीख तक भगवा सकता है।
* भरणी स्थित सूर्य पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
चंद्र की दृष्टि जातक को उदार-परोपकारी बनती है।
ज्योतिक-कीमदी : (वड-। नफतर-विकारं च ए,
मंगल की दृष्टि निर्दयी ओर ऋूर साथ ही परोपकारी भी बनाती है।
शासन अथवा राजनीति मेँ उसे प्रभावपूर्णं पद भी प्राप्त होता है।
गुरु की दृष्टि जातक को संपन, राजनीति मे प्रसिद्ध ओर दानी प्रवृत्ति
का बनातीदहै।
शुक्र की स्थिति उसे धनहीन ओर अच्छे मित्रो से हीन बनाती है,
शनिं की दृष्टि जातक को आलसी बना देती है।
भरणी के विभिन्न चरर्णो में चंद्र
भरणी के प्रथम् तीन चरर्णो- प्रथम्, दवितीय एवं तृतीय चरण मे चंद्र की
स्थिति शुम फल देती है { चतुर्थं चरण रिथत चंद्रमा अशुभ माना गया दहै {
प्रथम चरणः इस चरण मे चंद्रमा जातक को बहुत धनी तो बनाता है,
पर एेसा व्यक्ति केवल वर्तमान पर ध्यान देता है, मविष्य पर नही, फलतः
शीघ्रता से किये गये नियमों से उसे हानि भी होती है;
द्वितीय चरणः इस चरण मेँ स्थित चंदर व्यक्ति को आजीवन सुखी
बनाता हे ¡ उसे विरासत मेँ धन भी मिल सकता है । वह सुशिक्षित होता है
ओर विद्वानों का सामीप्य भी पाता हे]
तृत्तीय चरणः इस चरण भे चंद्रमा की स्थिति अशम मानी गयी है। एसे
व्यक्ति को लोग भूर्त' कह कर पुकारते है--यह स्थिति उसंका अपना चरित्र
ही. उत्पन्न करता है।
चतुर्थं चरणः इस चरण भँ चंद्र हो तो जातक मे कुटिल बुद्धि का
प्राबल्य हो सकता है । उसके जल से संबंधित कार्यो मे संलग्न होने का फल
भी मिलता है।
भरणी स्थित चंद्र पर विभिन्न म्र्ो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि उसे ओय का सहायक तो बनाती है पर वह क्रूर भी बन
जाता है। स्जाभी दे सकता है;
मंगल की दृष्टि से उसे विष भय, अग्नि भय ओौर पक्षाघात का भय
होता है । वह परावलंबी भी होता है।
बुघ की दृष्टि शुभ हौती है । जातक विद्वान, प्रसिद्ध ओर धनी होता है।
गुरु की दृष्टि भी उसे धनी ओर तंदुरूस्त बनाती है ] उस पर अपने
वरिष्ठ अधिकारियों की कृपा भी बनी रहती है |
शुक्र की दृष्टि के कारण उसे अच्छी पत्नी, अच्छी संतान मिलती है ।
उसका जीवन सुखी रहता है ।
शनि की दृष्टि मिथ्याम़षी, आलसी, अभावग्रस्त ओर कूर बनाती है।
ज्योतिष-कौगुदी : (ध्व) नप्रत-विचयर ७ 66
क्ररणी के विभिन्न चरणो मेँ मंगल
भरणी के प्रथम तीन चरणों मे स्थित मंगल शुम फल नहीं देता।
दुर्घटना भय ओर येग उसे बना ही रहता हे ।
प्रथम चरणः रसे व्यक्ति की मध्य आयु बतायी गयी है । बह परदेश मेँ
अल्प बीमारी के कारण नश्वर शरीरं त्थाग सकता है। एेसे व्यविति को स्वयं
कोई वाहन न चलाने का परामर्श भी दिया गया हे!
द्वितीय चरणः यौ मंगलं की स्थिति जात्तक को बुद्धिमान, परिश्रमी
लेकिन साथ ही क्षीणकाव, दुर्बल ओर चर्म रोगों का शिकार बनाती है।
कामासविति के कारण उसे गंभीर रोग हो सकते हैं|
तृतीय चरणः य्ह मंगल की स्थिति बेहद अशुभ मानी गयी है।
बाल्यकाल से फचास वर्ष तक उसका जीवन अभाव ग्रस्त तथा घोर
विपन्नता से बीतता है लेकिन उत्तरार्य मेँ कह सुखी-समृद्ध होता हे]
चतुर्थं चरणः यहो मंगल जातक को यौन रोगों का सफल चिकित्सक
बना सकता हे{ कहा गया है कि भरणी के चतुर्थ चरण मे स्थित मंगल
जातक को देश के उच्चतम पद पर आसीन भी करवा सकत है|
भरणी स्थित मंगल पर विभिन्न गरहौ की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि जातक को धनी-मानी, विनम्र ओर बुद्धिमान बनाती हे।
चंद्रमा की दृष्टि स्त्रियौ का शौकीन ओर क्रूर, हृदय हीन कर देती है।
बुघ की दृष्टि के कारण वह प्रदर्शन- प्रिय ओर परस्त्रीगामी बनता है।
बुध की दृष्टि जातक को प्रदर्शन-गप्रिय, परस्त्रियो मे आसक्त ओर चर्य
वृत्ति काभी बना सकती हे।
गुरु की दृष्टि उसे गुस्सैल पर संपिवान बनाती है! परिवार मेँ सन
उसकी बात मानते हे!
शुक्र की दृष्टि के कारण भी वह परस्त्रीगामी बनता है ¡ तथापि वह अपने
परिवार टी नही, समाज क प्रति अपने दायित्वों का भी निर्वाह कर्ता हे ।
शनि की दृष्टि उसे दुर्बल बनाती है ओर परिवार से विषछठोह का भी
कारण बनता है।
भरणी के विभिन्न चर्य्णो मे बुध
भरणी मेँ बुघ की स्थिति अयु की दृष्टि से शुभ नहीं मानी मयी है।
तीररे चरण में दीर्घायु का फल मिलता है।
प्रथम चरणः बुध की स्थिति बालारिष्ट योग बनाती है । अर्थात् जातक
के बचपन में ही काल कवलित होने का भय बना रहता है तथापि यदि यह
ज्वोतिष-कौगुदी ` (खड कफत्र-कियार # 67
योग निष्रभावी हो जाए तौ व्यक्ति दीर्घायु होता है। बुध की यह र्थिति
जातक को सफल लेखक बनाती है ।
द्वितीय चरणः बुध जातक को मध्य आयु प्रदान करता है । वह ओरो के
प्रति उदार होता है, लेकिन उसकी पिता से नहीं बनती । एसा व्यक्ति एक
साथ कई कार्यं हाध मँ लेता है, पर उसे उनका लाम कम ही मिलता हे।
तृत्तीय चरणः बुध शुभ फल प्रदए्न करता है । एसा व्यक्ति विद्वान, उदार
पत्नी के मामले में बेहद सौमाग्यशाली होता है । ठेकेदार ओर मैकेनिकल
इंजीनियरिंग के क्षेत्र मँ सफलता प्राप्त करता है।
चतुर्थं चरणः यहो दुध जातक को सरकारी नौकर ही बनाता है । एेसा
व्यक्ति इंजीनियर भी वन सकता है । 45-50 वर्षु तक उसे जीवन का सुख
मिलता है! उसे मिरगी अथवा पक्षघात होने की आशंका बनी रहती है {
भरणी स्थित बुध पर विभिन्न रहो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि नहीं पड़ती!
चंद्र की दृष्टि उसे ललित कला निपुण स्त्री-सुख से लाभान्वित तथा
धनधान्य. वाहन भवनादि से. युक्त बनाती है!
मंगल की दृष्टि से वरिष्ठ अधिकारियों का कूपा पात्र बनाती है । उनकं
कारण उसे आर्थिक लाम भी मिलता हे।
मंगल की वृष्टि स्वमाव से उसे मगडालू बना देती है।
गुरु की दृष्टि उसके जीवन कौ सुखी बनाती हे । पत्नी अच्छी मिलती
है ओर इसी तरह संतान भी उसे सुख-संतोष प्रदान करती है]
शनि की दृष्टि कं कारण वह इगड़ालू्. आलसी, अनैतिक ओर क्रूर
स्वभाव कला बन जाता है।
भरणी के विभिन्न चरर्णो मेँ गुरु
भरणी स्थित गुरु प्रायः शुभ फल देता है । वह जातक को सुखी- संपन्न
ओर सफल बनाता है}
प्रथम चरणः यर्हौ गुरु जातक को सत्य-ग्रिय, ओजस्वी वक्ता, लोकप्रिय
व पितृभक्त बनाता है ] वह किसी कारखाने या वित्तीय संस्था-विभाग प्रमुख
हो सकता है । एक से अधिक पत्नी होने का योग भी बताया गयाहे।
द्वितीय चरणः यहौँ गुरु जातक को धार्मिक विचारों का बनाता हे।
उसे पुत्रपौत्रादि का सुख भी मिलता है। वह अपराध- विशेषज्ञ भी बन
सकता है।
तृतीय चरणः यहो गुर व्यक्ति को गात्र-्रिय, विलासी बनाता हे । वह
ज्योतिक-कौमुदी ; (वड) नकत्र-विचार = 6४
दुर्घटनाओं का शिकार भी होता है, पर उसकी प्राण-हानि नहीं होती । वह
किसी भी प्रतिस्पर्धा से सफल हो सकता है।
चतुर्थं चरणः य्ह गुरु जातक को कृषि कार्यो मे निपुण होने के
अतिरिक्त तात्रिक-मांत्रिक मी बनाता है। एसा व्यक्ति चतुर ओर अपना
काम निकालने मँ चतुर होता है।
भरणी स्थित गुरु पर अन्य ग्रहों की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि व्यक्ति को सत्य वक्ता समाजसेवी, भाग्यशाली ओर
प्रसिद्ध बनाती है।
चंद्र की दृष्टि प्रसिद्ध, शति-गप्रिय ओर परोपकारी स्वभाव देती है।
मंगल की दृष्टि उसे निर्मम, अपकारी बनाती है किंतु उसके अधीन
व्यक्ति कार्य करते है।
बुध की दृष्टि का फल अशुम है ¡ एता व्यक्ति गड़ालू, मिथ्याभाषी
ओर प्रदर्शन प्रिय होने कें साथ-साथ स्त्रियँ का विलासी होता है।
शुक्र की दृष्टि उसे जीवन में हर सुख प्रदान करती है । उसे स्त्री-सुख,
शैय्या सुख, वाहन, निजी मकान का सुख मिलता है।
शनि की दृष्टि दुर्मग्य सूचक मानी गयी है । वह जातक को पत्नी ओर
संतति सुख से वंचित रखती है! एसा व्यक्ति क्रूर हृदय ओर सदैव सलाह
देने वाला होता है।
भरणी के विभिन्न चरर्णो मेँ शुक्र
भरणी मँ शुक्र की स्थिति के प्रायः शुभ फल मिलते है पर एसे
व्यक्तियों को नेत्र रोग की अथवा नेत्रो के ऊपर चोट लगने की आशंका
बलवती होती हे
प्रथम चरणः यर्हौ शुक्र व्यक्ति को संगीतज्ञ, ओजस्वी वक्ता ओर सबका
प्रिय बनाता है। एसा व्यक्ति भोग-विलास का भी शौकीन होता है} उसे
ओख ठे ऊपर चोट लगने का भय हौता है।
दवितीय चरणः यर्हो शुक्र व्यक्ति को विलासी ओर परस्त्रीगामी बनाता
है। उसे गुप्त रोग भी हौ सकते है । यहो ओंखँ के ऊपर चोट लगने का
भ॑य होता है।
तृतीय चरणः यँ शुक्र कं कारण बेहद रुदर पत्नी मिलती है! एसा
व्यक्ति कर्तव्यनिष्ठ भी होता है! यहं भी ओँखौ के ऊपर चोटं लगने के
संकेत बतलाये गये हे।
ज्योतिष-कौमृरी ` (खड-2/ नक्षन-विवार अ 69
चतुर्थं चरणः य्ह शुक्र जातक को प्रवासी ओर घार्भिक क्नात्त है।
अक्सर कह मठ-मंदिर या गिरजाघर अथवा मस्जिद मे धार्मिक प्रथो का
पाठ करने मे निष्णात होत्ता है।
भरणी स्थित शुक्र पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्यकी दृष्टि से शासन से लाभ मिलता है! उसे अपनी कर्तव्यनिष्ठा
का भी पुरस्कार भिलेत है लेकिन एसे व्यक्ति को पत्नी के विश्वासघाते का
दुःख भी उठाना पड़ सकता है!
चंद्रमा की दृष्टि उसे एक ओर समाज मेँ उच्च पद दिलाती है, लेकिन
परनारियों के प्रति अपनी कामासक्त के कारण वह आलोचना का पात्रमी
बनता हे।
मंगल की दृष्टि उसे हर सुख से वंचित एवं अवसादग्रस्त बनाती है}
बुध की दृष्टि जीवन मेँ तरह-तरह की बाधाएं उत्पन्न करती है}
गुरु की दृष्टि का फल शुम मिलता है। उसे जीवन प्रत्येक सुखं
मिलत्ता है| मत्नी एवं संतान के मामले में ठेसा व्यक्ति भाग्यशाली होता हे ।
शनि की दृष्टि प्रायः अशुभ फल देती है लेकिन भरणी स्थित शुक्र पर
शनि की दृष्टि जात्तकं को शातिप्रिय ओर उदार तथा ओरौ को सहायक
बनाती है। पर एेसः व्यक्ति गलत तरीकं से धनार्जन करता है।
भरणी के विभिन्न चरर्णो मेँ शनि
भरणी के विभिन्न चरणों में स्थित शनि कं लगभग शुभ फल मिलते है |
प्रथम चरणः य्ह शनि जातक को धार्मिक ग्रंथो का अध्येता वनाता दै)
वह बुद्धिमान, मृदुभाषी ओर सवकं आदर का पात्र होता है।
द्वितीय चरणः यर्हौँ शनि व्यक्ति को वेहदं बुद्धिमान बनाती है । उसका
जीवन सुखी रहता हे ।
तृतीय चरणः यहो शनि सामान्यतः परावलंबी बनाता है ओर उसे
दो-दो पृथक अभिभावकों का संरक्षण मिलता है!
चतुर्थ चरणः यर्हो शनि के फलस्वरूप व्यविति का ॐ5 वर्षं की आयु तक
का जीवन संघर्षूर्ण होता है। रसा व्यक्ति पुलिस अधवा सेना मेँ सफल
येता है।
भरणी स्थित शुक्र पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि के फलस्वरूप व्यक्ति पशुपालन अथवा कृषि कार्य से
अर्थं लाभ करता है। वह उदार भी होता है।
ज्योतिष-करेमुदी : (वड) नकत -दिवार 9 79
चंद्रमा की दृष्टि काफल अशुभ हे। वह उसे क्रूर ओर कुसंयति करने
काला बनाती हे।
मंगल की दृष्टि उरो कृतघ्न, अनैतिक ओर पग-पग पर बाधाओ का
शिकार बनाती है।
बुघ की दृष्टि तो ओर भी अशुम प्रमाव डालती हे । उसके कारण व्यक्ति
मिथ्यामाषी ओर चोर भी बन जाता है]
मुरु कीदृष्टिकाफल शुम है। एक ओर वह समृद्धिपूर्ण जीवन बिताता
है तो दूसरी ओर राजनीति केक्षत्र म भौ सफलता पाता है]
शुक्र की दृष्टि उसे यायावर बनाती हे! वह कामतृप्ति के लिए बांञ्ज
स्त्रियो के पीछे भागने से भी बाज नहीं आत्ता!
भरणी के विभिन्न चरणों राहु
भरणी के विभिन्न चरणौ मे रिथित राहु के प्रायः शुम फल मिलते है!
प्रधम चरणः य्ह राहु की स्थिति जातेक कौ शक्तिशाली, प्रसिद्ध ओर
धनी बनाती है परंतु उसकी मृत्यु विपन्न अवस्था मे होती है]
द्वित्रीय चरणः यहो राहु व्यक्ति को बेहद मान-सम्मान ओर यश देता
है। उसे चर्मरोग का भय होता है!
तृतीय चरणः यर्हौँ राहु काव्य रचयिता बनाता है । इसमे जातक को
यश भी मिलता है। पुलिस ओर सेना म भी उसे सफलता मिलती है।
चतुर्थं चरणः यहौँ राहु की स्थिति व्यक्ति को उदार बनाती हे। दुग्ध
व्यवसाय से उसे लाभ मिलता है।
भरणी के विभिन्न चरणों मे केतु
भरणी के प्रथम दौ चरणौ मे केतु की स्थिति के अच्छे फल नहीं मिलते
शेष दो मे केतु की स्थिति शुभ मानी गयी है,
प्रथम चरणः यहौँ केतु आयु के लिए अशुभ माना गया है]
द्वितीय चरणः यहो केतु अच्छी आयु प्रदान करता है ¡ पर जातक को
मिर्गी अथवा मस्तिष्क के किसी रोग की आशंका बनी रहती है|
तृतीय चरणः इस चरण में स्थित केतु व्यक्ति को योग विद्या मै पारंगत
बनाता है! वह स्पर्श चिकित्सक मी होता है;
चतुर्थं चरणः इस चरण में स्थित केतु दीर्घायु कारक माना गया है।
ठेसा जातक आकिंटेक्ट हो सकता है ¡ उसे चर्मरोग या सुष्त रोग का भी
भय बना रहता है।
ज्योतिष-कौमुदी : (लड) नकषक-व्वार ह 71
कृत्तिका
कृत्तिका नक्षत्र राशि फल मेँ 26.40 से 40.00 अंशो के मध्य स्थित हे।
कृत्तिका कं पर्ययवायची नाम है-हुताशन, अग्नि. बहुला ! अरबी में इसे अथ
थुरेया' कहते है । इस नक्षत्र मे छह तार की स्थिति मानी मयी है ! देवता
अग्नि एवं स्वामी गुरु सूर्यं है! कृत्तिका प्रथम् चरण मेष राशि {स्वामी :
मंगल) एवं शेष तीन चरण वृष राशि (स्वामी : शुक्र) मे अते है]
गणः राक्षस. योनिः मेष एवं नाडीः अंत है]
चरणाक्षर हैः अ, इ, उ, ए।
कृत्तिका नक्षत्र मँ जन्मे जातक मध्यम कद, चौड़ कंधे तथा सगित
मांसपेशिर्यो वाले होते हैँ । एसे जातके अत्यंत बुद्धिमान. अच्छे सलाहकार,
आशावादी, कठिन परिश्रमी तथा एक तरह हठी भी होते हैँ । वे वचन के
पक्के तथा समाज की सेवा भी करना ब्याहते हैँ । वे येन-केन- प्रकारेण अर्थ,
यश नहीं प्राप्त करना चाहते. न तो अवैघ मागो का अवलंदन करते, न्
किसी की "दया पर आश्रित रहना चाहते ह! उनमें अहं कुछ अधिक होता
है, फलतः वे अपने किसी भी कार्य मे कोर त्रुटि नहीं देख पराते। वे
परिस्थितियों के अनुसार ढलना नहीं जानते! तथापि एसे जात्तक का
सार्वजनिक जीवन यशस्वी होता है। लेकिन अत्यधिक ईमानदार भरा
व्यवहार उनके "पतन का कारण बन जाता है।
एसे जातकौ को सत्तापक्ष से लाम् मिलता है ! वे चिकित्सा या इंजीनियरिंग
के अलावा द्रैजरी विभाग मे भी सफल हो सकते है, विशेषकर सूत निर्यत,
ओषध या अलंकरण वस्तुओं के व्यापार मँ । सामान्यतः जन्मभूमि से दूरही
उनका उत्कर्ष होता है| ।
ज्योतिष-कौगुदी : (वड-1) नकत्र-ङिवार अ 72
एसे जातको का वैवाहिक जीवेन सुखी बीतता है। पत्नी
गुष्यक्ती, गृह कार्य मे दक्ष तथा सुशील होती है! प्रायः उनकी पत्नी
उनकं परिवार की पूर्वं परिचित हौ होती है; प्रेम-विवाह के भी संकेत
मिलते है।
एसे जातकों का स्वास्थ्य भी सामान्यतः ठीक ही रहता हे तथापि
उन्हें द॑त-पीडा, नेत्र-विकार, क्षय. बवासीर आदि सेग जल्दी ही पकड
सकते है।
कृत्तिका नक्षत्र मेँ जन्मी जातिकारएं मध्यम कद की बहुत रूपवती तथा
साफ-सफाई पसंद होती हैँ ¡ वे अनावश्यक रूप से किखी से 'दढना' पसंद
नहीं करती, फलतः जाने-अनजाने उनका स्वमाव कलह पैदा करने वाला
बन जाता है। उनमें संगीत, कला के प्रति रुचि होती है तथा चै शिक्षिका का
कार्य क्खूबी कर सकती है ¡ कृत्तिका के प्रथम चरण मे जन्मी जािकाएं
उच्च अध्ययन में सफल होती हैँ तेथा प्रशासक, चिकित्सक, इंजीनियर
आदि भी बन सकती है
कृत्तिका नक्षत्र मे जन्मी जातिकाओं का वैवाहिक जीवन पूर्णतः सुखी
नहीं रह पाता! पति से विलगाय या कभी-कभी प्रजनन क्षमता की हीनता
मी इसका एक कारण हो सकती है!
कृत्तिका कं विभिन चरणों के स्वामी इस प्रकार हैः प्रथम एवं चतुर्थं
चरण-गुरु, द्वितीय एवं व्ृतीय चरण-शनि।
कृत्तिका नक्षत्र मे सूर्य के फल
कृत्तिका के द्वितीय चरणः मेँ ही सूर्यं क स्थित्ति कं शुम फल
मिलते है।
प्रथम चरणः अन्य शुम ग्रहो की युति हो तो अधिक संतानं तथापि
दरिद्र जीवन। सेना या पुलिस विभाग मेँ सेवा कं अवसर। जातक की
ज्योतिष शास्त्र मे भी रुचि होती है।
दितीय चरणः सुखी ` जीवन के संकेत । जातक दीर्घायुष्य एवं संतति
सुख से पूर्णं होता है] जातक की संगीत मेँ भी रुचि होती है। प्रौढावस्था
के काद संपन्नता के अवसर।
तृतीय चरणः सूर्य की स्थिति यँ शुम नहीं होती! जात्तके को
दरिद्रतापूर्णं जीवन बिताना पडता है! कीरड रोम भी घेर सकता है।
चतुर्थं चरणः य्ह भी सूर्य की स्थिति अच्छे फल नहीं देती { जातक
क्ूर-मना, नैर-जिम्भेदार तथा दुर्बल स्वास्थ्य वाला होता दै!
ज्योतिक-कौगुदी ˆ {शर-) नतन-विकार अ 73
कृत्तिका स्थिति सूर्य पर विभिन्न रहो की दृष्टि
मंगल की दृष्टि हो तो जात्तक साहसी, रणनीति--निपरण एवं धनी तथा
यशस्वी होता है।
बुध की दृष्टि उसे संगीत में निपुण बनाती है ! जातकं का व्यकितित्व
आकर्षक एवं जीवन सुखी होता है।
गुरु की दृष्टिहौ तो जातक परिवार मेश्रेष्ठ तथा राजनीति मेहो तो
बेहद सफ़ल हो मंन्रीपद तक पर्हैच सकता है ।
शुक्र की दृष्टि हो तौ जातक सुंदर व्यक्तित्व व्राला तथा यशस्वी
होता है।
शनि की दृष्टि शुम फल नहीं देती ! जालक का जीवन कलह से भरा
होता है। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता {
कृत्तिका नक्षत्रम चंद्र
प्रथम चरणः यर्हौ चंद्र हो तो जातकं को स्त्रियो से कष्ट मिलता है;
उसकी मंत्र शास्त्र एवं टोने-टोटकँ मेँ भी रुचि होती है।
दितीय चरणः यर्हो चंद्रे की स्थिति के शुम फल मिलते है! जातक
सुंदर, आकर्षकं व्यक्तित्व वाला, विद्वानों की संगति करने वाला तथा शक्ति
संमन्न होता है
तृतीय चरणः यर्हो चंद्र हो तो जातक लंबा, चुर तथापि अभावो से
धिस रहता है।
चतुर्थ चरणः यर्हौँ चंद्रे की स्थिति के शुभ फल. मिलते हे! जातक
अत्यंत विदधान तथा विभिन्न विषदां का ज्ञाता होता है।
कृत्तिका स्थिति चंद्र पर विभिन्न गरो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि के शुम फल मिलते हे ! जातक भूस्वा्फी तथा धनी होता
है। उसने कृषि कार्य से लाम मिलता है।
मंगल की दृष्टि कामाधिक्य की सूचना देती है । फलस्वरूप उसे कर
समस्याओं का सामना करना पड़ता है]
बुध की दृष्टि से जातक बुद्धिमान, उदार एवं परोपकार मे रत होता है।
गुरुकीदृष्टिकंमीरेसेही शुभ फल मिलते है)
शुक्र की दृष्टिहो तो जातक का जीवन सुखी बीतता हे।
शनि की दृष्टि अशुम सिद्ध होती हे । यदि दितीय चरण रिथत् चंद्र पर
शनि कीदृष्टिहोतो उसे माता के लिए घोर अशुमं कहा गया है।
ज्योतिष-कौमुठी ‡ (छ-१) नत्-विकार ® 74
कृत्तिका नक्षत्र स्थित मंगल
प्रथम चरणः यह मंगल जातक कों तार्किक एवं प्रशासनिक क्षमता से
युक्त करता है फलतः वकालत, सेना या पुलिस सेवा मे उसे विशेष
सफलता प्राप्त हो सकती है । मंगल एवं सूर्यं की महादशाओ, अंतर्दशाओं भे
जातक शीर्षस्थ पद पर पर्हुचने के लिए संघर्ष तेज करता हे ! जातक में
परस्त्रियो के प्रति आसक्ति पायी जाती है।
द्वितीय चरणः य्ह मंगल हो तो जातक उदर, बेहतर मेहमान-नवाज
तथापि प्रतिहिंसा की भावना से भी युक्त होता है।
तृतीय चरणः य्ह मंसल जातक को सक्तापक्षं से अधिकाधिक लाभान्वित
कस्वाता है! वह इंजीनियरिंग के त्रम मी जा सकताहे।
चतुर्थं चरणः यर्हो मंगल स्थित्त हो तो जातक जीवन मे संपूर्ण सुखो का
भोग करता हे । विवाह के वादे जीवेन तपस्वी होत हे । बच्चे मी आज्ञाकारी
ओर कर्तव्यनिष्ठ होते है । जातक ओषध या विस्फोटक सामग्री के विक्रयसे
विशेष लाभान्वित होता है]
कृत्तिका स्थित मंगल पर विभिन्न यर्हो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि हो तो पत्नी लोभी मिलती है} जातके की वन प्रतर मेँ
रहने की प्रवृत्ति होती है।
चंद्र की दृष्टि जत्तक को मातृ विरोधी बना देती है! बहुपत्नीत्व के भी
संकेत कहे गये हैँ ।
बुघ की दृष्टि जातक की धार्मिक, मितभाषी, धनी एवं ललितकला प्रिय
बनाती है;
गुरु की दृष्टि भी जातक कौ संगीत एवं ललित्त कलाओं मे निपुण
बनाती है। जातक की परिवार मे घोर आसक्ति होती हे।
शक्र की दृष्टि से जातक सैन्य सेवा में उच्य पद पर कार्यं करता हे।
शनि की दृष्टि भी शुभ फल देती है । जातक धनी, स्वस्थ एवं सबके
आदर का पात्र बनता है)
कृत्तिका नक्षत्र स्थित बुघ के फल
प्रथम चरणः इस चरण मेँ बुघ हौ तौ जात्तक शासकीय सेवा मे रते
रहता है । व्यवसाय मै हौ तो उसे सत्तापक्ष से लाभ मिलता है ¡ जाक्तक
समाज मै भी आदर पाता है । उसमे ललित कलाओं एवं अभिनय के प्रति भी
रुचि होती है! व्ह सुरा-सुंदरी का भी शौकीन होता है ।
ज्योतिष-कौःुदी ˆ (वड) नसत्र-किचार न 75
द्वितीय चरणः इस चरण मेँ बुध हो तो जातक हष्ट-पुष्ट, धनी तथा
प्रसन्नचित्त होता है ¦ एकाधिकं विवाह के योग भी मिलते है । चालीस वर्षं
की अवस्था के वाद जातक मे संन्यास के प्रति रुञ्जान बढ सकता है।
तृतीय चरणः यह स्थित बुघ शुभ फल देता है । जात्तक दृढ निश्चयी
ओर जीवन मे व्यावहारिक बुद्धि से काम लेता है! शनि के साथ बुघकी
युति जातक को वैज्ञानिक एवं बौद्धिक ज्ञान अर्जन के लि प्रवृत्त करती है ।
चतुर्थं चरणः इस् चरण मँ बुध जातक को व्यावहारिक, कर्तव्यनिष्ठ एवं
सौपी गयी जिम्मेदारियों को बखूबी निमाने वाला बनाता है! जातक में
नेतृत्व के भी गुण होते ह । पुत्रों की संख्या ज्यादा होती है
कृत्तिका नक्षत्र स्थित बुध पर अन्य रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि का फल शुभ नहीं होता। जातक के दरिद्र एवं रोगमुक्त
होने के फल कहे गये हे।
चेंद्र की दृष्टि जातक को कठोर परिश्रमी, धनी एवं प्रसिद्ध बना
देतीहै।
मंगल की दृष्टि अशुभ फल देती है! जातक के सक्ता पक्ष से दंडित
होने की आशंका रहती है।
गुरु की दृष्टि शुभ फल देती है! जातक बुद्धिमान एवं नेतृत्व कं गुणो
से युक्त होता हे।
शुक्र की दृष्टि जातक मेँ स्त्रियों के प्रति विशेष आकर्षण पैदा
करती हे।
शनि की दृष्टि पारिवारिक जीवन को दुःखमय घनाती है । पत्नी एवं
संतानो से कलह होती रहती हे।
कृत्तिका स्थित गुरु के फल
प्रथम चरणः यहौँ गुरु जातकं को ज्ञान-पिपासु बनाता है । जातक शुद्ध
हृदय एवं यात्रा-ग्रिय भी होत्रा हे। वह जीदने जीना जानता है । एक ओर
उसकी इतिहास एवं साहित्य के अध्ययन में रुचि होती है तो दूसरी ओर
सुरा- सुंदरी का सेवन भी उसे भाने लगता हे।
द्वितीय चरण. यर्हो गुरू जातक को लंबे कद का, मातृभक्ते त्तथा
धार्मिक कार्यो के कारण प्रसिद्धि दिलाता है। युवतियों के प्रति वह एक
विशेष कमजोरी लिए होता है।
तृतीय चरणः यहं गुरु हो तौ जातक का व्यक्तित्व भव्य होता है । वह
ज्योतिष-कौयुदी - (ख~) नस्षत्र-विचार अ 76
अनुशासन-ग्रिय, परामर्श देने मँ कूशल तथा लोगो का स्नेह एवं आदर
अर्जित करता है|
चतुर्थं चरणः यँ गुरु हो तो जातक न्यायप्रिय होता है। पत्नी भी
कामकाजी मिलती हे।
कृत्तिका स्थित गुरु पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि जातक को रणकौशल प्रदान करती है।
चंद्रकी दृष्टि हो तो जातक सत्यनिष्ठ एवं सौमाग्यशाली होता है!
मंगल की दृष्टि हो तो जातक ललित कलाओं के क्षेत्र मँ सम्मान पाता
है। नौकरी से लाम होता है। दच्ये भी अच्छे होते हे।
बुघ की दृष्टि के फलस्वरूप जातक मंत्र सिद्धि कर सकता हे!
शुक्र की वृष्टि हो तो जातक जीवन मे तमाम सुखों का उपभोग
कर्ता है।
शनि की दृष्टि भी शुम फल देती है] पत्नी एवं बच्चो से उसे पूर्णं सुख
मिलता है। जातक समाज में भी आदर पाता है।
कृत्तिका नक्षत्र स्थित शुक्र के फल
प्रथम चरणः यहो शुक्र जातक मेँ नारी सुलम एवं जातिका में पुरुषोचित्त
शरीर का भास करता है। एसे लोगों का वैवाहिक जीवन सुखी नह्य होता!
प्रथमं चरण स्थित शुक्र पर सूर्य की दृष्टि शीघ् विवाह एवं विरासत में
लाभ मिलने का संकेत करती हे । किसी जात्तिका की कुंडली में प्रथम चरण
मँ स्थित शुक्र पर चंद्र की दृष्टि अधिक संततियोँ का योग दशशती है।
द्वितीय चरणः यह शुक्र हो तो जातक नौसेना या समुद्र से संबद्ध
किसी कार्यं मेँ संलग्न होता हे।
तृतीय चरणः यर्हौ शुक्र जातक को उदार एवं कला तथा अभिनय प्रेमी
बनाता है। एकाधिक पलयो कं भी योग कहे गये हैँ।
चतुर्थं चरणः यर्हौँ शुक्र जातक को संमीत या कलाओं के माध्यम से
धन उपलब्ध कराता है। उसकी अभिनय मँ भी रुचि होती है ] अनायास
विरासत से लाम के भौ संकेत मिलते हैँ
कृत्तिका स्थित शुक्र पर विभिन्न हों की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि का शुभ फल हतां है। जातक सौभाग्यशाली तथा
स्त्रियों से सुख पाता है।
ज्योतिक-कौमृदी = (वड) नसज-विवार ब 77
चंद्र की दृष्टि जातक में काममावना बढती है! यो जात्तके शुद्ध हृदय
तथा परिचार में प्रतिष्ठित होता है ।
मंगल की दृष्टि का अशुभ फल होता है। जातक सुखो से वंचित
रहता है।
बुध की दृष्टि हौ तौ व्यक्तित्व आकर्षक एवं स्वभाव साहसी होता है!
गुरू की दृष्टि शुभ फल देती है { जातक को समी सुख मिलते ै।
शनि की दृष्टि का फल ठीक नष्ीं होता । जाक्क दुर्बल स्वास्थ्य वाला
तथा परिवार की प्रतिष्ठा कां नाशकं कलम गया है
कुच्चिका नक्षत्र स्थित शनि के फल
प्रथम चरणः यर्हौँ शनि हौ तो जात्तक का प्रारंभिक जीवन दुःखी लेकिन
बाद की जिंदगी सुखी .होती है। जातकं पिता के प्रति आदस्माव नहीं
स्खता। उसे विभिन्न रोग मी घेर सकते है-जैसे अपच से संबंधित रोग {
जातक में ईर््या भी कुछ अधिक होती हे।
दवितीय चरणः य्ह शनि आजीवन असंतुष्ट रखता है । पारिवारिक
जीवन भी दुखी रखत्ता है । जातक अपने से बद आयु की स्त्री से विवाह
करता है या यौन संक्ध स्खता है
तृतीय चरणः यँ शनि हो तो जातक को कृषि कार्य से लाम होता है।
चतुर्थं चरणः यह स्थित्त शनि पर यदि चंद्र की दृष्टि हौ तो जात्तक
स्त्रियों के सहयोग से सफलता एवं धन अर्जित कर्ता है! जात्तिकाओं कं
बारे मेँ एेसी दृष्टि उन्हं असुंदरे एवं चरित्रहीनता की सीमा तके ले जाने
वाली कही गयी है!
कृत्तिका लक्लतर स्थित शनि पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि हो तौ जातक शांतिप्रिय, व्यवहार चतुर तथापि पराश्रित
होता है।
चंद्रकी दृष्टि शुम फल देती है। जातक धनी एवं सत्तापक्ष एवं स्त्रियों
की संगति से लामान्वित होता है।
मंगल की दृष्टि जातक कौ सुखी तथापि वाचाल बनाती है ¡
बुघ की दृष्टि स्त्रियो मे जातक की आसक्ति बडाती है! वह कर्संगति
काभी शिकार हौ सकताहै।
गुरुकीदृष्टिका शुभ फल होता है! जातक परोपकारी तथा समाज
मँ समादृत होता है]
ज्योतिव-कौगुदी : (लड-८) नक्षत्र-विचार अ 78
शुक्र की दृष्टि जातक कौ सभी सुख एवं आमोद-प्रमोद के साधन
उपलब्ध कराती है ! जातक सत्ता पक्ष के भी निकट होता है)
कृत्तिका नक्षत्र में स्थित राहु के फल
प्रथम चरणः यह राह हो तो जात्तकं बुद्धिमान, तंदुरूस्त तथापि
अत्यधिक कामी होता है! विचाह के बाद भी चह अनेक स्त्रियों से संब॑घ
रखता है ।
दितीय चरणः य्ह सहु जातक को आध्यात्मिकं प्रवृत्ति वाला बना देत
है । तथापि जीवन संपन्नता से शून्य होता है ¦ जातक की पर स्त्रियो मेभी
आसक्ति होती है। “
तृतीय चरणः य्ह राहु जातक को घोर आलसी फलतः दरिद्र बनाये
रखता है ।
चतुर्थ चरणः य्ह भी राहु शुम फल नहीं देता। जातक बेहद यैर जिम्मेदार
तथा पारिवारिक दायित्व का भी वहने न करने वाला होता है ।
कृत्तिका नक्षत्र स्थित केतु के फल `
प्रथम चरणः इस चर्ण मे केतु हौ तो जात्तक के नौकरी-जीदन मेँ
समस्याएं ही बनी रहती है! उसे निराशा का भी सामना करना पडता है ।
द्वितीय चरणः इस चरण मै केतु हो तो जातक घर से दूर जीवन
विताता है! संपत्ति सरे शून्य एसे जतिक की स्त्रियो मेँ भी गहरी रुचि वनी
रहती है!
तृतीय चरणः इस चरण मँ केतु सट-फाटके मेँ हानि करवाता है । सत्ता
प्ल से दंडित होने का भी भय बना रहता है।
चतुर्थ चरणः इस चरण मे केतु हो तो जातक को नौकरी मै बाधाओं का
सामना करना पड़ता है। विवाह विलंब से होता है । हुआ भी तो परेशानियां
ही बढ़ती है । तथापि तक सुख-सुविधापूर्ण जीवन विताने मँ सफल
रहता हे।
ज्योतिष-कौमुदी : (छ) नक्नत्र-विचार ७ 79
रोहिणी
यशिफले में रोहिणी नक्षत्र 40.00 अंशो से 53.20 अंशो के मध्य स्थित
है! रोहिणी कं पर्यायवाची नाम है-विधि, विर॑चि, शंकर । अरबी मे इसे अल्दे
वारान कहते हँ |
रोहिणी नक्षत्र के साथ अनेक पौराणिक कथाएं जुडी हुई हैँ । कीं उसे
कृष्ण के अग्रजं बलराम की मां कहा गयादहैतो कहीं लाल रग की माय।
उसे कश्यप ऋषि की पुत्री, चंद्रमा की पत्नी भी माना मयाहै
रोषठिणी की आकृति सथ की भाति आकी गधी है)
उसमे कितने तारे है, इस विषय नें मतभेद हँ । सामान्यतः रोहिणी नक्षत्र
भे पांयतारौं की स्थिति मानी गयी हे] दक्षिण भारत के ज्योतिषी रोहिणी मेँ
बियालिस ताँ की उपस्थिति मानते हैँ । उचकं लिए रोहिणी वट वृक्ष स्वरूप
काद,
यह नक्षत्र वृष राशि (स्वामी : शुक्र) के अंतर्गत आता है।
रोहिणी के देवता ब्रह्मा हँ ओर अधिपति ग्रह-चंदर।
गणः मनुष्य, योनिः सर्प व नाडीः अंत्या। चरणक्षर है-ओ,वा, वी, वू
रोहिणी नक्षत्र मेँ जातक सामान्यतः छरहरे, आकर्षक नेत्र एवं चुम्बकीय
व्यक्तित्व वाले होते हैँ! वे भावुक हृदय होते हैँ ओर अक्सर भावावेग मे ही
निर्णय करते हैँ । उन्दं तुनुक-मिजाज भी कहा जा सकता है ओर उनका
हठ लोगो को परेशान कर देता है । उनमें आएत्म लुब्धता की भावना भी
होती है। वै ओरं पर तत्काल भरोसा कर ले ह ओर धोखा भी खाते ह।
जेकिन यह सब उनकी सत्यनिष्ठक्ता में कटु एमी ' नहीं लाता।
ग्योकिष-कोप : वड-4 नक्षत्र-विचार आ ५0
एसे जातक वर्तमानमें ही जीतेहै, कल की चिंता से सर्वथा मुक्त । उनका
जीवन उत्ार-चढाव से भरा रहता है । वे हर कार्य निष्ठां से संपन्न करना
चाहते है, पर अधैर्य उन्हें कोई भी कार्य पूरा नहीं करने देता! उनकी र्जा
बंट-सी जाती है। वे एक को साधने की बजाय सबको साधने की कोशिश
करते है, लेकिन एसे जातकं को यहं उक्ति याद रखनी चाहिए कि-
एक की साधे सड सधौ सम साथे सड कायज
यदि वे अधैर्य त्याग कर संयमित होकर कार्य करं तो जीवन मँ यशस्वी
भी हो सकते हे।
युवावस्था उनके लिए सतत् संघर्ष लेकर आती है । आर्थिक सामस्याओं
कं अतिरिक्त स्वास्थ्य की गड़बड़ी भी उन्हें परेशान किये रहती हे ! अङ्तीस
वर्ष की अवस्था के बाद ही जीवन मेँ स्थिरता आती है।
एेसे जातक माता के प्रति विशेष आसक्त होते है । मातृपक्ष से ही उन्हे
लाम भी ्टोता है। पित्ता की ओर से उन्हँं कोई विशेष लाम नीं होता!
एसे जातकों मेँ यह भी देखा या है कि जरूरत पड़ने पर वे तमाम
रीति-रिवाजो ओर मान्यत्तओं को तिलाजलि भी देते हैँ! देसे जातकों का
वैवाहिक जीवन भी विशेष सुखद नहीं बताया गया है|
रोहिणी नक्षत्र मेँ जन्मे जातक रक्त संबंधी विकारो के शिकार हौ सकते
है-यथा रक्त का मधुमेह आदि।
रोहिणी नक्षत्र मँ जन्मी जातिकाएं भी सुंदर एवं आकर्षक व्यक्तित्व
: वाली होती ह! वै सद्- व्यवहार वाली होती हैँ तथापि प्रदर्शन-ग्रिय भी.
येहिणी नक्षत्र मे जन्मे जातकौ की तरह वे भी तुनुक-मिजाजी के कारण
दुःख उठाती हे । वे व्यवहारिक होती हैँ, अतः वे थोडे से प्रयत्न से अपनी
इस आदत पर काबू पा सकती है।
एेसी जातिकारं प्रत्येक कार्य को भली भांति करने मेँ सक्षम होती हैँ ।
फलतः उनका पारिवारिक जीवन भी सुखी होता है । लेकिन पूर्ण वैवाहिक
एवं पारिवारिक सुखे प्राप्त करने कं लिए उन्हें अपने ही स्वभाव पर अंकुश
लगाने की सलाह दी जाती है।
एसी जातिकाओं का स्वास्थ्य प्रायः ठीक ही रहता है |
रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण का स्वामी मंगल, द्वितीय चरण का शुक्र,
तृतीय चरण का बुध एवं चतुर्थ चरण का स्वयं चंद्र होता है]!
रोदिणी नक्षत्र मेँ सूर्य की स्थिति के फल
प्रथमे चरणः य्ह सूर्यं जातक के बुद्धिमान, व्यवहार कुशल ओर
ज्योतिष-कौपदी ; (व्व) नक्षन-विचार # 81
वेश-मूषा के प्रति ज्यादा सतर्क होने की सूचना देता है! जातक को
पशुपालन से लाम होता है]
द्वितीय चरणः य्ह सूर्यं हो तो व्यक्तित्व आकर्षक होता है । जातक तेल
संबंधी व्यवसाय से जुड़ सकता है।
वृतीय चरणः यँ सूर्यं जातक को समाजसरेवी एवं यशस्वी बनाता है ।
तथापि उसे आर्थिक अभाव बना रहता है ।
चतुर्थं चरणः यँ सूर्य जातक को शासकीय सेवा में तै जाता है। उसे
यात्राएं भी करनी पड़ सकती है।
रोहिणी नक्षत्र स्थित सूर्यं पर विभिन्न गरो की दृष्टि
चंद्र की दृष्टि.जातक को जल संब॑धी व्यवसाय-कार्य से जोड्ती है!
मंगल की दृष्टि उसे धनी एवं यशस्वी बनाती है ! जातक सेना से जड़
सकता है।
बुध की दृष्टि उसे परिवार मे, समाज में प्रतिष्ठा दिलाती है।
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है] उसके
जितने मित्र होते है, उतने ही शत्रु भी होते है।
गुरु की दृष्टि्ो तो जात्तक परिवार एवं समाज मे भी प्रमुख हौता
है| सामाजिक मान-सम्मान, यश से युक्त जातक सत्ता पक्ष से भी लाभ
पाता है।
शनि की दृष्टि दहो तो आर्थिक अमाव एवं खराब स्वास्थ्य की सूचना
मिलती है।
रोहिणी नक्षजर्मे चंद्रके फल
प्रथम चरणः यँ चंद्र हो तो जातक मिष्टमाषी, स्नेहिल व्यवहार वाला
एवं धनी होता है}
द्वितीय चरणः यह चंद्र जातक की संगीत एवं अन्य ललित कलाओं में
रुचि बढाता हे । शिक्षा मे व्यवधान, आवास-परिवर्तन के भी फल कहे गये हँ
तृतीय चरणः य्ह चेद्रहो तो जातक को सुंदर स्त्रियौ का सानिध्य
मिलता है! जातक बुद्धिमान, आकर्षकं व्यवितित्व कला तथापि भीरू भी
होता है।
चतुर्थ चरणः यहो चंद्र जातक को सत्यनिष्ठ बनाता है । रत्न संबंधी
व्यापार-कार्य ने उसे विशेष सफलता मिलती है।
ज्योतिव-कौमृदी : (खड नकषत्-विचार @ 82
रोहिणी नक्षत्र स्थित चंद्र पर विभिन्न फरो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि से कृषि कार्यो से लाम होता है। वह धनी एवं गुह्य
विधाओं मे रुचि रखता है ।
मंमल की दृष्टि हो तो जातक सत्यवादी, समादृत तथापि विपरीत योनि
वालों के प्रति आकर्षण का अनुभव करता ही रहता है ।
बुध की दृष्टि हो तो जातक अत्यंत बुद्धिमान तथा जीदन म सफल
रहता है।
गुरु की दृष्टि कं फलस्वरूप जातक धार्मिक वृत्ति का, उत्तरदायित्व
की पूर्ति करने वाला होता है।
शुक्र की वृष्टि जातक को समी भौतिक सुख प्रदान करती हे ।
शनि की दृष्टिद्ो तो जातक को मातृ-स्नेह से वंचित रहना पड़
सकता है! पिता से भी कोई लाभ नहीं मिलता।
सेहिणी नकं मे मेगल के फूल
प्रथम चरणः जातक मधुरमाषी एवं काद्य संगीत्त भे रुचि रखता ह ।
द्वितीय चरणः जातक प्रतिरक्षा सेवाओं मे जा सकता है। यदि सूर्यके
साथ मंगल की युति हो तो यह स्थिति दूसरी बनती है।
तृतीय चरणः मंगल जातकं को साहसी एवं विद्वान बनाता है ।
चतुर्थं चरणः जातक धनी एवं सुरा-सुंदरी का शौकीन होता है । वह
अवैध मार्गो से घन कमाने मेँ भी नहीं हिचकता 1
सेहिणी स्थित मंगल पर अन्य ग्रहो की दृष्टि
सूर्य कीदृष्टिहोतो जातक पर्वतीय प्रदेशों म रहना पसंद करता है।
वह पत्नी को सुख नहीं दे पाता।
चंद्र की दृष्टि जातक को स्त्रियं का सुखं प्राप्त करती है।
बुध की दृष्टि हो तौ जातक धार्मिक शास्त्रों का ज्ञातता, धनी तथापि
कलहप्रिय होता है।
गुरु की दृष्टि जातक को संगीत आदि कलाओं मँ निष्णात तथा
सहृदय, परोपकारी बनाती है ।
शक्र की दृष्टि हो तो जातक प्रसिद्ध राजनेता बन सकता है।
शनि की दृष्टि कं अच्छे फल मिलत्ते है ! जातक विद्वान एवं ग्राम या
नगर का प्रमुख का पद संभाल सकता हे।
ज्योतिष-कौुदी : (ल-1/ नसज-विचार क 83
रोहिणी स्थित बुध के फल
प्रथम चरणः जातक चतुर एवं धनी होता है } पत्नी सुशील, सुसंस्कृत
होती है।
द्वितीय चरणः जातकं को वेदौ का ज्ञाता, विद्धान तथा प्रसिद्ध बनाता
है1 उसके विवाहपूर्वे मी यौन-संब्ध हौ सकते हैँ |
तृतीय चरणः जातक दृढ़ स्वमाव वाला, कामुक वृत्ति का होता है!
चतुर्थं चरणः बुघ संबंधियों से लाम का कारक बनता है।
रोहिणी स्थित बुध पर अन्य अर्हो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि स्वास्थ्य के लिए अशुम मानी गयी है ! जातक अभावग्रस्त
तथापि परोपकारी होता है।
चंद्रकीदृष्टिहौ तौ जात्तक परिश्रम, धनी, सत्तक्ष के निकट होता है।
मंगलं की दृष्टि से उसे सत्ता पक्ष से लाम मिलता है।
गुरु कीं दृष्टि हो त्तो जातक बुद्धिमान, धनी, नेतृत्व के गुण वाला
होताहै)
शुक्र की. दृष्टि जातक को कामासक्त बनाती ै।
शनि की दृष्टि हो तो जातक को परिवार से मानसिक पीडा होती है]
रोहिणी नक्षत्र र्मे गुरु के फल
प्रथम् चरणः यषां गुरु हो तो जातक सत्यनिष्ठ ओर दर्शनशास्त्र मेँ गहरी
दिलचस्पी रखने वाला होता है! एेसा जातक हमेशा अच्छे लोगों की संगति
करता है । उसका जीवन भी पूर्णतः सुखी रहता है, अच्छी पत्नी, सुयोग्य
संतान । जातक मेँ नेतृत्व के भी गुण होते है! जातक प्रशासन, संगठन में
कुशल एवं यशस्वी होता है।
द्वितीय चरणः यर्हौ गुरु हो तो धार्मिक प्रवृत्ति का. पितृ-मक्त, सद्गुणी,
सत्यनिष्ठ होता है ! दो पत्नियों का योग भी बताया गया है! एेसे जातकों
को अस्थमा पैदा' करने वाले वातावरण से दूर रहना चाहिए।
तृतीय चरणः यहाँ गुरु हौ तो विपरीत फल मिलते हैँ ! जातक अपनी
कामवासना की पूर्तिं मे छंच नीच का मेद नदीं कर्ता|
चतुर्थ चरणः यहौँ गुरु की उपरिथति अनेक यात्र ओं का योग दर्शी है {
बत्तीस वर्ष की आयुं तक जीवन् संघर्षमय व आर्थिक तनावों से भरा होता है ।
इसके बाद किसी सहृदय की सष्टायता से वह जीवन में संपूर्ण सफलता प्राप्त
करता है।
ज्योतिक-कौयुदी ˆ (ववर नक्षत-क्वार अ 84
रोहिणी नक्षत्र स्थित .गुरु पर विभिन्न उर्हो की दृष्टि
सूर्य कीदष्टिहो तो जातक के प्रतिरक्षा सेनाओं मेँ जाने के संकेते
मिलते
चंद्र की दृष्टि जातक को सत्यनिष्ठा से मरपूर, सहृदय ओर परोपकारी
बनाती है]
मंयल की दृष्टि परिवार का पूर्णं सुख प्रदान करती है ¡ अच्छी पत्नी,
अच्छे बच्यै। उसे सत्ता पक्ष से भी लाम मिलता है।
बुध की दृष्टि हो तो जात्तकं का व्यक्तित्व आकर्षक तथा वह यजनीति
मँ सफलता प्राप्त करता है।
शुक्र की दृष्टि जातक को धनी, सौमाग्यशाली ओर दरिद्रो की सहायत्ता
मे प्रवृत्त करती है।
शनि की दृष्टि हो तो जातकं धनी, यशस्वी होता है ¦ राजयोग के भी
फल मिलते है।
रोहिणी नक्षत्रम शुक्र के फल
प्रथम चरणः यहो शुक्र हो तो जातक धनी, समी सुविधाओं से पूर्ण
जीवन बिताता है। तथापि चैतीस वर्ष की अवस्था तक उसे पारिवारिक
कलह से त्रस्त रहना पडता दै। समय के साथ स्थितियों मे सुधार
आता है।
द्वितीय चरणः यहौँ शुक्र जातक की ललित कलाओं, विशेषकर संगीत
मेँ रुचि बढाता है । उसमं लेखन एवं अभिनय के गुण मी होते हैँ । जातक
का पारिवारिक जीवन सुखी होता दै ।
तृतीय चरणः यँ शुक्र जातक की कामवासना मेँ घोर वृद्धि करता है ।
फलतः उसे बाद मै तरह-तरह के शोषण का शिकार होना पडता है । उसे
गुप्त रोग भी हो सकते है|
चतुर्थं चरणः यहो शुक्र हो तो जातक की पत्नी बेहद सुंदर तथा उसके
कारण उसकी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ होती ्ै।
सेहिणी नक्षत्र स्थित शुक्र पर व्रिभिन्न गरो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक को स्तर्यो से लाम हौता है तथापि
वैवाहिकं जीवन मै अशांति ही भरी होती है।
चंद्र की दृष्टि हो तो जातक मृदुमाषी, सरिवार मेँ श्रेष्ठ तथापि काम-
वासना से पीडितं रहता है ।
ग्वोततिष-कौयुदी ˆ (श्रड-१/ गेफेत्-किवार अ 85
मंगल की दृष्टि जातक को क्रूर हदय बनाती है। उसका जीवन भी
अमावमय बीतता हे।
बुध की दृष्टि हो तो जातक का व्यक्तित्व आकर्षक एवं स्वभाव
शांतिप्रिय होता है!
गुरु की दृष्टि हो तो जीवन सुखी, सुविधाओं से युक्त कहा गया हे।
शनि की दृष्टि स्वास्थ्य खराब रखती है । जीवन भी अमावमय बीतता ह ।
रोहिणी नक्षत्र स्थित शनि के फल
प्रथम चरणः य्ह शनि हो तौ जातक धार्मिक प्रवृत्ति को, सुखी जीवन
व्यतीत करने वाला होता है । तथापि छरम जुआरीपन की प्रवृत्ति भी हो
सकती है।
दवितीय चरणः यर्हौँ शनि हौ तो जातक को चशुपालन से लाम होता है]
तृतीय चरणः य्ह शनि को शुभ फल देने वाला कहा गया है । जातक
अत्यंत बुद्धिमान तथा मृदुमाषी धार्मिक विषयों मे शोधकर्ता होता है ।
चतुर्थ चरणः य्ह शनि हो तो जातक सत्ता पक्ष के निकट होता है ¡ वह
स्वयं मी राजनीति मेँ जाकर धनी एवं यशस्वी हो सकता है 1 पशु पालन से
भौ उसे लाभ होता है।
रोहिणी नक्षत्र स्थित शनि पर विभिन्न अर्हो की दृष्टि
भूर्य की दृष्टि दरिद्रता से भरे जीवन का संकेत करती हे
चंद्र की दृष्टि शुम फल देती है । जातक धनी, बलिष्ठ तथा सत्ता पक्ष
से सम्मान पाता है।
मंगल की दृष्टि जातक को सामान्य धनी तथा वाचाल बनाती है!
बुघ की दृष्टि जातक की काम-पिपासा में घोर वृद्धिं करती हे ¡ वह
पशु की तरह व्यवहार कर सकता है।
गुरु की दृष्टि उसे परोपकारी, रोगियों की सेवा करने वाला बनाती है ।
शुक्र की दृष्टि हयो तो जातक रत्नों के व्यापार से लाम उठा सकता है।
वह सुरा-सुंदरी का भी शौकीन होता है।
रोहिणी नक्षत्र स्यित राहु के फल
प्रथम चरणः य्ह राहु हौ तो जातक छरहरे बदन का निर्मीक मानस
वाला होता है! उसे वायु विकार होता है एवं अपच की आशंका बनी
रहती हे ।
ज्योतिष-करगुदी : (व्ड-५ नकत्र-ङिदार ७ 86
दित्य चरणः यदह राहु अत्यंत शुभ फल देता है । जातक शक्ति
संपन्न, असाधारण रूप से ख्यात तथा समाज मेँ समादृत होता है|
तृतीय चरणः य्ह राहु सर्वथा विपरीत फल देता है । इस चरण मे राहु
हो तो जातक अभावग्रस्त जीवन बिताता है| वह जल प्रदूषण से हीने वाले
सर्गौ का जल्दी शिकार हौ सकता है!
चतुर्थ चरणः यौ सहु हो तो जातक मे काव्य प्रतिभा होती है ¡ भले वह
आधुनिक अर्थ मेँ "सुशिक्षितः न हो तथापि अपने काव्य कं कारण प्रसिद्ध भी
होता है। एसे जततर्को को यात्राओं के समय दुर्घटनाग्रस्त हो जाने का
अदेशा बना रहता है।
रोहिणी नक्षत्र स्थित केतु के फल
प्रथम चरणः यहो केतु हो तो जीवन परावलम्बी हौता है!
द्वितीय चरणः य्ह केतु हो तो बचपन मेँ दृष्टि दौष की आशंका बनी
रहती है।
ततीय चरणः यर्हौँ केतु जातक को अध्यापन के पेशे से जोडता है।
पत्नी खर्चलि स्वमाव की होती हे ।
चतुर्थं चरणः यर्हौँ केतु के अच्छे फल मिलते हँ । जातक वेदाभ्यासी,
विद्वान, तार्किक एवं तंत्र-मंत्र विशारद होता है। एसे जातक आयुर्वेदिक
चिकित्सा केष्ेत्र मै भी सफल होते ह
ग्योतिष-कौमदी : (खर-1/ नत-किवार अ 87
मुगशिर
राशि पथ में 53.20 अंशो से 66.49 अंशो के मध्य मृगशिरा नक्षत्र की
स्थिति मानी गी है! अरबी मेँ उसे *अल अकार्ई' कहते हैँ । इसके अन्य
पदाधिकारी नाम है-सौम्य, चंद्र, अग्रहायणी, उडप ।
चंद्रमा को इस नक्षत्र का देदता तथा मंगल को इसका अधिपति ग्रह
माना जाता है।
इस नक्षत्र म तीन् तारे हैँ जिन्हं हिरण अर्थात् मृग के सिर की तरह
कल्पित किया गया है! इसके साथ एक पौराणिक कथा जुडी हुई । ब्रह्मा
ने जब मृग का रूप धर कर अपनी बेटी रोहिणी का पीषछठा किया तो इस
अपराध के कारण उनका सिर काट दिया गया। यही कंटा सिर मृग शिर
नक्षत्र के रूप रमे है।
लोकमान्य तिलक के अनुसार इस नक्षत्र का नाम अग्रहायणी इसलिए
प्या कि वैदिक युग में वसंते सपांत बिंदु इस नक्षत्र के मध्य पडता था. अतः
इसका नाम अग्रहायणी पड़ा।
इस नक्षत्र के प्रधम दो चरण दृष राशि के अंतर्गत आते हँ ओर अंतिम
दो चरण मिथुन रायि में। वृष का स्वामी शुक्र है, मिथुन का बुध ।
सणः देव, योनिः सर्पं एवं नाङीः मध्य है।
चरणाक्षर दैवे, बो, क, की!
मृगशिर नक्षत्र मेँ जन्मे जातक बलिष्ठ, सुंदर, लंबे कंद के होतेह।
एसे जातक सरल प्रवृत्ति के, निष्पक्ष, सिद्धांतप्रिय तथा राय देने मेँ हमेशा
ईमानदारी बरतते हैँ । वे सुशिक्षित तथा विभिन्न कार्यो को करने मँ सक्षम
ज्वोतिष-कौयुदी : (वड) नत-विवार छ 88
होते हँ । तथापि उनका एक दोष यह है कि वे किसी प्र विश्वास नहीं
करते। सदैव संशय से धिर रहते है! ओर कहा गया है-संशयात्मा
विनश्यति।' फल यह होता है किं अक्सर लोग भी एेन वक्त पर उन्है
धोखा दे जाते हैँ । रंशय कीं प्रवृत्ति एेरो जातकों को भीतर से भीरु भी बना
देतीहे।
एसे जातकौ का वैवाहिक जीवेन सामान्यतः सुखी बीतता है. किंतु पत्नी
के सदैव रोगिणी रहने के फल भी कहे गये हैँ । जातकं का वैवाहिक जीवन
यो तो सुखी बीतता है तथापि उसके संशयपूर्ण तथा हठी स्वभावे के कारण
संबंध कछ समय के लिए तनावपूर्ण भी हो सकते है ।
एसे जातकों का बचपन में रुग्ण होना बत्ताया गया है । निरंतर कब्ज के
कारण उन्हें उदर रोग भी हौ सकते हैँ]
मृगशिर नक्षत्र मे जन्मी जातिकारं छरहरी, तीखे नयन-नक्श वाली
तेथा अत्यंत बुद्धिमती होती हैँ । उनमें सदैव सर्तकता, हाजिर जवाबी भी
रहती है तथापि उनकी वाणी का व्य॑म्य लोगों को तिलमिला देता है। `
एेसी जातिकार्ओं की शिक्षा भी अच्छी होती है तथा वे भैकेनिकल
या उलैविद्रकं इंजीनियरिंग, इलेक्टानिक्स आदि क्त्र मे भी सफल हो
सकतीर्है।
फेसी जातिकाओं मे समाज सेवा की भावना भी होती है।
एेसी जात्िकाओं का वैवाहिक जीवन सुखी रहता है ! भले विवाह पूर्व
उनके प्रणय संव॑घ रे हो, विवाह के बाद ये पत्ति के प्रति एकनिष्ठ रहती हैँ {
एेसी जातिकाओं को अपने मासिक धर्म मे आने वाले दोषौ कौ उपेक्षा नहीं
करनी चाहिए अन्यथा वे तरह-तरह के रोगो का शिकार भी हो सकती है}
मृगशिर नक्षत्र के विभिन्न चरणों क स्वामी है-प्रथम चरणः सूर्य, दितीय
चरणः बुघ, तृतीय चरणः शुक्र, चतुर्थं चरणः मंगल ।
मृगथिर लक्षत्र मे सूर्य के फल
प्रथम चरणः यर्हौँ सूर्य हो तो जातक भाग्यशाली, आकर्षक व्यक्तित्व
वाला, बुद्धिमान एवं धनी होता है ¡ उसे मुख, नेत्र. आदि के रोगं के प्रति
सतर्क रहना चाहिए!
द्वितीय चरणः यह सूर्य हो तो भी जातक का व्यक्तित्व शानदार होता
है! उसकी गायन-वादन मे भी रुचि होती है।
तृतीय चरणः यँ सूर्य हो तो जातक आर्थिक जगत में उच्च पद पाता
है। वह जनसंपर्क मेँ भी कशल, सफल होता है।
भ्योतिष-कौमुदी : (खड नकषत्र-विचार ऋ 89
चतुर्यं चरणः यहो सूर्यं अच्छे फल देता है ¦ जातक समाजसेवी एवं
प्रख्याते होता है।
मूमशिर नक्षत्र स्थित सूर्य पर अन्य अर्हो की दृष्टि
चंद्रकीदृष्टिहो तौ जातक जल संबंधी व्यवसाय मेँ सफल होता है।
मंगल की दृष्टि जातक को साहस्र से धनोपार्जन करने वाला
बनाती है।
बुघ की दृष्टि से जातक आकर्षक व्यक्तित्व का, प्रसिद्ध लेखक बनता है
गुरु की दृष्टि उसे सत्ता पक्ष कं निकट लाकर लाम दिलवाती है ।
शुक्र की दृष्टि हो तो पारिवारिक जीवन सुखी तथा जातक राजनीति में
ऊचे पद पर पर्हुचता है ।
शनि की दृष्टि उसे भद्र वृत्ति का तथा अपने से अधिक आयु की स्त्रियो से
काम-सं्बध रखने वाला बनाती है ¦
मृगशिर र्मे चंद्र की स्थिति के फल
प्रथम चरणः यहौँ चेत्र जातक को बुद्धिमान, प्रसिद्ध व राजनीति के कषेत्रम
यशस्वी होता है ¡ पत्नी संदर, धनी-परिवार से, अनेक पुत्रर्यो की मां होती हे ]
द्वितीय चरणः यँ चंद्र हो तो जातक का जन्म अभिजात्य परिवार मेँ होता
हे ¡ वैवाहिक जीवन के पूर्ण सुख मिलता है।
तृतीय चरणः यहो भी चंद्र शुभ फल देता है । जातक धनी होता है तथापि
उसका आरंभिक जीवन संघर्षमय बीतता हे । जातक कौ मात्ता से पूर्ण स्नेह
नहीं मिल पाता।
चतुर्थ चरणः यर्हो चंद्र हो जातक बलिष्ठ एवं स्वस्थ होत है । ओषध,
रसायन, प्रसाधन सामग्री आदि से संबंधित कार्यो मेँ उसे विशेष सफलता
मिलती है।
मृगशिर स्थित चंद्र पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक धनी, साहुकार एवं कृषि-क्ेत्र म लाम कमाने
वाला होता है।
मंगल की दृष्टि शुम नहीं होती } जातक पत्नी को त्याग परस्त्रियो के प्रेम
मेँ पड़ सकता है।
बुध की दृष्टि जातक को विद्या व्यसनी बनाती है।
गुरु कीदृष्टिहोतो जातक को जीवन मे सभी सुख प्राप्त होते है।
प्रसिद्धि, अच्छी पत्नी, अच्छे बच्चे |
शुक्र कीदृष्टिहोतो जातक कोमां से विरासत मेँ संपत्ति मिलती दहै।
शनि की दृष्टि घन की दृष्टि से शुम नहीं होती । जीवन अभावमय होता
है, तथापि बच्चे अच्छे, आज्ञाकारी होते है ¦
मृगशिर स्थित मंगल के फल
प्रथमः चरणः य्ह मंगल हौ तौ जातक कंदुमाषी एवं अभाव से भरे
जीवन वाला होता है। उसे पत्नी का भी विष्ठोह सहना पडता है ।
द्वितीय चरणः यर्हौ मंगल हो तो जातक अपने ही परिवार के लिए
घातक तथा अपयश का कारण बनता हे!
तृतीय चरणः यहो मंगल हो तो जातक का जीवने दरिद्र होता है।
जीवन दुखी ही बीतता है।
चतुर्थं चरणः य्ह भी मंगल सामान्य फल देता है । वैवाहिक जीवन
सुखी तथापि पत्नी रुग्ण होती है|
मृगशिर स्थित मंगल पर विभिन्न रहो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि जातक को साहसी एवं प्रकृति-ग्रेमी बनाती है तथापि
स्त्रियों के प्रति उसके मन भँ घृणा का भाव बना रहता है ।
चंद्रकीदृष्टिहो तो जातक वेश्यागमन की लालसा बलवती हौ जाती
है! मां का अनादर करने से भी वह नहीं चूकता !
बुघ की दृष्टि हो तो जातक अल्प धनी तथापि पुत्रवान होता है।
गुरु की दृष्टि जातक को संगठित एवं गायने-वादन कला की ओर प्रवृत्त
करती है|
शुक्र की दृष्टि राजनीति के क्षेत्र मे उच्च पद प्राप्त कर सकता है । यदि
वह प्रतिरक्षा सेवाओं मे जाता है तो वर्ह भी उसे सफलता मिलती है!
शनि की दृष्टि शुम फल देती है । जातक ग्राम या नगर-प्रमुख होता हे ।
मृगशशिर स्थित बुध के फल
प्रथम चरणः यर्हौ बुघ हौ तो जातक सर्वगुण सम्पन्न होता है ।
द्वितीय चरणः य्ह बुध हो तो जातक निम्न कार्यो मेँ जुट कर धन
कमाने की ओर प्रवृत्त होता है।
तृतीय चरणः य्ह बुध शुम फल देता हे ¡ जाक साहसी, बुद्धिमान.
प्रसन्नचित्त, साथ ही वासनाप्रिय भी होता है। उसके अनेक संबंध हो
सकते हैँ
ज्योतिष-कीमुदी : (छ!) नतत्र-विवार अ 91
चतुर्थं चरणः यहो बुध हो तौ जातक बेहद धार्मिक, ईश्वरभक्त होता है।
वह अपने परिश्रम से जीवन मे ऊंचाइयों तक पर्हुचता है ।
सूगस्थिर स्थित बुध पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि जातक को नौकरी-पेशा दाला बनाती है!
चंद्र की दृष्टि शुद्ध हृदय, स्वस्थ व परिवार मे आसर्ति वाला बनाती है।
मंगल की दृष्टि मिश्रित फलं देती है]
गुरु की दृष्टि हो तो जातक अत्यंत बुद्धिमान, विवेकी, वचन-निष्ठं तेथा
नेत्तृत्व की क्षमता से युक्तं होता है।
शुक्र की दृष्टि जातक को सौमाग्यशाली, धनी बनाती है
शनि की दृष्टि के शुम फल नही मिलते। जीवन दरिद्र, दुखी होता है!
संबंधी भी कष्टों के कारण बनते है|
मृगस्थिर स्थित गुरु के फल
प्रथम चरणः य्ह गुरु हो तौ जातक अस्थिर मत्ति होने के बावजूद
पठन-पाठन, लेखन का शौकीन तथा प्रसिद्धं होता है । `
द्वितीय चरणः यँ गुरु जातक को स्ता पक्ष के निकट बनाये रखता है।
तृतीय चरणः य्ह गुरु के शुभ फल नही मिलते । जात्तक कूपण अर्थात्
कंजूस एवं परिवार सुख से हीन होता है।
चतुर्थ चरणः यौ गुरु शुभ फल देता हे । जातक धनी-समाज तथा सत्त
प॒क्ष से सम्मानित होता है । एेसे जातक दूसरों के मन की बात भी जान लेते है ।
मृगशिर स्थित शुरु पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्यकी दृष्टि शुम फल देती है । जातक धनी एवं सत्ता पक्ष के निकट
होता है।
चंद्र की दृष्टि भी जातक को धनी बनाती है तथापि उसमे राज प्रवृत्ति
अधिक होती है]
मंगल कौ दृष्टि हो तो जातक विद्वान, साहसी एवं धनी होता है, तथापि
पारिवारिक सुख की केमी होती हे!
बुधकी दृष्टि भी जातक को विद्वान एवं सद्गुण संपन्न बनाती है!
शुक्र की दृष्टि हो तो जातक का व्यवितित्व आकर्षक होता है । स्त्री सुख
भी पयम्ति मिलता है, ,
शनि की दृष्टि से जातक विद्वा के कारण सर्वत्र प्रशंसित होतः है ।
ज्योतिष-कौयुदी : (वड) नक्त्र-वियार अ 92
मृगशिर स्थित शुक्र के फल
प्रथम चरणः य्ह शुक्र हो तौ जात्तक ललित्तं कलाओं, विशेषकर
संगीत में निष्णात एवं समाज से सम्मानित भी होता है} उसमें अभिनय
की भी क्षमता होत्री है। जात्तक मेँ काम-प्रवृत्ति की अधिकता के भी फल
मिलते है)
दितीय चरणः यह शुक्र हो तौ जातक स्वस्थ, परोपकारी तथा धनी
होता है! उसे अनेक स्त्रियों का सुख भी मिलता है ।
तृतीय चरणः यौ शुक्र हो तो जातक ललित कलाओं नें निपुण होता
है । विज्ञान एवं शास्त्रों के अध्ययन मेँ भी उसकी रुचि होती है।
चतुर्थ चरणः यर्हो शुक्र जातक की लेखन या काव्य प्रतिमा मे चार चांद
लगाता है।
मूगशिर स्थित शुक्रं पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि हो तो जातक धनी, भूमि एवं भवर्नो का स्वामी तथा सुंदर
स्त्रीकापति होता हे,
चंद्र की दृष्टि संकेत देती है कि जातक की मां की समाज मेँ अत्यंत
प्रतिष्ठा होती है, जिसका उसे भी लाम मिलता है।
मंगल की दृष्टि वैवाहिक जीवन अशांत बनाती है} स्त्रियों की संगति
मँ उसके धन का अपव्यय होता हे ।
बुघ की दृष्टि जातक को सौभाग्यशाली, प्रसन्नचित्त बनाये रखती हे ।
गुरुकी दृष्टिहो तौ पत्नी एवं बच्चों का पूर्णं सुख मिलता हे ।
शनि की दृष्टि से जीवन दुखी रहता है | पत्नी से मी कष्ट ही मिलता है।
मूगिर नक्षत्र में शनि के फल
मृगशिर नक्षत्र मै शनि कं विक्षेष शुम फल नहीं मिलते;
प्रथम चरणः यर्हाँ शनि हो तो जातक छरंहरा, अभावग्रस्त तथा निम्न
कोटि की स्त्रियौ से यौन-संबरधों के लिए आतुर रहता है।
दितीय चरणः यहो शनि जात्तक को कसंगति का शिकार बनाता है ! आयः
से व्यय अधिक होता है । दीर्घजीवी एसा जातक सदैव कामातुर बना रहता है ।
तृतीय चरणः यहो शनि हो तो जातक प्रतिरक्षा सेवाओं मे जा सकता
है। उसे मस्तिष्क विकार की भी आशंका बतायी गयी है।
चतुर्थं चरणः यर्हो शनि हो तो जातक धार्मिक वृत्ति का, जन्म स्थल से
दूर जीवन बिताने वाला होता है!
ज्योतिष-कोमुदी : (खड नक्षत-विधार अ 9
सुमशिर स्थित शनि पर विभिन्न ग्रहो कीदृष्टि
सूर्य की दृष्टि शुम फल दैती है। जातक वेद अर्थात् धर्मग्रंथ का
अम्यासी एवं विद्वान होता है ¡ पर उसे पराधीन जीवन बिताना पडता है ।
चंद्र की दृष्टि जातक को राजनीति मे सक्रिय कर ऊंची रिथित्ति में
पर्हुचा सकती है । वह किसी संगठन या विमाग का प्रमुख बन सकता है।
उसमें नेतृत्व की एवं संगठन की क्षमता होती है!
मंगल की दृष्टि सुखी परिवार एवं जातक के प्रतिरक्षा सेनाओं मे जाने
कं संकेत कसती है।
बुध की दृष्टि हो तो जातक अवैध कार्यो के कारण निंदित हो सकता है।
गुरू की दृष्टि हो तो जातक परोपकार एवं सबके सुख-दुःख में हाथ
बटाने वाला होत्ता है।
शुक्र की दृष्टि प्रथम चरेण स्थित्त शनि पर हो तो जातक अपार संपत्ति
का स्वामी बनता है। वह स्ता पक्ष कं निकट रहकर लाम उढठाता है।
सुरा-सुंदरी का उसे विशेष शौक हौता है।
मूगशचिर स्थित राहु के फल
प्रथम एवं चतुर्थं चरण स्थित्त राहु विशेष शुम फल देता है ¡
प्रथम चरण में राहु हो तो जातक वैभव संपन्न एवं समाज मेँ समादृत
होता है] चतुर्थं चरण र्मे राहु हो तो जातक विद्वान एवं सत्ता पक्ष से
सम्म्रानित्र होत्ता है । अच्छी पत्नी, अच्छे बच्चो के कारण पारिवारिक जीवनं
भी सुखी रहता है।
इन फलों के विपरीत यदि राहु द्वितीय चरण मेहो तो जतक
तुनुक-मिजाज, कुटिल बुद्धिवाला, वैमव संपन होता है ¦ तृतीयं चरण मेँ
स्थित सहु जातक को ईर्ष्य, लोभी एवं असंतुष्ट प्रकृति का बनाता है|
मूगशिर नक्षत्र स्थित केतु के फल
मृगशिर नक्षत्र के तीन चरो मे केतु शुम फल नहीं देता।
प्रथम चरण में केतु हो तो जीवन चिंताओं से युक्त । तृतीय चरण मेहो
तो जातक ईर्ष्यलु प्रकृति का तथा चतुर्थ चरण मे हो तो जातक कलह
प्रिय, पायः कर्मो मेँ रत रहता है।
केवल द्वितीयः चरण मेँ केतु शुम फल देत है यद्यप्रि जातकं विकलांग
हो सकता है तथापि दह अपना सारा जीवन मानसिक.रूप से बाधित लोगों
की उन्नति के लिए लगा देता है)
ज्योतिव-कगुदी - (श्-{/ न्केत-विचयर अ ५4
आर्द्रा
राशि पथ मेँ आर्द्रा नक्षत्र की स्थिति 66.49 अंशो मेँ 80.00 अंशो के मध्य
मानी मयी है। पर्यायवाची अन्ध नाम है-अरबी मे इसे अल हनाह कहा
जाता है।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र रद्रा नक्षत्र मेँ केवल एक तारे की उपस्थिति
को मानता है, जबकि अरबी उसे दौ क्ता को मिलाकर बना मानते है!
इसकी आकूति मणि जैसी मानी गयी दै । आर्द्रा का देवता रूद्र को माना
गया है, जबकि स्वामी ग्रह है-राहु।
नारीः आद्या, योनिः श्वान, गणः मनुष्य । चरणाक्षर है-क्, घ, ङ, छ।
इस नक्षत्र के चारों चरण मिथुन राशि (स्वामी; बुघ) के अत्तर्गत होते है ।
आर्द्रा नक्षत्र मे जन्मे जातक कर्तव्यनिष्ठ, कठिन परिश्रमी तथा सौपि गये
कायं को जिम्मेदारी से निमाने वाले होते है उनमे विविध विष्यो का ज्ञान
पाने की भी ललक होती है । विनोदी वृत्ति कं एैसे जातक सबसे सज्जनता
पूर्ण व्यवहार करते दै । एेसे जातक प्रायः अपने जन्म्-स्थल से दूर ही जीवन
विताते है! चकि वे हर विषय मेँ कुछ न कुछ जानकारी रखते है, अत्तः वे
शोधकार से लेकर व्यवसाय तक सभी मे सफल हो सकते हैँ 1 यद्यपि जीवन
मे उन्हे अनेक समस्याओं का सामना करना पडता है, तथापि वे कभी उनका
ओरों से जिक्र नहीं करते।
एसे जातकों का शीघ्र विवाह दुखदायी हो सकता है, जबकि विलम्ब
से विवाह पूर्णं पारिवारिक सुख का संकेत करता हे।
आर्द्रा नक्षत्र म जन्मी जा्तिकाएं सुंदर नेत्र, जरा ऊंची नाक वाली होती
ह। वे बुद्धिमती, शांतिप्रिय तथा दूसरों की सहायता मेँ भी तत्पर रहती है ।
तथापि अनाप-शनाप खर्च की तथा छिद्रान्वेषी प्रकृति कलह पैदा करने
वाली होती है। र
एेसी जातिकाओं का विवाह प्रायः विलम्ब से होता है, तथापि सन्द पत्ति
या पति के परिवार मेँ पूर्ण सुख नहीं मिलता।
स्योतिष-कीमुदी - (छ) गेन-विकार अ 9६
आर्द्रा के विभिन्न चरणों कं स्वामी है-प्रथम चरणः गुरु. दितीय चरणः
शनि, तृतीय चरणः शनि, चतुर्थ चरणः गुरु ।
आर्द्रा के विभिन्ने चरर्णो नें सूर्य की स्थिति
आर्द्रा के विभिन्न चरणो गँ स्थित सूर्य प्रायः शुभ फल देता ह! कह
ज्योतिष शास्त्र का ज्ञाता भी बनाता है।
प्रथम चरणः यर्हौ सूर्यं के फलस्वरूप जातक विद्वान ओर धनी होता है ।
गणित ने वह दक्ष होता ह। वह ज्योतिष शास्त्र का भी ज्ञाता
होता हे।
द्वितीय चरणः यँ सूर्य जातक को मधुरभाषी, विदान ओर परिवार मेँ
प्रिय बनाता है।
तृतीय चरणः यर्हौँ सूर्यं व्यक्ति को विविध विषयों का ज्ञाता ओर
ज्योतिष-शास्त्र मेँ दक्ष. बनाता है! क्त्तीय विषयों की भी उसे अच्छी
जानकारी होती है।
चतुर्थ चरणः य्ह सूर्य हौ तौ व्यक्ति सज्जन, शास्त्रज्ञ, ज्योतिष-शास्त्र
मे निपुण होता है । उसका व्यक्तित्व आकर्षक होता है । चालीस वर्ष के बाद
उससे जीवन मँ सफलता मिलती है।
अर्द्रा स्थित सूर्य पर विभिन्न अर्हो की दृष्टि
यंद्रकीदृष्टिहो तो जातक आजीविका की तलाश में जन्मभूमि से दूर
जाता है] संबधी उसे पीडित करते है।
मेगल की दृष्टि उसे आलसी बना देती है । शत्रु भी उसे दुखी करते है|
बुघ की दृष्टि भी अच्छा फल नहीं देती। हँ, उसे संतान के कारण सुख
मिलता है, पर य्ह भी संतान की समृद्धि उसे संबंधियों कं ईर्ष्या -देष का
पात्र बनाती है।
गुरुकी दृष्टि स्सेतंन्रमतरमेंप्रवीण बनाती हे, पर उसका पारिवारिक
जीवन सुखी नहीं होता!
शुक्र की दृष्टि कं फलस्वरूप वह विदेश में वासकर धनोपार्जन करता है ।
शानि की दृष्टि उसे चतुर बनाती है लेकिन स्त्रियों के हा्थौँं उसे
अपमानित भी होना पडता हे ।
अर्द्रा के दिभिन्न चरर्णो मे चंद्र की स्थिति
अर्द्रा के तृतीय चरण को छोड शेष अन्य चरणों मे चंद्र सामान्य फल
देता है।
ज्योत्तिक-कौुदी : (खर-1) नसत्र-विचार ऋ 96
प्रथम चरणः यह चंदर व्यक्ति का हृदय तो पविच्र ओर शुद्ध रखता है
तथापि चिडचिडा बना देता है!
द्वितीय चरणः य्ह चंद्र मेकेनिकल विषयों मे रुचि पैदा करता है । एसे
व्यक्त्ति को अस्थमा ओर कफ संब॑धी रोगौ से विशेष सावधानी बरतनी
चाहिए 1
तृतीय चरणः यर्हो चंद्र हो तो व्यक्ति विद्वान, प्रभावशाली वक्ता ओर
प्रसन्नचित्त होता है ।
चतुर्थ चरणः य्ह चंद्र फिजूलखर्ची वाला बना देता है । ईश्वर के प्रति
जातक कं मन में आस्था होती है! वह सही माध्यमों से धन कमाता है तथापि
मत-वैभिन्य के कारण वह एारिवारिक जीवनं मे सदैव दुखी रहता है!
अर्द्रा मेँ स्थित चंद्र पर विभिन्न अर्हो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि व्यक्ति को परा-भौतिक विषयों का ज्ञाता बनाती है। षर
वह धनी नहीं होता!
मंगल की दृष्टि उसे विद्वान बनाती है।
बध की दृष्टि से उसे सत्ता पक्ष से लाम होता है।
गुरु की दृष्टि उसे विद्वान ओर उदार शिक्षक बनाती है।
शुक्र की दृष्टि उसे जीवन नै सारे सुख उपलब्ध कराती है]
शानि की दृष्टि अशुभ हौती है । एसा व्यक्ति अभावग्रस्त रहता है।
अर्द्रा के विभिन्न चरणो मेँ बुध की स्थिति
आर्द्रा कं विभिन्न चरणों मे स्थित बुध कष्ठ शुभ फल देता है।
प्रथम चरणः यहं बुध प्रत्येक क्षेत्र मँ सफल होने की क्षमता देता है ।
ज्योतिष-शास्त्र मे भी जातक की रुचि हौती है { वह एकाधिक स्त्रियो से
यौन-संब॑ध रखता है!
द्ितीय चरणः यँ बध ज्योतिष-प्रवीण बनाता है } वह धनी होने के
साथ-साथ मृदुभाषी भी होत्ता है
तृतीय चरणः यहौँ बुध होने से जातक अतिशय बुद्धिमान होता है।
चतुर्थं चरणः य्ह बुध जीवन के सभी सुख उपलब्ध कराता है ।
अर्द्रा स्थित बुध पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि सरकारी नौकरी मे पद दिलवाती है। उसे अषने ररिष्ठ
अधिकारियों या स्वामी की कृपा का लाभ मिलता है।
ज्योतिक-कौमृदी : (ध्व न्नत्र-विचार @ 97
चंद्र की दृष्टि के फलस्वरूप वह कुशलं प्रशासक बनता है)
मंगल कौ दृष्टि का फल सामान्य होता है!
मुरु की दृष्टि उसे बुद्धिमान ओर धनी बनाती है।
शुक्र की दृष्टि पारिवारिक जीवन के लिए ठीक नहीं है । पत्नी से सदैव
ही विवाद बना रहता है! रसायन शास्त्र मँ जातक की रुचि होती है।
शनि की दृष्टि काफल शुभ ष्ोता है! व्यक्ति उदार होता है ओर
सजीवन मँ उसे अनायास, अपेक्षित सहायत्ता मिलती रहती है ।
अर्द्रा के विभिन्न चरर्णो मेँ गुरु की स्थिति
आर्द्रा के विभिन्न चरणों मे गुरु की स्थिति शुभ फल देती है ! व्यविति
समाज क्रा नेता या मंत्री तक बन सकता है
प्रथम चरणः यर्हौँ गुरु कलात्मक अभिरुचियां पैदा करता है । व्यक्ति
कला संबंधी विषयों का ज्ञाता ओर शिक्षक होता है।
द्वितीय चरणः य्ह गुरु उच्च पद पर आसीनं करदाता है! वह
विभाग-प्रमुख या मंत्री तक बन् सकता है
तृतीय चरणः य्ह गुरु विशेष फल नही देता।
चतुर्थं चरणः य्ह गुरु लाख ने एक बनाता है।
अद्रा स्थित गुरु या विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि धनधान्य ओर अच्छी पत्नी, अच्छी संतान का सुख
देती है।
चेंद्र की दृष्टि उसे समाज मेँ प्रमुख पद दिलाती है;
मंगल की दृष्टि के फलस्वरूप उसे वायु सेना मे अक्सर मभिलत्ता है।
कह मटर गाडियों सं्बधी कार्यं में जुट सकता है।
बुधं की दृष्टि गणितज्ञ ओर ज्योतिष बनाती हे ।
शुक्र की दृष्टि के फलस्वरूप जातक धनी तो बनता है, पर अपने धन
कां उपयोग नहीं करे पाता।
शनि की दृष्टि का फल अच्छा होता है । जातक धनी-मानी होता हेै।
पत्नी अच्छी होती है । संतान भी अच्छी होती है! व्यक्ति लाखों मेँ एक माना
जाताहेः
आर्द्रा के विभिन्न चरणो में शुक्र की स्थिति
आर्द्रा के विभिन्न चरणो मे शुक्र प्रायः शुभ फल देता है।
प्रथम् चरणः यर्हौँ शुक्र वैज्ञानिक विषयों का ज्ञाता बनाता है । स्त्रियों
ज्योतिक-कीुदी : (खड-2) नसतर-विवार छ 98
की कुंडली गे आर्द्रा के प्रथम चरण मेँ शुक्र की स्थिति बेहद अशुभ फल देता
है| वह अपना स्त्रीत्व तंक बेच सकती है|
दवितीय चरणः यहो शुक्र व्यक्ति क विद्वान,. ओर दीर्घजीवी बनाता है ।
रसायन शास्त्र मे उसकी विशेष रुचि होती है ।
तृतीय चरणः यर्हो शुक्र विद्वान ओर धनी बनाता है | जातक आस्तिक
ओर धर्मशील होता है।
चतुर्थ चरणः यर्हो शुक्र की स्थिति बहुत अच्छी मानी ` यी है | व्यक्ति
अभिनय पटु होता है। संगीत मे भी उसकी सुचि होती है ]
आर्द्रा स्थित शुक्र पर विभिन्न गरो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि चिकित्सक बना सकती है ¡ दिभार्या योग के भी संकेत
मिलते हे।
चद्र की दृष्टि शरमीले स्वभाव का बनाती है। वह स्वयं की मावनाए्
भली-भांति व्यक्त नहीं कर पाता
ममल की दृष्टि हर तरह से शुभ होती है
बुध की दृष्टि मी शुम फल देती है।
गुरू की दृष्टि विद्वान बनाती है ¡ सभी प्रकार का सुख देती है ।
शनि की दृष्टि कामी तथा यौन- रोगों का शिकार बनाती है!
अर्द्रा के विभिन्न चरणो में शनि की स्थिति
आर्द्रा स्थित शनि न केवल अशुम फल देता है वरन तरह-तरह सै
पीडित भी करता है|
प्रथम चरणः यहो शनि ऋण-ग्रस्त, दुखी ओर लज्जाहीन बना देता है ।
व्यक्ति तरह-तरह क बुरे कर्यो मै लिष्ठ रहता है ¦
दित्रीय चरणः य्ह शनि ईर्प्यालु बनाता है ¦ रेस व्यक्ति की पराया धन
हडपने मे ज्यादा रुचि होती है ।
तृत्तीय चरणः यहो शनि कुसंयति का शिकार बनाता है । दुर्दिन कभी
उसका साथ नहीं छोड़ते! वह अपराधी भी बन सकठा है । पत्नी के साथ
भी उसके मधुर संबंध नही रहते।
चतुर्थं चैरणः यहो शनि व्यक्ति को पत्नी पर निर्भर बनाता है! वह
मद्यप्रिय भी होता हे। मुकदमेवाजी मेँ उसे कारावास तक हो सकता है।
अ । स्थित शनि पर विभिन्न मर्ह की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि जातक को पितृ-विरोधी बनातीं है । उसे पिता से कोई
लाम नहीं मिलता ।
ग्वोतिक-कौमृदी ` (द-प) नकतकिवार च ५9
चंद्र की दृष्टि कं कारण उसे विधवा बहन का बोञ्ञ उठाना पड़
सकता है|
मंगल क्री दृष्टि भार्ई- बहनो कं लिए शुम नहीं होती ।
बुध की दृष्टि का शुभ फल गिलता है! व्यक्ति विद्वान होता है! पर
पारिवारिक जीवन के लिए यह स्थिति अशुम है।
गुरु की दृष्टि शासन से लाम दिलाती है।
शुक्र की दृष्टि उसे स्वर्णकार वना सकती है । द्विभार्या योग के भी
संकेत है|
अर्द्रा के विभिन्न चरणो मेँ राहु की स्थिति '
प्रथम चरणः यहाँ राहु अत्यधिक स्वाभिमानी तथा कामुक
बनात्ता है! वह जुए का शौकीन होत्रा है अत्तः जो कुछ कमाता है, जुएमें
गवां देता है)
द्वितीय चरणः यर्हौ राहु अनैतिक कार्यो मे प्रवृत्त करातता है । वह वाचाल
भी होता है। बचपन मे दुर्घटना मै आदत होने की भी आशंका बनी
रहती है।
तृतीय चरणः यहो राहु शुभ फल देता है ¦ व्यक्ति समाज का प्रमुख भी
बन सकता है । पर बह पर-स्त्रीाभी भी होता है।
चतुर्थ चरणः य्ह राहु द्विभार्या योग होने की आशंका बढाता है लेकिन
व्यक्ति मान सम्मान, धन-दौलत भी पाता है।
आद्रा के विभिन्न चरर्णो मे केतु की स्थिति
आद्रा स्थित केतु ञ्जगडालु स्वभाव वाला बना देता है।
प्रथम चरणः यहो केतु जातक को कृतघ्न, क्रूर ओर घूर्त प्रवृत्ति का
बनाता है। उसकी पत्नी सदैव बीमार रहती है ।
द्वितीय चरणः यहो केतु ञ्ञगडाल प्रवृत्ति का बना देता है । परिवार वाले
उसेत्याग देतेदहै।
तृतीय चरणः यँ केतु कृषि कार्यो मेँ लगाता है । षर भूमि गंवा वैठने
काभीयोगदहै]
चतुर्थ चरणः यँ केतु शुम फल नहीं देता! व्यक्ति पैतृक संपत्ति भी
गंवा वैठता है। वह विषय-क्षधा का भी शिकार हो सकता है}
ज्योतिष-कीी : (दवछ-१) मकषक-किचार अ 100
पुनर्वसु
पुनर्वसु नक्षत्र राशि पथ में 80.00 अंशो से 93.20 अंशो के मध्य स्थित
माना गया है। अन्य पर्यायवाची नाम है-आदित्य, सुरजननी । अरबी में इसे
अध-धीरा कहते हे, अर्थात् सिंह का पंजा"। इसमे चार तारे हैँ ! पुनर्वसु का
देवता अदिति एवं स्वामी ग्रह गुरु को माना गया है । यणः देव, योनिः मार्जार
तथा नादी: आदि कही गयी हे ¡ चरणाक्षर हैके, को, ह, ही ।
इस नक्षत्र के तीन चरण मिथुन (स्वामी : चंद्र) राशि में आते है।
पुनर्वसु नक्षत्र मेँ जन्मे जातक सुंदर, ईश्वर पर अगाध आस्था रखने
वाले तथा परंपरा-प्रिय रोते है । अवैघ या अनैतिक कार्यो कां वे जमकेर
प्रतिरोध करते हँ । सादगी मरा जीवन बिताने के आक्षी एसे जातक
परोपकारी, दूसरोँ की सहायता करने वाले तथापि कुछ गर्भ-मिजाज होते
है । अपनी बहुमुखी प्रतिमा कं कारण वे जीवेन के किसी भी क्षेत्र मे सफले
हो सकते है! अध्यापन काषक्षेत्र हौ, अथवा अभिनय का, लेखन काहोया
चिकित्सा का, वे सर्वत्र यशस्वी होते है ।
एसे जातक मातृ-पितृ भक्तु, गुरुजन का आदर करने वाले भी होते हँ ।
उनका वैवाहिक जीवन प्रायः सफल नहीं रहता । संब्ध-विच्छेद एवं पुनर्विवाह
केमीफल कहे गयेदहै।
पुनर्वसु नक्षत्र मेँ जन्मी जातिकाएं शातिप्रिय तथापि तार्किक प्रकृति की
होती हैँ, फलतः दूसरों से प्रायः उनकी बनती नहीं ! तथापि एसी जातिकारएं
परोपकारी, सबका सम्मान करने वाली तथा सुखी होती है ¡ उन्हं पति का
पूर्णं सुख मिलता है । दव्वे भी अच्छे होतेह!
` सामान्यत्तः एसी जातिकाओं का स्वास्थ्य प्रायः ठीकं ही रहता है।
पुनर्वसु के विभिन्न चरणों के स्वामी है-प्रथम् चरणः मंगल, दवितीय
चरणः शुक्र. तृतीय चरणः बुध, चतुर्थ चरणः चंद्र !
पुनर्वसु के विभिन्न चरणों मे सूर्य की स्थिति
पुनर्वसु के चतुर्थ चरण को छोडकर अन्य सभी चरणों मे सूर्य के शुम
फ़ल प्राप्त होते हे!
ग्योतिष-कपदी (शड-१) =तज-दिदार @ 101
प्रथम चरणः य्ह सूर्य कौ स्थिति जातक कौ सुशिक्षित, धनी ओर
ज्योतिषी दनाती है।
द्वितीय चरणः य्ह भी सूर्यं शुम फल देता है । जातके गणितज्ञ ओर
कुश्चल प्रशासक भी होत्रा हे] शिक्षा एवं राजनीति के क्षन्न में भी वह सकल
होता है। उसमे अत्न की शक्ति भी होती है।
तृतीय चरणः यर्हो भी सूर्य की स्थिति शुम फलदायक है] यदि सूर्य के
साथ गुरु की भी युति हो तो जातक उच्च कोटि का राजनीतिज्ञ होने के
साथ-साथ मंत्री पद भी सुशोभित कर सकता है ।
चतुर्थं चरणः यह सूर्य की स्थिति शुम फल नहीं देत्री। जीवन
अभावग्रस्त बीतता हे । यदि लम्नमेंभी यही चरण हो तो व्यक्ति असाध्य
रोग से पीडित होता हे!
पुनर्वसु स्थित्त सूर्य पर विभिन्न ब्रह की दृष्टि
चंद्र की दृष्टि के फलस्वरूप व्यक्ति संद॑धियों से दुखी होता है। उसे
जन्मभूमि से दूर, अभावग्रस्त जीवन बिताना पडता है |
मंगल की दृष्टि व्यकविति को आलसी ओर शच्रुओं से पीडितं भी
रखती है । $
बुध की दृष्टि भी सुखदायक नहीं है ¡ हँ, जातक को संतान ओर सत्ता
पक्ष से लाभम होता है।
गुरु की वृष्टि के फलस्वरूप जातक की गुह्य विद्याओं मेँ सक्रिय रुचि
होती है! पत्नी ओर संतान से उसकं संबंध तनावपूर्णं रहते हैँ |
शुक्र की दृष्टि उसे विदेशो का प्रवासी बनाती है] वर्ह वह पर्यप्ति
धनौपार्जन करता है।
शनि की दृष्टि के फलस्वरूप वह फिजूलखर्ची लेकिन कर््तव्यनिष्ठ
होता है! काम-वासना संतुष्टि के लिए वह निम्न श्रेणी की स्त्रियो से संपर्कं
रख सकता है।
पुनर्वसु के विभिन्न चरर्णो जे चंद्र की स्थिति
पुनर्वसु के विभिन्न चरणों मे स्थित चंदर व्यक्ति को कामातुर एवं काम-
कला मेँ प्रवीण बनाता है।
प्रथमं चरणः यहो चंद्र व्यक्ति को मिश्रित स्वमाव वाला बनाता है। वह
कार्य कुशल भी होता है ओर अपने इस गुण के कारण समादृत होता है।
द्वितीय चरणः यद चंद्र हो तो व्यक्ति स्त्रियो मे विशेष रुचि रखता है}
वह कामकला प्रवीण भी होता है ओर विवाह भी तीन-चार करता है अपने
गुणों कं कारण यद्यपि वह वैज्ञानिक, राजदूत आदि भी बन सकता है, पर
म्योतिव-कोपुदी : (श~ ककज-विरचर ऋ 102
उसे जु खेलने का भी शौक होता है।
वतीय चरणः यर्हौ भी चंद्र स्त्रियो का शौकीन बनाता है} क्ह चतुर,
संगीत-प्रिय होने कं साथ-साथ जुआरी प्रवृत्ति का भी होता हे।
चतुर्थ चरणः यर्हो भी चंद्र काम-कला प्रवीण बनाता है] गुरु के साथ
युति उसे धनी ओर कुटुंब का प्रमुख बनाती हे, जबकि मंगल की दृष्टि के
फलस्वरूप वह बेहद स्वार्थी बन जाता है, इतना कि जरूरत पड़ने पर पत्नी
कोभीबेव सकताहै।
पुनर्वसु स्थित चंद्र पर विभिन्न अर्हो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि शुम फल देती है, व्यक्ति विदधान, सुशील लेकिन अमावां
सेभीधिराहोताहै।
मंगल की दृष्टि उसे उदार, बुद्धिमान, धनी व विविध विष्यो का ज्ञाता
बनाती है)
बुध की दृष्टि के फलस्वरूप उसे शासन से लाभ मिलता है।
गुरु की दृष्टि उसे विद्वान, प्रसिद्ध ओर परोपकारी बनाती है।
शक्र की दृष्टि के कारण उसे जीवन कं सभी सुख मिलते ह!
शनि की दृष्टि उसे अमावग्रस्त रखती है तथा पत्नी-सुख ओर धन से
हीन रखती है!
पुनर्वसु के विभिन्न चरर्णो मे बुध की स्थिति
पुनर्वसु के विभिन चरणो मे बुध शुम फल देता है।
प्रथम चरणः यँ बुध व्यक्ति को गणितज्ञ ओर बहीखाता लिखने मेँ
निपुण बनाता है | वह अपने क्षेत्र मेँ उच्च पद तक पर्हुचता है । वह धनी ओर
प्रसिद्ध भी होता है। कला ही नही, विज्ञान की अनेकं विद्याओं का भी उसे
अच्छा ज्ञान होता है। ग
द्वितीय चरणः वर्हो भी बुध सफल एकाउंटेट बनाता है । वह विना
किसी पू्भ्रह के सबके प्रति अपनी जिम्मेदारी निमाता है ¡ वह बिना किसी
भेदभाव कं सबसे समान व्यवहार करता हे | वहं सर्वत्र आदर भी पाता है।
तृतीय चरणः यहो बुध परोपकारी व निःस्वार्थं जनसेवी बनाता है।
चतुर्थं चरणः यहौँ बुध धन-दौलत से संपन्न, शासको का प्रिय ओर
प्रसिद्ध बनाता है।
पुनर्वसु स्थित बुध पर विभिन्न यर्हो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि उच्चपद दिलाती है । वह सत्य-वक्ता ओर सरकार से
लाभान्वित भी होता है।
ज्योतिष-कोमृदी : (वड-{ नशरते-किवार 9 109
चद्रमा की दृष्टि उसे वाचाल पर उग्र-स्वमाव वाला बनाती है।
मंगल की दृष्टि कं फलस्वरूप वह कला-निपुण ओर ईमानदार होता
हे! उसका व्थवितत्व भी लोगों को आकर्षित करता है|
गुरु की दृष्टि उसे विदधान ओर धनी बनाती है। उसे शासन शे लाम
भी मिलता है]
शुक्र की दृष्टि के फलस्वरूप वह शच्रु-हंता होता है ¦ विवाद सुलल्माने
मे वह कुशल होता है।
शनि की दृष्टि उसे सुशील स्वभाव का. सबका आदर करने वाला
बनाती है)
पुनर्वसु के विभिन्न चरणो मेँ गुरु की स्थिति
युनर्वसु के विभिन्न चरणौ नै गुरु सामान्यः शुम फल ही देता है । लेकिन
पारिवारिक जीवन मँ पत्नी के कारण तनाव बना रहता है!
प्रथम चरणः यहो गुरु समस्त भौतिक सुख प्रदान करता है । यही नहीं,
व्यक्ति मान-सम्मान ओर आदर भी पाता है ¡ लेकिन पारिवारिक जीवन की
दृष्टि से यह स्थिति अच्छी नहीं होती । पत्नी संदेह करती रहती है ओर
फलस्वरूप तनाद बना रहता है।
द्वितीय चरणः यहौँ गुरु प्रसिद्ध, परोपकारी बनाता है ओर व्यक्ति
शासन अथवा राजनीति के क्षेत्र मे उच्चपद प्राप्त करता हे। यहो भी पत्नी
की संकीर्ण मनोवृत्ति उसे व्यथित रखती है।
तृतीय चरणः य्ह भी गुरु शुभ फल देता है | व्यकिति शासन, सार्वजनिक
क्षेत्र मेँ सफलता अर्जित करता है ] यदि इस चरण मेँ गुरु के साथ सूर्य की
युति हो तो व्यक्ति उच्य राजनेता या मंत्री बनता है।
चतुर्थ चरणः य्ह गुरु अत्यंत प्रसिद्ध बनाता है लेकिन जातक को न
तो सुख नसीव होता है ओर न धन-दौलत । मित्र ओर संव॑धी उसे दुखी
करते हैँ! पराये लोख उसे देव तुल्य मान कर सम्मान करते हैँ!
विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
पुनर्वसु स्थित गुरु पर विभिन्न ग्रहौ की दृष्टि के फल इस प्रकार हे ।
सूर्यः शुभ फल, अच्छी पत्नी, योग्य संतति तथा संबंधियों को आदर,
मान-सम्मान ।
चंद्रः अच्छे व्यवहार के कारण लोकप्रिय, यशस्वी, ग्रामौ एवं नगरों मे
प्रशासन-भार की भी संभाकना।
मंगलः प्रतिरक्षा सेनाओंँ मे जाने की संभावना । अनेक अवरोधों के बाद
जीवन मेँ सफलता।
प्योतिष-कौगुदी " (छर-1) नस्ने-विवार 9 104
बुधः पारिवारिक जीवन रुखमय। ज्योतिष शास्त्र भँ भी रुवि।
शुक्रः अशुभ फल । स्त्रियो से पीडा-कष्ट | यदि शुक्र के साथ बुधकी
भीदृष्टिहोतो शुम फल। संपत्ति की प्राप्ति।
शनिः शासन पक्ष से बेहद लाम । राजनीति के क्षेत्र मै सफलता,
पुनर्वसु के विभिन्न चरर्णो में शुक्र की स्यिति
दवितीय चरण को छोडकर पुनर्वसु कं शेष चरणों मे शुक्र अच्छे फल
देता है।
प्रथम् चरणः यहाँ शुक्र जातक को अपने समाज मे लोकप्रिय बनाता है ।
उसे हर तरह की विलास-सामग्री उपलब्ध रहती है ।
द्वितीय चरणः यौ शुक्र आलसी बनाता है । उसकी जीवन के कार्य
कलापौ मे कोई रुचि नहीं होती । -वक्त आने पर देखा जाएगा उसका
स्वमाव होता है।
तृतीय चरणः यहो शुक्र शुम फल देता है ! व्यक्ति विद्वान ओर धनी
होता है। शासकीय सेवा भे नौकरी करता है, पर उसे बार-बार काम
बदलना पडता है! वह इंजीनियरिंग के क्षेत्र मेँ सफल हो सकता है!
चतुर्थं चरणः यर्हो शुक्र वैवाहिकं जीवन सुखी ओर संपन्न रखता है ।
उसकी संतान अच्छी होती है।
पुनर्वसु स्थित शुक्र पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि अशुभ फल देती है । व्यक्ति कुसंगति मे पड़ जाता हे।
चंद्र की दृष्टि उसे उसे आकर््क व्यक्तित्व प्रदान करती हे । वह सत्ता-
पक्ष का कृपा-पात्र ओर अधिकार संपन होता है
मंगल की दृष्टि से जातक प्राचीन शास्त्र मँ निपुण “बुद्धिमान होता है ।
बुघ की दृष्टि से वह रणनीति-निपुण, बुद्धिमान ओर धनी होता दै ।
गुरु की दृष्टि उसे धनी ओर सद्गुण संपन्न बनाती है । समाज उसका
आदर करता है।
शुक्र की दृष्टि उसे स्वर्णकार आमूषणों कं व्यापार में प्रवृत्त करती है।
शनि की दृष्टि कं कारण जीवन दुखी हो जाता है । तरह-तरह के
अपमान ज्ञेलने पडते है ।
पुनर्वसु के विभिन्न चरर्णो र्मे शनि की स्थिति
पुनर्वसु कं दवितीय एवं तृतीय चरण मँ शनि शुम फल देता है, जबकि
प्रथम एवं चतुर्थ चरण मे शुभ फल नहीं मिलते!
ज्योतिष-कौुदी ˆ (खर) नक्त-विकार ४ 105
प्रथम चरणः यर्हौँ शनि अच्छा नहीं माना मया है। व्यदित सटोरिया
होता है ओर उसमे सबकुछ उंडा देता है । वह कर्जदार भी हो जाता है।
कमी-केभी आपराधिक मामर्लौँ मे भी यह फंस जाता है।
द्वितीय चरणः यर्हो शनि अच्छे फल देता है | व्यक्ति साहूकारी का घंधा
करता हे! लौह--इस्पात्त से संबंधित उद्योगौ से उसे लाम होता है।
तृतीय चरणः यर्हौँ शनि परिश्रमी ओर सक्रिय बनाता है । वह केमिकल
या मैकेनिकल इंजीनियर बन सकता है ! उसे उच्च पद भी मिलता है।
चतुर्थं चरणः यँ शनि व्यक्ति को गुस्सैल बनाता है ¡ उसकी यह प्रवृत्ति
नाना प्रकार की समस्याओं को जन्म देती है । उसका बचपन दुखी बीतता है ।
पुनर्वसु के विभिन्न चरणो मे राहु की स्थिति
पुनर्वसु में सहु की रथत्ति सामान्यतः शुम फल देती है।
प्रथम चरणः य्ह राहु सही निर्णय करने की क्षमता देता हे । लेखन,
प्रकाशन ओर शिक्षण से उसे लाभ मिलता.है।
द्वितीय चरणः यँ राहु व्यक्ति को विज्ञान के क्षेत्र मे उसके किसी शोध
के कारण प्रसिद्ध बनात्ता है। उसका व्यक्तित्व आकर्षक ओर दृष्टिकोण
उदार होत्ता है)
तृतीय चरणः यर्हौँ राहु व्यक्ति को बुद्धिमान ओर अच्छी स्मरण-शक्ति
वाला बनाता है! लोम् से दूर वह संतोषी प्रवृत्ति कः होता है। सरकारी
नौकरी मे वह एकाउंट विभाग में प्रमुख भी बन सकता है।
चतुर्थं चरणः गरहौ राहु साहित्थकार-पत्रकार अथक प्रकारक बना देता
है । राहु-बुध की युति ज्योतिष-प्रवीण बनाती है । वह गणितज्ञ होता है।
साथ ही स्त्रियों का शौकीन भी।
पुनर्वसु के विभिन्न चरर्णो मँ केतु की स्थिति
प्रथम् चरणः यहो केतु भाई-बहन के लिए घातक होता है ।
द्वितीय चरणः यर्हो केतु से ज्ञात होता है कि व्यक्ति का जन्म समृद्ध
परिवार मेँ हुआ है। उसका पिता समाज का सम्माननीय सदस्य है। पर
जातक देसे देव तुल्य पिता के लिए दुःखही दुःख पैदा करता है।
तृतीय चरणः यहँ केतु हो तो तीन पलियों की संमावना बनती है।
एसा व्यक्ति सदैव कर्ज मे दूषा रहता है।
चतुर्थं चरणः य्ह केतु घोर परिश्रम के बावजूद दरिद्र रखता है ।
तथापि संतान से उसे सुख मिलत्ता है।
ग्योतिष-कोमृदी ˆ (खड-८) नकषतर-विचार अ 106
पुष्य
राशि पथं में पुष्य नक्षत्र की स्थिति 93.2 अंशोँ से 106.40 अशँ से मध्य
मानी गयी है! पुष्य के अन्य पर्यायवाची नाम है-तिस्य, अमरेज्या |
अरबी मे उसे अन--त्राह कहते हँ । इस नक्षत्र मँ तीन तारे ह ।
पुष्य का देवता गुरु एवं स्वामी ग्रह शनि कहा गया है]
गणः देव, योनिः मेष एवं नाडीः मध्य है ।
चरणाक्षर हैँ-ह्. हे, हो. डा।
पुष्य के चारों चरण कर्कं राशि (स्वामी : चंद्र) में आते है।
पुष्य नक्षत्र मेँ जने जातक प्रायः अस्थिर मति के होते हैँ! हर बात्तमें
संदेह उनकी प्रकृति होती है । प्रशंस उन्हं एुला देती है, जबकि आलोचना
असह्य । वै तत्काल. अवसाद भँ धिर जाते हैँ । फलतः मीठा बोल कर उने
अच्छा कार्य करकाया जा सकता है ¡ उनम जन्मजात प्रतिभा एवं बुद्धिमता
भी होती है तथा वे अवैध, अनैतिक एवं कानून-विरोधी कार्यो क जमकर
विरोध करते हैँ ।
उन्हं कोई भी कार्य सौप कर निश्चित हुआ जा सकता है, क्योकि वे
सौपे गये कार्य को निहायत. ईमानदारी एवं संपूर्ण कुशलता से करने का
प्रयत्न करते हैँ}
युष्य नक्षत्र मे जन्म जातक धियेटर, कला एवं वाणिज्य व्यवसाय के
क्षेत्र मै सफल हो सकते है।
एसे जातकों का पारिवारिक जीवन प्रायः समस्याग्रस्त रहता है तथां
परिस्थितियों वश उन्दँ अपनी पत्नी एवं बच्यौ से दूर जीवन बिताना पड़
ज्योतिक-कौनुकी : (छठ, नक्तत-विचार अ 107
सकता है तथापि इससे परिवार के प्रति उनकी आसक्ति मै करई कमी
नहीं आती।
पुष्य नक्षत्र मै जन्मी जातिकाएं शांति प्रिय, सौजन्य से भरी तथा समर्पण
की भावना से युक्त होती है-फलतः अक्सर वे सबके दबाव ओर दुर्व्यवहार
का भी शिकार बनी रहती है। एसी जातिकारएं ईश्वर-भक्त तथा सबकी
सहायत्ता करने वाली होती हैः।
एसी जातिकाएं अपने मन की बात मुश्किल से व्यक्त करती है,
ज्यादातर वे अपने मन को अभिव्यक्त ही नहीं करतीं । वैवाहिक जीवन मेँ भी
वे पति तक से अपने मन की बात नहीं कहती, फलतः हमेशा गलत समी
जाती हँ । सिवाय आत्म-पीडा के उन्हे कुछ नर्हीं मिलता! एेसी जातिकारएं
श्वास संबंधी रोग का शिकार हो सकती हैँ ।
पुष्य के विभिन्न चरणों के स्वामी-प्रथम चरणः सूर्य, द्वितीय चरणः बुध,
तृतीय चरणः शुक्र तथा चतुर्थ चरणः मंगल ।
युष्य के विभिन्न चरर्णो मँ सूर्य
पुष्य के विभिन्न चरणों मै सूर्यं के मिश्रित फल प्राप्त होते रै
प्रथम चरणः य्ह सूर्य पिता कं लिए लाभकारी सिद्ध होता है { जातक
का व्यक्तित्व सुंदर ओौर आकर्षक होता है ! यहां रिथित सूर्य पित्त ओर कफ
संबंधी व्याधियां बढाता है]
ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार यदि लग्न मघा नक्षत्र मे हो एवं सूर्यं पुष्य
नक्षत्र मे हो तौ जातक का जन्म यद्यपि सामान्य ओर अभावग्रस्त परिवार
भँ होता है, तथापि जातक के जन्म के बाद उसके पिता की स्थिति
मे उत्तरोत्तर सुधार होता जाता है ओर फलतः जातक का जीवन सुखी
बीतता है।
एसे जातकं मे नशे के प्रति सहज आकर्षण होता है ।
द्वितीय चरणः यर्हौ सूर्य चित्त की अश्थिरता बढाता है । फलतः वह कोई
काम एकाग्रचित्त से नहीं कर पाता! तथापि रेसा व्यक्ति कर्तव्यनिष्ठ ओर
ईभानदार होता है} इंजीनियरिंग के क्षेत्र मै उसे सफलता मिलती है,
विशेषकर अंतरिक्च संबधी इंजीनियरिंग के क्षेत्र मेँ।
तृतीय चरणः यह सूर्य शुभ फल देता है ! जातक राजसी वृत्ति का
होता है । अपने व्यवहार ओर कार्यो से उसे सफलता ओर प्रसिद्धि भी प्राप्त
होती है। सामान्यतः एेसे जातक लंबे कद के होते हैँ तथापि उनकी नेत्र
दृष्टि विकार युक्त होती है।
ज्योतिष -कौयृदी - (व्छ-१,) गेसभ-विद्यारं @ 108
चतुर्थं चरणः यहो सूर्यं सामान्य फल देता है तथापि जातक पत्नी कर
मामले मँ सौभाग्य शाली नहीं होता] पत्नी उसकी प्रगति कं मार्ग मे बाघा
बन जाया करती है।
पुष्य स्थित सूर्य पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
चंद्र की दृष्टि ओद्योगिक क्षेत्र मेँ सफलता प्रदान करती हे । व्यक्ति या
तो स्वयं सफल- प्रसिद्ध उद्योगपति होता है, अथवा फिर वह शासकीय कत्र
के अथवा निजी क्षेत्र के किसी उद्योग मेँ उच्च पद पर होता है।
मंगल की दृष्टि जातक को धनी-मानी बनाती है| तथापि वह रेस
ग्रस्तं भी होता है। संबधी भी उसके मार्ग मे बाधक बनते है!
बुध की दृष्टि उच्च शिक्षा प्राप्त करने भै सहायक होती है । व्यवित
शासकीय सेवा मे होता है।
गुरु की दृष्टि उसे राजनीति अथवा प्रतिरक्षा विभाग की ओर प्रेरित
करती है।
शुक्र की दृष्टि व्यविति को परोपकारी बनाती दहै! धातु उद्योग म उसे
विशेष सफलता दिलाती है।
शनि की दृष्टि रोग-ग्रस्त बनाती है ¡ जीवनसाथी की आयु पर अशुम
प्रभाव डालती है! जातक बेहद चतुर होता है, पर घोर स्वार्थी भी।
पष्य के विभिन्न नक्षत्रों मेँ चंद्र की स्थिति
पुष्य के प्रथम तीन चरणों मेँ स्थित चंदर प्रायः शुम फल देता है। चतुर्थ
चरण मेँ स्थित वंद्रकाफल ठीक नहीं है।
प्रथम चरणः वरहो जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है। कितु
स्वास्थ्य मे कफ-वायु का विकार उसे परेशान रखता है । एसः व्यक्ति स्त्रियों
के प्रति कोमल भावनाएं रखता है व जल्दी ही उनके प्रभाव मेँ आ जाता है।
द्वितीय. चरणः यह जन्मा व्यक्ति धनी होता है! जमीन-जायदाद `
मकान के सुखे से युक्त । उसके अनेक अच्छे ओर सच्चे मित्र होते है! ठेसा
व्यवित्त "यत्रे नार्यस्तु पूजयते रमंते तत्र देवता" की उक्ति के अनुसार आचरण
करता है अर्थात् स्त्रियो के प्रति सदैव आदर माव रखता है।
तृत्रीय चरणः यँ चंदर जात्तक को विदेश प्रवास का शौकीन वनाता है। `
वह अपने परिश्रम के कारण वह मान-सम्मान ओर धन भी अर्जित करता
है प्रकृति से उसे अच्छा प्यार होता है।
चतुर्थं वरणः यहो चंद्र जातक को कुमा्गी बनाता है । वह स्वार्थ लोलुप,
भ्योतिष-कौमुदी : (खड-२) नेसत्र-विवार @ 109
दूसरी की संपत्ति हडपने काला बन जाता है । उसकी ये प्रवृत्तियां उसे स्व-
जन सेभी दूर कर देती है)
पुष्य स्थित चंद्र पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्यकी दृष्टि व्यक्ति को साहसी बनाती है । वहं सरकारी सेवा भे होता
दै. अधिकार, सुरक्षा अथवा विधि--विभाग में।
मंगल की दृष्टि उसे अपने काम मँ होशियार बनाती है! मां कं लिए यह
दृष्टि अशुभ मानी गयी है]
बुध की दृष्टि उसे मान-सम्मान, प्रसिद्धि प्रदान करती है, विशेषकर
सजनीति के क्षत्र में| उसे परिवार का पूर्णं सुख प्राप्त होता है।
गुरु की दृष्टि उसे शिक्षा के क्षेत्र में ऊचाईयों तक ले जाती है । वह
विद्वान भी ह्येता है।
शुक्र की दृष्टि उसे परोपकारी, धनी-मानी बनाती है पर व्यक्ति मेँ
काम-मावना भी प्रबल होती है
शनि की दृष्टि का फल अच्छा नहीं होता ¡ जातक अमावग्रस्त ओर
रोगी रहता है, विशेषकर तपेदिक से।
पुष्य के विभिन्न चरर्णो मे बुध की स्थिति
पुष्य कं विभिन्न चरणों में स्थित् बुध प्रायः शुम फल देता है।
प्रथम चरणः य्हौँ बुध जातक को संपन्न बनाता है । जमीन-जायदाद
आदि का वह स्वामी होतः है} यह भी कहा गया है कि यदि लग्न मे स्वाति
अध्वा मघा नक्षत्र हो तो जातक बहुत धनी होता है।
दवितीय चरणः यर्हौ बुघ जातक को विश्वास पात्र बनाता है फलतः उसे
एेसा पद मिलता है, जहौ अत्यधिक विश्वास पात्र व्यक्ति की नियुक्ति की
आवश्यकता होती है । यदि इस चरण में बुघ कं साथ शनि भी हो तौ जातक
की इंजीनियरिंग में रुचि होती है।
तृतीय चरणः य्ह बुघ व्यक्ति कौ ललित-कला प्रिय बनाता है,
विशेषकर संगीत, नृत्य मँ उसकी विशेष अभिरुचि होती है। एेसा व्यक्ति
व्यवहार चतुर भी होता है । अपनी सूञ्ल-बूम से वह महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का
सामीप्य पाता है¡ विदेश-प्रकास के अवसर भी उसे मिलते हैँ!
चतुर्थ चरणः यर्हौ बुघ जातक को बुद्धिमान बनाता है । ललित कलाओं
मँ उसकी रुचि होती है । अपनी बुद्धिमता के कारण वह राज- नेताओं का
विश्वास अर्जित कर सकता है! ।
ग्योतिष-कौगुदी : (रड-4) नसत्-विकार अ 110
युध्य स्थित बुध पर विभिन्न अर्हो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि जातक को दंत चिकित्सक बना सकती है
चंद्र की दृष्टि शुम फल नहीं देती! आय से व्यय अधिक होता दै,
फलतः अमाव की स्थित्ति बनी रहती है।
मंगल की दृष्टि शिक्षा के मर्ण मे बाधक बनती है।
गुरु की दृष्टि उसे विदान ओर विज्ञान एवं अन्य विषयों में पारगते
बनाती है वह सत्तासीन लोगों का विश्वास पात्र मी बनाती है।
शुक्र की दृष्टि शिक्षा कं क्षेत्र मै उन्नति दिलाती है ! मौतिकी मेँ उसकी
विशेष रुचि होती है । उसका व्यक्तित्व भी आकर्षक होता है ।
शनि की दृष्टि उसे गुण-हीन ओर विवाद-प्रिय बनाती है।
पुष्य के विभिन्न चरणो में गुरु की स्थिति
पुष्य के विभिन चरणों मेँ स्थित गुरु शुभ फल प्रदान करता है।
प्रथम चरणः यर्हो गुरु जातक को विद्वान, शास्त्र पारंगत ओर धनी
बनाता है। जीवन मै उसे सभी तरह के सुख प्राप्त होते है ।
दवितीय चरणः यौ भी गुरु जातक को सौमाग्यशाली बनाता है ! उसे
जीवन मेँ परिवार का, संपत्ति का, मित्रों का सभी का सुख मिलता हे । अपनी
बुद्धिमत्ता से वह ऊचा पद भी प्राप्त करता हे।
तृतीय चरणः य्ह गुरु व्यविति को विश्वास पात्र बनाता है। वह
बुद्धिमान भी होता है तथा ऊचे पद पर भी कार्य करता है । एसा व्यक्ति
इंजीनियरिंग के क्षेत्र मेँ भी सफल होता है।
चतुर्थं चरणः यर्हा गुरु इंजीनियरिंग की शिक्षा उपलब्ध करता है।
जातक का इंजीनियरिंग कौशल उसे मान-सम्मान दिलाता हे।
पुष्य स्थित गुरु पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
गुरु पर सूर्यं की दृष्टि जातक को उद्भट विद्वान बनाती है। वह
विभाग प्रमुख भी होता है।
चेंद्र की दृष्टि भी उसे अतिशय धनी बनाती है। उसे अच्छी पत्नी
मिलती है। बच्चों का भी पूरा सुख मिलता है।
मंगल की दृष्टि भी जातक को धनी बनाती है । इस दृष्टि के फलस्वरूप
जातक का विवाह अपेक्षाकृत जल्दी होता है।
बुध की दृष्टि राजनीति के क्षेत्र मे सफल बनाती है] जातक परिवार कं
प्रति सारे दायित्व बखूबी निमाता हे ।
ग्योतिष-कौगुदी : (शर-1/ नत्त्र-विचार अ 111
शुक्र की दृष्टि उसे अनायास धन दिलाती है । साथ ही वह कामी भी
बहुत होता है)
शनि की दृष्टि जातक को समाज में प्रतिष्ठा दिलात्ती है। वह अपने
समाज का नेतृत्व भी करता हे।
पुष्य के विभिन्न चरणों मेँ शुक्र की स्थिति
पुष्य के तृतीय चरण को छोडकर शेष सभी चरणों मे रिथित शुक्र शुम
फल प्रदान करता है ।
प्रथम चरणः य्ह शुक्र जातक को व्यापारिक बुद्धि देता है ओर वह
अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक से संबद्ध हो सकता है|
द्वितीय चरणः यर्हौ शुक्र जातक को बुद्धिमान ओर उसके व्यक्तित्व को
आकर्षक बनाता है । स्त्रियां उस्तक प्रति चुंबकीय आकर्षण अनुमव करती हे ।
फलतः जातक कामी बन जाता हेै।
तृत्तीय चरणः यर्हौँ शुक्र के कारण व्यव्ति दबा--दबवा सा रहता है।
खुलकर अपनी बात नहीं कह पाता । प्रेम मे भी उसे निराशा मिलती है।
चतुर्थ चरणः यहो शुक्र के कारण जातक दार्शनिक स्वभाव का बन
जाता हे। विज्ञान में भी उसकी रुचि होती है } एेसे व्यक्ति का पारिवारिक
जीवन सुखी नही होता! एक तो विवाह भँ विलंब होता है, दूसरे उसकी
पत्नी को भी कोई न कोई रोग घेरे रहता है।
पुष्य स्थित शुक्र पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि शुम होती है! जातक उद्योगपति हो सकता है । उसे
पत्नी भी अच्छी मिलती है ! सुंदर ओर संपन्न । उसकी संपत्ति का भी जातक
को लाम मिलता हे।
चंद्र की दृष्टि के कारण जातक का व्यदवितत्व आकर्षक बनता है।
मंगल की दृष्टि उसे ललित कलाओं के माध्यमं से धनी बनाती है।
बुघ की दृष्टि उसे विदान बनाती है । उसकी पत्नी भी विदुषी होती है !
गुरु की दृष्टि के फलस्वरूप उसे जीवन के सारे सुख प्राप्त होते है}
शानि की दृष्टि जातक को अभावग्रस्त बनाती है | तरह-तरह के रोग
भी उसे घेरे रहेते हैँ।
पुष्य के विभिन्न चरणो में शनि की स्थिति
पुष्य के तृतीय चरण को छोडकर शेष सभी चरणों मँ शनि की स्थिति
शुभ फल देती है।
ग्योतिक-कौमुरी : (व्वड-1) नकषत्र-वि्रा # 112
प्रथस् चरणः यर्हौ शनि व्यक्ति कौ ध्ौर स्वार्थी बनाता है) उसकी
परिवार म किसी से नदीं बनती। हँ, ेसा व्यक्ति परिश्रमी अवश्य होता है
ओर स्व प्रयत्न से ही जीवन में आगे बढता है।
द्वितीय चरणः य्ह शनि व्यक्ति को उदार ओर करुणामय बनाता है
तथापि उसे तरह-तरह के रोग घेरे रहते दै |
तृतीय चरणः यु शनि जातक को शासकीय अथवा व्याक्सायिक
क्षेत्र मे सफलता प्रदान करता है। शासकीय सेव! मेँ हो तो जातक उच्च पद
पर आसीन होता है।
चतुर्थं चरणः यर्हो शनि हो तो एेसे व्यकिति को बचपन मे माता-पिता
का सुख नसीब नहीं होता। उसका लालन-पालन अन्य संबंधी करते हें ।
उन्हीं के कारण उसे विरासत मे संपत्ति भौ मिलती है।
पुष्य स्थित शनि पर विभिन्न यर्हो की दृष्टि
सूर्य की वृष्टि जातक के बचपन को कष्टकारक वना देती है! उसे
पिता का सुख नही मिलता ।
चैद्र की दृष्टि उसे विशेष शिक्षा नहीं दिलाती। माता के लिए भी यह
दृष्टि अशुम है।
मंयल की दृष्टि संपन्न ओर स्वस्थ बनाती है। उसे जीवन के सभी
सुख प्राप्त होते है!
बुध की दृष्टि उसे समाजसेवी, परोपकारी बनाती है!
गुरु की दृष्टि उसे परिवार का पूरा सुख प्रदान करती है ¡ सुशील पत्नी
ओर समञ्जदार संतान । वह धनी भी होता है।
शुक्र की दृष्टि उसै सामान्यतः सुखी रखती है । अपने व्यवहार के
कारण वह सभी को प्रिय होतादै।
पुष्य के विभिन्न चरणो में राहु की स्थिति
पुष्य स्थित राहु शुभ फल प्रदान कर्ता है । व्यक्ति कला-ग्रिय, धनी
ओर प्रसिद्ध भी ष्ठोता है।
प्रथम चरणः यर्हौँ रा काव्य प्रेमी बनाता है| जातक स्वयं भी कवि
होता हे। एेसे व्यवित का बचपन कष्टमय बीतता है| प्रेम में भी निराशा
मिलती है फलतः जातक के मन मँ स्त्रियो के प्रति उपेक्षा ओर कू अंशो
तक घृणा उत्पन्न हयो जती है|
द्वितीय चरणः यर्हो शनि जमीन-जायदाद का मालिक बनाता है।
जातक को दुग्ध-व्यवसाय से लाभ भिल सकता है।
ग्योत्तिष-रमुदी : (सठ-1) नस्षत्र-विचार @ 115
तृतीय चरणः य्ह राहु जातक को लेखन प्रकाशन के काय मे प्रवृत्त
करता है। वह शोध, अनुसंधान में भी रुचि लेता है।
चतुर्थं चरणः यर्हौ राहु जातक को वैमव संपन्न ओर प्रसिद्ध बनाता है|
लेकिन उसका पारिवारिक जीवन सुखी नहीं होता।
पुष्यं के विभिन्न चरणो मँ केतु की स्थिति
पुष्य मे. केतु कौ स्थिति शुभ फल नहीं देती]
प्रथम चरणः यहा केतु कष्टकारक होता है ¡ जातकं बचपन मँ घर से
भाग जाता हे ओर अभावमय जीवन वित्ताता है।
द्वितीय चरणः यौ केतु बुरी संगति का शिकार बनाता है । जातक के
भित्र अच्छे नहीं होते ओर कूसंगति के कारण वह पैतृक संपत्ति तक गवां
वैठता हे।
तृतीय चरणः यँ केतु जातक को आजीवन ऋणग्रस्त रखता है [ वह
यायावर की तरह भटकंता हे । कभी-कभी कोई असाध्य रोग भी उसे घेर
लेता है।
चतुर्थ चरणः यहो भी केतु अच्छे फल नहीं देता ¦ जातक जो भी कमाता
है, बुरी स्त्रियों की संगति मै उसे गवां देता है ¡ प्रौढावस्था मे ही उसका
जीवन सुखी होता हे ¦
ज्योतिष-कौगुदी ‡ (ध्वर-८) नक्षतर-विवार श 114
आश्लेषा
आश्लेषा की राशिपथं में स्थिति 106.40 अंश से 120.00 अंशो के मध्य
सानी गयी है! आश्लेषा के अन्य प्रयक्िची नाम है-अहि, भुजंग, सार्पी।
अरबी म आर्द्रा कौ अल-तर्फ कहा जता है।
आश्लेषा का स्वरूप चक्र की भांति माना गया है । सर्पं को देवता तथा
बुघ को इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना गया है । इस नक्षत्र मे पांच तारो की
स्थिति मानी गयी है| यह नक्षत्र कर्क राशि के अंतर्गत आता है, जिसका
स्वामी चंद्रहै।
गणः राक्षस, योनिः बिल्ला (मार्जर) तथा नादः अन्त्या कही जाती है।
नक्षत्र के चरणाक्षर हैः डी, ड्, ३, डो।
वाल्मीकी रामायण के अनुसार दशरथ पुत्र लक्ष्मण एवं शन्रुघ्न का जन्म
इसी नक्षत्र मे हुआ था।
आश्लेषा नक्षत्र मेँ जन्मे जातक-जातिकाओं के लिए कहा गया है कि
उनकी दृष्टि भेदक होती है | उनकी दृष्टि मात्रे म एक शक्ति होती है जौ
सामने वाले को प्रभावित किये बिना नहीं छोडी ।
अश्लेषा नक्षत्र मे जन्मे जातक भाग्यशाली, हष्ट -पुष्ट होते हैँ
तथापि वे रुग्ण व्यवितत्व का आभास दिलाते है। वे वाचाल भी होते है,
तथापि उनकी वाणी में लौगों को मुग्ध करने की शक्ति होती हे! उनमें
निहित बुद्धिमानी एवं नेतृत्व की क्षमता उन्हे शीर्षस्थ पर पर्हुचने की प्रेरणा
देती है!
इस नक्षत्र मेँ जातकं किसी भी बात पर ओंखि मूंदकर विश्वास नहीं
ज्योतिव-करयुदी ~ (वड) नात्र-विकिर क 115
करते ¡ उन्हे अपनी स्वतंत्रता मे किसी का भी कोई हस्तक्षेप बदश्ति नहीं
होता। अतः आश्लेषा नक्षत्र मे जन्मे जातकं से निभाव का एकमात्र उपाय
है कि उनकी बात न काटी जाए। आश्लेषा नक्षत्र म जन्मे जातकों मेँ
एक विशेषता यह भी होती है कि ओंँख मूंदकर उनका अनुसरण करने
वाले लोगौँ के हित के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैँ। यद्यपि
वै न किसी से विश्वासघात करते है, ओर न किसी को धोखा देना पसंद
करते है, तथापि अक्सर वे समाज में अवैध कार्यौ में लिप्त लोगों के जाने-
अनजाने खैर-ख्वाह दने रहते है । उनमें एक दोष यह होता है कि वे
कूतज्ञता व्यक्त करना नहीं जानते। उनका चग्र स्वभाव लोगों कौ उनका
विरोधी वना देता है ओर अवसर मिलते ही एसे लोग उन्हें धोखा देने से
नहीं चूकते। `
अश्लेषा नक्षत्र मँ जन्मे जातकौ की शैक्षिक रुचि के विषय अक्सर
कला एवं वाणिज्य व्यवसाय के होते है]
एसे जातकों की पत्नियां अक्सर उन्हें समङ्ग नहीं पाती] दूसरे उसमे
स्वार्थपस्ता की भावना भी अधिक होती है। एसे जातकों को नशे से बचने
की सलाह दी गयी है]
आश्लेषा नक्षत्र मे जन्मी जात्तिकाएं विशेष सुंदर नहीं होती। वे नैतिकता
के उच्च आदर्शो से प्रेरित होती हैँ तथा अपने इस गुण के कारण समादृत्त
भी होती है । उनम आत्म संयम एवं लज्जा की भावना भी प्रचुर मात्रा में
होती है! वे कार्यदक्ष होती है । घरेलू कामकाज म भी ओर अवसर मिलने
पर प्रशासनिक कार्यो मेँ भी
आश्लेषा के विभिन्न चरर्णो मेँ सूर्य की स्थिति
आश्लेषा के विभिन्न चरणों मे सूर्य सामान्य फल देता है। लग्न
मँ विभिन नक्षत्रां की स्थिति फलो में गुणात्मक परिवर्तन कर देती
है| इसी तरह शुभ ग्रहौ की दृष्टि से भी फलौ मे परिवर्तन आ
जाताहे।
आश्लेषा, के विभिन्न चरणों के स्वामी है-प्रथम चरणः सुरु, दितीय
चरणः शनि, तृतीय चरणः शनि एवं चतुर्थ चरणः गुरु।
प्रथञ्न चरणः य्ह सूर्य सामान्य फल देता है। यदि लग्न मै अनुराधा
नक्षत्र हो तो जातक यायावर बन जाता है ! यह स्थिति वैरास्य की भावना
को भी जन्म देती है। परिवार से विरक्त साघु संन्यासी वना देती है।
तीर्थाटन के लिए प्रेरित करती है । उदार एवं परोपकारी बनाती है ।
ज्योतिय-कौयुदी ` (वड-प) नक्षत्र-दिकार 9 116
दिक्तीय चरणः यहो भी सूर्यं विशेष शुभ फल नहीं देता । यदि लग्न में
ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो जात्तक की पत्नी उसकी उन्नति मँ बाधक बनती है ।
पित्ता के लिए भी यह स्थिति शुभ नहीं कही गयी है
तृतीय चरणः यहौँ भी सूर्य सामान्य फल देता है!
, चतुर्थं चरणः यहो भी सूर्यं शुम फल नहीं देतः। जातक को संतान से
कोई सुख नहीं मिलता
आश्लेषा स्थित सूर्यं पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
चंद्र की दृष्टि हमेशा नौकरी करवाती है। संबंधी सहायक होने की
दजाय बाधक बनते है]
मंगल की दृष्टि भी संबेधियो से विवाद बढ़ती है।
बुध की दृष्टि का फल शुम होत्ता है! जातक विद्वान ओर प्रसिद्ध
शिक्षाशास्त्री होता है।
गुरु की दृष्टिकाभीफल शुम होता हे] जातक को शासन से लाम
होता है! परिवार म उसकी प्रतिष्ठा बनी रहती है।
शुक्र की दृष्टि स्त्रियो से लाम् करवाती है, कितु जीवने दुखी भी रहता है ]
शनि की दृष्टि स्वास्थ्य पर घातक प्रमाव डालती हे!
आश्लेषा के विभिन्न चरर्णो मे चंद्र की स्यिति
आश्लेषा के प्रथम चरण को छोडकर शेष तीनो चरणो मेँ चंद्र के शुम
फल नहीं मिलते।
प्रथम् चरणः यह चंद्र जाक को उदार, विद्वान ओौर संपन्न बनाता है ¡
वह समाज मे आदर भी पाता हे।
दितीय चरणः यहौँ चंदर शुभ फल नहीं देता, विशेषकर स्वास्थ्य-दृष्टि से।
तृतीय चरणः यषा चंद्रमा दुर्घटनाओं के योग बनाता हे ! ये दुर्घटनाए
घर तकमेंभी षहो सकती है
चतुर्थ चरणः यह चंद्र व्यक्ति को अनेतिक ओर स्वार्थी बनाता हे।
व्यवित्त धनलिप्सा मे लीन रहता है ओर धन कमाने के लिए गलत माध्यमं
काभीआश्रयलेताहै
आश्लेषा स्थित चंद्र पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि
सूर्य की वृष्टि भवन-निर्माण कार्यो मे दक्षता देती है!
मंगल की दृष्टि उसे क्रूर स्वभाव चाला बनाती है। परिवार वाले
ग्योतिष-कौुदी ` (छढ-२) नसेक्र-किवारं @ 117
भी उससे दुखी होते है + उसकं कार्य-कलापों से उन्हँ शर्भिदगी उठानी
पडती है]
बुघ की दृष्टि काफल शुभ होता है। जात्तक धनी ओर प्रसिद्ध होता है
ओर उसे परिवार का श्री पूर्णं सुख प्राप्त होता है|
गुरुकीदृष्टिकाभी शुम फल मिलता है! जातक उदार, सुखी ओर
अपने सद् व्यवहार कं कारण लोकप्रिय होता है
शुक्र की दृष्टि जातक की संपूर्ण सुख देती है लेकिन साथ दही
काम-पिपासा की पूर्तिं के लिए अधिक शक्ति देती है ! फलतः तरह-तरह
के यौन रोगों का कष्ट. उसे ज्चेलना पडता हे।
शनि की दृष्टि उसे दरिद्र ओर मातृ-विरोधी बनाती है ।
आश्लेषा के विभिन्न चरणो में बुध
आश्लेषा के विभिन्न चरणोँ में स्थित बुध प्रायः सामान्य फल देता है।
प्रथम चरणः यहौँ दुध व्यक्ति कौ योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने का
गुण देता है1 बह बुद्धिमान ओर चतुर होता हे ।
दितीय चरणः य्ह बुध व्धापार कार्य में रुचि देता है! जातक की
लेखन मे भी रुचि होती है।
तृतीय चरणः यौ बुध जातकं को भ्रमणशील बनाता हे । साथ दही नशे
के प्रति उसमे विशेष कमजोरी होती है । उसका पारिवारिक जीवन सुखी
नहीं रहत । पत्नी से सदैव अनबन बनी रहती है।
चतुर्थ चरणः यर्हो बुध शिक्षा का कारक बन जाता है। जातक इंजीनियरिग
के क्षेत्र में विशेषे तरक्की करता है।
आश्लेषा स्थित बुध पर विभिन्न ग्रो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि पत्नी कं कारण पारिवारिक जीवन नरकीय बना
देती हे।
चंद्र की दृष्टि वस्त्र व्यापार में अभिरुचि देती है!
मंगल की दृष्टि उसे विद्वान, शास्त्रों का अध्येता बनाती है । लेकिन
स्वभाव मेँ क्रूरता भी लाती है!
गुरु की दृष्टि बुद्धिमान, धनी ओर विवेकवान बनाती है ¦
शुक्र की दृष्टि के फलस्वरूप वह आकर्षकं व्यक्तित्व वाला बनता है ।
संगीत~नृत्य मे उसकी विशेष रुचि होत्री है।
शुक्र की दृष्टि उसे वाचाल भी बना देती है।
ज्योतिक-कौमुदी ; (शखड-१) नकजविकार ऋ 118
शनि की दृष्टि का फल शुभ कल नहीं होता । अपने व्यवहार कं कारण
जातक सर्वत्र तिरस्कृत होता है।
आश्लेषा के विभिन्न चरणों मँ गुरु
आश्लेषा नक्षत्र मे गुरु की स्थिति शुभ फल देती हैं) जातक
विद्वान, धनी ओर प्रसिद्ध होता है । उरका पारिवारिक जीवन भी सुखी
होता है।
प्रथम चरणः यँ गुरू जातक को धनी बनाता है । पत्नी भी अच्छी
मिलती है। संतान भी उसे सुख पर्हुघाती है।
द्वितीय चरणः यर्हौँ गुरु जातक को विद्वान, उदार भौर सत्यवादी
बनाता है, फलतः वह सर्वत्रे आदर पाता है। उसकी संतान भी अच्छी,
दीर्घ-जीवी होती है।
तृतीय चरणः यहो भी गुरु शुभ फल देता है । विशेषकर उसकी पत्नी
धनी परिवार से होती है ओर इसका लाभ जातक को मिलता हे
चतुर्थं चरणः यहो गुरु बहुत अच्छे फल देता है! जातक जेमीन-जायदाद
का स्वामी ओर सुखी रहता है । शासकीय सेवा में हो तो उच्चे पद पर
पर्हुचता है।
आश्लेषा स्थित गुरु पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि उच्च पद प्रदान करती है । जातक राजनीतिक क्षत्र मँ
विशेष सफलता प्राप्त करता है ओर इसी कारण उसे शासन मे भी
महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त होता. है ।
चंद्र की दृष्टि काफल अच्छा नहीं होता। जातक परिवार के विनाश
का कारण बनता है।
मगल की वृष्टि उसे हर दृष्टि से सुखी रखती है। धन की दृष्टि से मी
ओर परिवार की दृष्टि से मी।
बुघ की दृष्टि के फलस्वरूप जातक राजनीति के क्षत्र मे अत्यंत सफल
होकर उच्च पद पाता है । उसे विरासत मे संपत्ति भी प्राप्त होती है।
शुक्र की दृष्टि उसे स्त्रियो मे लोकप्रिय बनाती है ¡ उनसे उन्हें लाम भी `
प्राप्त होता है।
शनि की दृष्टि का फल शुम होता है! जातक सुरक्षा संगठनों यथा
सेना अथवा पुलिस मेँ उच्चतम पद प्राप्तं कर सकता है। उसके एास न
केवल धन वरन् अधिकार भी होता है;
ज्योतिष-कौमुदी : (श्व) नसत्र-िचार # 119
आश्लेषा के विभिन्न चरणो मे शुक्र
आश्लेषा के चतुर्थ चरण में शुभ फल देने के अलावा विभिन चरर्णो मेँ
शुक्र मिले-जुले फल देता है, पर वैवाहिक जीवन की दृष्टि य्ह शुक्र की
स्थिति शुभ नहीं मानी जा सकती ।
प्रथम चरणः यर्हौँ शुक्र विशेष फल नहीं देता है । इस चरणमे चंद्र के
साथ शुक्र की युति संबध--विच्छेद की नौबत ला देती है।
द्वितीय चरणः यँ शुक्र अपने अन्य फर्लो के साथ-साथ व्यक्ति को
काम-पिपासु बनाता है। काम वासना का आधिक्य पारिवारिक जीवन में
विग्रह उत्पन्न करता है । दो पलिनर्यो का भी योग बनाता है! एेसे जातक के
जीवने का अंतिम चरण दुखदायी होता है । वह अपने कर्मो के फलस्वरूप
अकेला रह जाता है।
तृतीय चरणः यर्हौँ भी शुक्र अच्छे फल नहीं देता । प्रथम चरण की भाति
इस चरण मेँ भी यंद्र-शुक्रं युति अच्छे फल नहीं देती । वह मानसिकता को
विल्कुल अनैतिक बना देती है।
चतुर्थ चरणः यहो शुक्र शुभ फल देता है ! जातक राजनीति केक्ेत्र मँ
विशेष सफल होता है। लेकिन कामाधिक्य उसे परस्त्रीगामी बना देता है।
फलतः उसका वैवाहिक जीवन सुखी नही होक्ता।
आश्लेषा स्थित शुक्र पर विभिन्ने ग्रहो की दृष्टि
सूर्यं की दृष्टि शुम नहीं होती । जातक को स्त्रियों की कोप-दृष्टि का
शिकार होना पड़ता है।
चंद्रकी दृष्टि माती के लिए अशुम होती है।
मंगल की दृष्टिं उसे बुद्धिमान, कला-प्रिय ही नहीं वरन् कलाओं नै
विख्यात भी बनाती है ।
बुध की दृष्टि उसे विवेकपूर्णं बनाती है ओर परिवार के लोगों के
व्यवहार से दुखी रहने के बावजूद वह अपने पारिवारिक दायित्व को निष्ठा
से पूरा करता है।
गुरु की दृष्टि उसे धनी ओर बेहद चुर बनाती है ! उसका वैवाहिक
जीवन भी सुखी रहता है]
शनि की दृष्टि का फल अच्छा नहीं होता। व्यक्ति अमावग्रस्त रहता है !
चरित्र हीनता कं कारण वह हेय दृष्टि से भी देखा जाता है।
ज्योतिष-कौयुदी ° (वप) नसत्र-विधार # 120
आश्लेषा के विभिन्न चरणों में शनि
आश्लेषा के दितीय चरण को छोडकर विभिन चरणों मे शनि शुभ फल
नहीं देता] जातकं प्रायः माता-पिता के सुख से वंचित रहता है।
प्रथम चरणः यह शनिं माता के सुख से वंचित रहता है! यातोमां
होती नही ओर होती भी है तो जातक उसकं दारा लालन-पालन के सुख
से वंचिते रहता है!
द्वितीय चरणः यर्हौ शनि शुभ फल देता है ¡ जातकं सुशिक्षिते ओर चतुर
होता है विज्ञान संबंधी विषयों मेँ उसकी रुचि होती है । वह विदेश-यात्राएं
भी करताहे]
तृतीय चरणः यह शनि पिता के सुख से वंचित रखता है ¦ जातक
हमेशा संदेहशील बनता रष्ठता है।
चतुर्थं चरणः यहो शनि जातक को पितृ-विरोधी बनाता है । उसका
पिता मद्य-गप्रिय हो सकता है ! फलतः माता-पिता कं बीच संबघ ठीक नहीं
होते। पिता के प्रति वैर भाव के कारण जातक पारिवारिक संपत्ति भी नष्ट
कर. सकता है।
आश्लेषा स्थित शनि पर विभिन्न ग्रहो की दृष्टि
सूर्य की दृष्टि पारिवारिक जीवन दुखी रखती है ¦ जातक को पत्नी से
पूर्णं सुख नीं मिलता।
चंद्र कीदृष्टिभी शुभ फल नहीं देती ¡ जातक परिवार वालौँ के लिए
दुःख का कारण बन जाता है।
मंगल की दृष्टि शासन से लाम दिलवाती है।
बुध की दृष्टि फे फलस्वरूप जातक चघमंडी ओर कदु वचन कहने काला
बन जातादहै।
गुरु की दृष्टि शुम फल देती है । जात्तक धनी ओर पत्नी तथा संतन
सुख पाता है ¦
शुक्र की दृष्टि का भी शुम फल मिलता है। जातक का व्यक्तित्व
आकर्षक होता है। व्यापार मँ वह सफल होता हे।
आश्लेषा के विभिन्न चरणो मेँ राहु
प्रथम चरणः यहो राहु जातके को दीर्घजीवी बनाता है!
द्वितीय चरणः यहो राहु विशेष शुम फल नहीं देता ।
ज्योतिष-कौमुदी : (खड-1/) नकेत-दिवार अ 121
तृतीय चरणः यहो राहु चिकित्सा के क्षेत्र नै सफल बनाता है । जातक
अत्यंत भावुक होता है ओर इसी कारण उरे परेशानी भी उनी पडती है ।
चतुर्थं चरणः यर्हो राहु जीवन मेँ अवरोधक बनता है। वहो तक कि
परिवार कले ही बाधाएं उत्पन करने लगते है।
आश्लेषा के विभिन्न चरणो मे केतु
प्रथम चरणः य्हौँ केतु चिकित्सा क्षेत्र की ओर प्रवृत्त करता है । स्त्रियों
की कुंडली मेँ मेँ स्थित राहु सफल. डोक्टिर बनाता है}
द्वितीय चरणः यर्हौ केतु जातक को साहसी ओर निर्भीक बनता है।
उसकी धर्म-कर्म में भी रुचि होती है! पर पिता के व्यवहार फलस्वरूप उसे
कष्ट भोगना पड़ता है।
तृतीय चरणः य्ह केतु जातक को वैज्ञानिक दृष्टि वाला बनाता है।
विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रो मेँ वह सफलता प्राप्त करता है ।
चतुर्थ चरणः यहो केतु जातक को व्यापार मँ सफल बनाता दै) मित्रो
के मामले मेँ वह वेहदं सौमाग्यशाली होता है। उसकी उन्नति मै भीवे
महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते है ।
न्योतिष-कौुदी ` (छ) नर-विवार र 192
मघा
मघा नक्षत्र राशिफल में 120.00 अंश से 133.20 अंश के मध्य स्थित
है । पर्यायवाची नाम है पिचृजनक ¡ अरबी मेँ मधा को -अल-जवाह' (अर्थात्
सिंह का मस्तक) कहते है । यह नक्षत्र सिंह राशि का प्रथम् नत्र है । मघा
का देवता पितर एवं स्वामी केतु को माना गया है। सिंह राशि का स्वामी
सूर्यं है।
इस नक्षत्र मे पांच तारे माने गये हैँ जो एक मकान-जैसी आकृति
दशति हैँ।
गणः रक्षस. योनिः मूषक एवं नाडीः अंत मानी गयी है।
चरणक्षर हैः मा, मी, मू. मे।
मघा नक्षत्र मे जन्मे जातक मध्यम कद, रोमावलि युक्त शरीर तथा
निर्दोषं भाव-मंगिमा वाले होते है। उनकी गरदन अपनी प्रमुखता के कारण
ध्यान आकर्षित करती है । एसे जातक ईश्वर-भीरु, बड क! आदर करने
वाले, मृदुभाषी तथा वैज्ञानिक विषयों मै पैठ रखने वाले होते हैँ । विभिन्न
कलाओं मे भी उनकी रुचि होती है । अपने शांति स्वभाव, शांतिप्रिय जीवन
की ललक ओर विदत्ता के कारण वे बिह्वजन द्वारा भी सम्मानित होते हे!
वे हर कार्यं सुविच्ारित ढंग से योजना बनाकर करते दँ । यद्यपि वे
गर्ममिजाज के मी होते हैँ तथा सच्चाई के खिलाफ कोई बात, कोर कर्य
बदश्ति नहीं करते, तथापि वे अपने व्यवहार से भरसक किसी को ठेस नहीं
पर्हुचाना चाहते ! ओर यदि कभी उन्हे लगता है कि उनके कारण किसी का
जीदुखादहैतौ वे तेत्काल क्षमायाचना भी कर लेते है! एसे जात्तक निजी
स्वार्थ से कोसाँ दूर, समाज कं लिए हरदम कुछ न कुछ उपयोगी, हितकर
ज्योतिष-कौमुदी - (खड) नक्षत्र-विचार # 123
कार्य करना चाहते हैँ । प्रतिदान मँ वै ओर कछ नहीं मात्र मानसिक
परितौष- संतोष चाहते हैँ]
स्वाभाविक है कि एेसे लोग आजकल के व्यवसाय मै अपनी ईमानदारी
फ कारण ही असफल रहये ! लेकिन चाहे वे व्यक्साय मेँ हो, चाहे नौकरी
म अपने मृदु, ईमानदार व्यवहार के कारण वातावरण मे संतुलन बनाए रखते
है| एेसे जातकों का वैवाहिक जीक्न भी प्रायः सुखी ही रहता है।
मघा नक्षत्र मे जन्मी जातिकाओं का व्यक्तित्व सुंदर ओर आकर्षक होता
है। जातकों की भाति वे भी ईश्वर-निष्ठ होती हैँ ओर निस्वार्थ भाव से
सबकी सहायता करती हैँ । वे गृह कार्य मै, आफिस के काम काज मै भी दक्ष
होती हँ । इतने सद्गुणं के बावजूद गुस्सा जैसे उनकी नाक पर सवार
रहता हे † यही कारण है कि उनका पारिवारिक, वैवाहिक जीवन अशांत
रहता है । उन्हे पति एवं परिवार वालो के बीच दीवार खडा करने वाला भी
मान लिया जाता है!
मघा के विभिन्न चरणों के स्वामी इस प्रकार है-प्रथम चरणः मंगल,
दितीय चरणः शुक्र, तृतीय चरणः बुघ एवं चतुर्थं चरणः चेद !
मघा के विभिन्न चरणों मँ सूर्य
प्रथम चरणः य्ह सूर्य अभावग्रस्त रखता है! आजीविका के लिए
जात्तक को नौकरी केरनी पडती है।
दितीय चरणः यहो भी सूर्यं प्रथम चरण जैसे ही फल देता है, यथा
अभावग्रस्त जीवन, दरिद्रता, जातक दुर्बलता के कारणः थकान जल्दी
अनुभव करता है।
तृतीय चरणः य्ह सूर्यं का विशेष फल नहीं होता ! जातक मध्यम आयु
काहोताहै।
चतुर्थ चरणः यहो भी सूर्यं अमावग्रस्त रखता है, पर जीवन भर नकी !
लगभग चालीस वर्ष की अवस्था तक। इसके वाद जीवन अपेक्षाकूृत सुखी
हो जाता दहै।
मघा स्थित सूर्य पर विभिन्न ग्रहों की दृष्टि
चंद्र की दृष्टि शुम होती है। इत्तनी कि मघा के विभिन्न चरणों मेँ
अभावग्रस्त रहने वाला जातक चंद्र वृष्टि के फलस्वरूप प्रसिद्ध ओर शक्ति
संपन्न हो जाता है । व्यक्ति खर्चीला भी बहुत होता है!
मंगल की दृष्टि भी उसे खर्चीला बनाती है । इस दृष्टि के फलस्वरूप
जातक स्वयं को स्त्री जाति की सेवा मै लगा दैता है जात्तक परिश्रमशील
लेकिन कदु वचन बोलने वाला होता है।
ज्वोतिष-कौमुदी : (छठ नकषज-विबार अ 124